[रेखाचित्र शैली में]
पृथ्वी के भीतर उतरती हुई रोशनी : पोखरा की गुप्तेश्वर और महेंद्र गुफाओं की यात्रा
_लक्ष्मीकांत मुकुल
नेपाल की यात्रा केवल पहाड़ों, झीलों और बर्फ़ से ढकी चोटियों का साक्षात्कार नहीं है; वह पृथ्वी के भीतर छिपे उस इतिहास तक पहुँचने की भी यात्रा है जहाँ समय अपनी सबसे धीमी गति से बहता है। 8 जून 2026 की सुबह जब मैं अपनी शिक्षिका पत्नी रेणु कुमारी के साथ पोखरा की सड़कों पर निकला तो हमारे सामने केवल दो गुफाएँ नहीं थीं, बल्कि प्रकृति, आस्था और भूगर्भीय रहस्यों का ऐसा संसार था जो मनुष्य की समूची सभ्यता से कहीं अधिक पुराना और धैर्यवान है।
पोखरा का मौसम उस दिन हल्की धूप और बादलों के बीच झूल रहा था। सड़क के दोनों ओर पर्यटकों की चहल-पहल थी, लेकिन हमारे भीतर एक विचित्र उत्सुकता थी—धरती के भीतर उतरने की उत्सुकता। सबसे पहले हमारा पड़ाव था गुप्तेश्वर महादेव गुफा। सड़क के किनारे बने विशाल प्रवेशद्वार से भीतर प्रवेश करते ही ऐसा लगा मानो किसी धार्मिक स्थल और प्राकृतिक संग्रहालय का सम्मिलित परिसर सामने खुल रहा हो। टिकट लेकर जब गोल-गोल घूमती सीढ़ियों से नीचे उतरना शुरू किया तो हर कदम के साथ ऊपर की दुनिया पीछे छूटती चली गई।
रेणु मेरे आगे थीं। उन्होंने मुस्कराकर कहा—“कितना अजीब है, हम मंदिर में जाने के लिए ऊपर नहीं, नीचे उतर रहे हैं।” उनकी बात सुनकर लगा कि सचमुच शिव का यह निवास आकाश में नहीं, धरती की नाभि में स्थापित है। शायद इसी कारण इसका नाम गुप्तेश्वर पड़ा—एक ऐसा ईश्वर जो प्रकट होकर भी स्वयं को गुप्त रखता है।
सीढ़ियाँ समाप्त होते ही नमी का पहला झोंका चेहरे से टकराया। हवा में चूना पत्थर की गंध थी और कहीं-कहीं से लगातार टपकती जल-बूँदें समय की घड़ी की तरह सुनाई पड़ रही थीं। विद्युत बल्बों की कतारें थीं, लेकिन उनका प्रकाश अँधेरे को परास्त नहीं कर पा रहा था। वह केवल इतना भर करता था कि मनुष्य रास्ता न भूल जाए।
गुफा के भीतर प्रवेश करते ही कामधेनु की प्रतिमा दिखाई दी। उसके नीचे स्थापित शिवलिंग पर गिरती पानी की बूँदें किसी अनवरत अभिषेक का आभास देती थीं। रेणु ने सहज श्रद्धा से हाथ जोड़ लिए। मैं कुछ देर तक उस दृश्य को देखता रहा। लगा जैसे प्रकृति स्वयं पुजारी बनकर सदियों से इस शिवलिंग का पूजन कर रही हो और मनुष्य केवल दर्शक है।
आगे बढ़ते हुए कई बार सिर झुकाना पड़ा। कहीं-कहीं गुफा इतनी नीची थी कि सावधानी न बरती जाए तो पत्थरों से टकराना निश्चित था। फर्श असमतल और फिसलन भरा था। हमारे पैरों की आहट और पानी की टप-टप मिलकर एक विचित्र लय बना रही थी। ऐसा लगता था मानो चट्टानें भी कोई मौन संगीत रच रही हों।
मुख्य गर्भगृह में पहुँचे तो विशाल शिवलिंग के सामने कुछ देर ठहर गए। उसके पीछे चट्टानों की प्राकृतिक बनावट नागफणों जैसी प्रतीत होती थी। श्रद्धालुओं की भीड़ बहुत अधिक नहीं थी, इसलिए वहाँ का मौन और भी गहरा लग रहा था। रेणु ने धीमे स्वर में कहा—“इतने अँधेरे में भी विश्वास अपना रास्ता खोज लेता है।” यह वाक्य पूरे दिन मेरे भीतर गूँजता रहा।
गुफा का दूसरा भाग अधिक रोमांचकारी था। सीढ़ियाँ और नीचे उतरती चली जाती थीं। रास्ता संकरा होता जाता और पानी की गर्जना तेज़ होती जाती। अब समझ में आने लगा कि सामने कहीं डेविस फॉल का जल इसी गुफा के भीतर अपनी अदृश्य यात्रा पूरी कर रहा है। नीचे पहुँचकर जब उस जलधारा को ऊपर से गिरते देखा तो मन विस्मय से भर गया। सड़क के दूसरी ओर जिस झरने को पर्यटक बाहर से देखते हैं, उसका यह भूमिगत रूप कहीं अधिक विराट और रहस्यमय था।
वहाँ कैमरे की सीमा समाप्त हो जाती है। कोई भी तस्वीर उस अनुभव को पकड़ नहीं सकती जिसमें चट्टानों के बीच हजारों वर्षों से गिरता पानी अपनी ही धुन में पृथ्वी को तराश रहा हो। तेज़ गर्जना के कारण बातचीत करना कठिन था। हमने केवल एक-दूसरे की ओर देखा और मुस्करा दिए। कई अनुभव शब्दों से नहीं, आँखों से साझा होते हैं।
गुफा से बाहर निकलते समय विष्णु की विशाल शेषशायी प्रतिमा दिखाई दी। लगा जैसे पृथ्वी के भीतर शिव का मौन और बाहर विष्णु की निद्रा भारतीय आध्यात्मिक कल्पना को एक साथ उपस्थित कर रहे हों। धार्मिक प्रतीक यहाँ प्रकृति से अलग नहीं थे, बल्कि उसी के विस्तार के रूप में उपस्थित थे।
महेंद्र गुफा की ओर बढ़ते हुए पोखरा का शहरी शोर धीरे-धीरे पीछे छूटता जाता है। सड़क के दोनों ओर फैली हरियाली, बीच-बीच में चरते मवेशी और दूर दिखाई देती पहाड़ियों के बीच यह अनुमान लगाना कठिन है कि धरती की सतह के ठीक नीचे एक ऐसा संसार छिपा हुआ है जिसकी रचना में प्रकृति ने हजारों वर्षों का समय लगाया है। गुप्तेश्वर महादेव गुफा की आध्यात्मिक अनुभूति के बाद महेंद्र गुफा का अनुभव बिल्कुल भिन्न था। यहाँ आस्था की घंटियाँ नहीं थीं, बल्कि चट्टानों की निस्तब्ध भाषा थी। यहाँ पूजा का विधान नहीं, बल्कि भूगर्भ का मौन इतिहास था।
मैं और मेरी शिक्षिका पत्नी रेणु कुमारी प्रवेश द्वार से भीतर उतरे तो सबसे पहले ठंडी और नम हवा ने हमारा स्वागत किया। बाहर जून की धूप थी, किंतु भीतर तापमान अचानक बदल गया। ऐसा लगा जैसे पृथ्वी ने अपनी गोद में एक अलग ही ऋतु सँजो रखी हो। प्रवेश मार्ग पर लगे बल्बों की धुँधली रोशनी केवल इतना भर कर रही थी कि रास्ता दिखाई देता रहे, लेकिन गुफा का वास्तविक रहस्य उसी अर्ध-अँधेरे में सुरक्षित था। रोशनी और छाया का यह खेल गुफा को किसी प्राचीन चित्रशाला का रूप दे रहा था।
कुछ ही दूर बढ़ने पर छत से लटकती चूना-पत्थर की लंबी संरचनाएँ दिखाई देने लगीं। कहीं वे शिव की जटाओं जैसी प्रतीत होती थीं, कहीं किसी तपस्वी की बढ़ी हुई दाढ़ी जैसी और कहीं किसी झूमर की तरह हवा में स्थिर लटकी हुई। नीचे धरती से ऊपर उठती शंक्वाकार संरचनाएँ मानो उन्हें छू लेने के लिए सदियों से प्रयत्नशील थीं। प्रकृति का यह धीमा निर्माण देखकर मन में बार-बार यह विचार आता कि मनुष्य जिस काम को मशीनों से कुछ दिनों में पूरा कर लेता है, प्रकृति उसे एक-एक बूँद गिराकर हजारों वर्षों में पूर्ण करती है।
रेणु हर कुछ कदम पर रुक जातीं और किसी नई आकृति की ओर संकेत करतीं। एक जगह उन्हें चट्टान में हाथी का सिर दिखाई दिया, दूसरी जगह किसी योगी की ध्यानमग्न मुद्रा। मैं मुस्कराकर कहता कि यह हमारी कल्पना है, पर अगले ही क्षण स्वयं किसी पत्थर में शिवलिंग का आभास खोजने लगता। महेंद्र गुफा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह हर दर्शक को अपनी कल्पना का स्वतंत्र आकाश देती है। कोई उसे भूविज्ञान की प्रयोगशाला समझता है, कोई देवताओं का निवास और कोई समय की मूर्त कविता।
जैसे-जैसे हम भीतर बढ़ते गए, गुफा का अँधेरा गहरा होता गया। कई स्थानों पर रास्ता ऊबड़-खाबड़ था। छोटे-छोटे पत्थर पैरों के नीचे खिसकते और हल्की चरमराहट पैदा करते। छत से टपकती जल-बूँदें कभी कंधे पर गिरतीं तो कभी हथेली पर। उन बूँदों को छूकर लगता था कि यह केवल पानी नहीं, हजारों वर्षों से चट्टानों में छनकर आया हुआ समय है।
गुफा के एक विशाल कक्ष में पहुँचकर हम कुछ देर रुक गए। ऊपर दृष्टि उठाई तो अनगिनत स्टैलेक्टाइट्स किसी जमे हुए जलप्रपात की तरह लटके हुए थे। नीचे उगते स्टैलेग्माइट्स उनके मौन प्रतिबिंब जैसे लगते थे। दोनों के बीच का अंतराल ऐसा प्रतीत होता था मानो धरती और आकाश एक-दूसरे को छूने की चिरंतन आकांक्षा में स्थिर हो गए हों। वहाँ खड़े होकर मनुष्य स्वयं को बहुत छोटा महसूस करता है। सभ्यताओं का इतिहास, राजाओं की विजय, युद्ध और सीमाएँ—सब कुछ इन चट्टानों के सामने क्षणभंगुर लगता है।
महेंद्र गुफा का वातावरण गुप्तेश्वर की तरह धार्मिक नहीं है, इसलिए यहाँ मन अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र होकर प्रकृति से संवाद करता है। कहीं कोई घंटा नहीं बज रहा, कोई मंत्रोच्चार नहीं हो रहा, फिर भी एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव भीतर उतरता चला जाता है। शायद इसलिए कि यहाँ प्रकृति स्वयं अपनी उपस्थिति का उद्घोष करती है। हर टपकती बूँद, हर चट्टान और हर गहरा कोना करोड़ों वर्षों की पृथ्वी-कथा का एक मौन अध्याय है।
एक जगह बिजली की हल्की रोशनी पड़ने पर चट्टानों का रंग बदलता हुआ दिखाई दिया। कहीं हल्का पीला, कहीं धूसर, कहीं भूरा और कहीं दूधिया सफेद। ऐसा लगता था मानो किसी अदृश्य चित्रकार ने खनिजों की कूची से इन दीवारों पर रंग भर दिए हों। रेणु ने धीरे से कहा—“यह किसी संग्रहालय से कहीं अधिक जीवित है।” सचमुच, यहाँ प्रदर्शित हर आकृति अभी भी बन रही है, बदल रही है, साँस ले रही है।
महेंद्र गुफा का सबसे बड़ा आकर्षण उसका मौन है। बाहर की दुनिया में जहाँ हर क्षण ध्वनियाँ हमारा पीछा करती हैं, वहीं इस गुफा में सुनाई देता है केवल पानी का टपकना और अपने ही कदमों की प्रतिध्वनि। कुछ पल आँखें बंद कर लेने पर ऐसा लगता है जैसे पृथ्वी के भीतर की धड़कन कानों तक पहुँच रही हो। उस क्षण मनुष्य अपनी समस्त आधुनिकता के बावजूद आदिम हो उठता है।
जब हम बाहर निकले तो तेज़ धूप आँखों में चुभने लगी। लगा जैसे किसी दूसरी दुनिया से लौटकर आए हों। पीछे मुड़कर देखा तो साधारण-सा प्रवेश द्वार उस अद्भुत संसार का संकेत भी नहीं देता था जो उसके भीतर छिपा हुआ है। मैंने रेणु से कहा कि महेंद्र गुफा केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि समय का जीवित संग्रहालय है, जहाँ हर चट्टान एक पुस्तक है और हर जल-बूँद उसका धीरे-धीरे लिखा जा रहा नया वाक्य।
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परिचय
लक्ष्मीकांत मुकुल
जन्म – 08 जनवरी 1973
शिक्षा – विधि स्नातक
किसान कवि। कवितायें एवं आलेख विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित । दो कविता संकलन “लाल चोंच वाले पंछी’’ व "घिस रहा है धान का कटोरा" और ग्रामीण इतिहास पर केंद्रित पुस्तक "यात्रियों के नजरिए में शाहाबाद" प्रकाशित।
संपर्क :-
ईमेल – kvimukul12111@gmail.com
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