बुधवार, 1 जुलाई 2026

डायरी : पोखरा से मुक्तिनाथ – महाहिमालय की गोद में एक कठिन, रोमांचकारी और आत्मानुभूत यात्रा

डायरी : पोखरा से मुक्तिनाथ – महाहिमालय की गोद में एक कठिन, रोमांचकारी और आत्मानुभूत यात्रा
_ लक्ष्मीकांत मुकुल 


जून, 2026 का प्रथम सप्ताह।

01.
नेपाल की दस दिवसीय यात्रा का यह सातवाँ दिन था। जनकपुर की आस्था, लुंबिनी की शांति, मनोकामना की आध्यात्मिक ऊँचाइयों और काठमांडू की सांस्कृतिक चहल-पहल को पीछे छोड़ते हुए हम पोखरा पहुँच चुके थे। मेरे साथ मेरी शिक्षिका पत्नी रेणु कुमारी थीं, जिनकी आँखों में हिमालय को निकट से देखने का उत्साह बार-बार चमक उठता था। किंतु हमें यह अनुमान नहीं था कि अगले कुछ घंटे केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि धैर्य, साहस और प्रकृति के विराट रूप से साक्षात्कार की परीक्षा बनने वाले हैं।

भोर का उजाला अभी पूरी तरह फैला भी नहीं था कि बस ने पोखरा के बस अड्डे से मुक्तिनाथ की ओर प्रस्थान किया। शहर की व्यवस्थित सड़कों और आधुनिक इमारतों को पीछे छोड़ते ही दृश्य बदलने लगे। शीघ्र ही पक्के रास्तों की जगह सँकरे पहाड़ी मार्गों ने ले ली। बस का प्रत्येक पहिया मानो पहाड़ की छाती से संवाद करता हुआ आगे बढ़ रहा था। एक ओर हजारों फीट गहरी खाई थी, दूसरी ओर खड़े चट्टानी पर्वत। नीचे उफनती नदी का शोर सुनाई देता, पर उसकी धारा केवल धुँधली रेखा की तरह दिखाई पड़ती।

कुछ ही देर में अन्नपूर्णा और धौलागिरी पर्वतश्रेणियों की हिमाच्छादित चोटियाँ बादलों के परदे से झाँकने लगीं। सूर्योदय की पहली किरणें उन पर पड़कर उन्हें स्वर्णिम आभा से भर रही थीं। ऐसा प्रतीत होता था जैसे हिमालय स्वयं किसी प्राचीन ऋषि की भाँति ध्यानमग्न खड़ा हो और हम उसकी तपोभूमि में प्रवेश कर रहे हों।

बस धीरे-धीरे ऊँचाई की ओर चढ़ रही थी। तीखे मोड़ों पर चालक का कौशल देखकर विस्मय होता। कई बार ऐसा लगता कि अगला मोड़ अंतिम होगा, पर उसके बाद एक और अधिक चुनौतीपूर्ण घुमाव सामने उपस्थित हो जाता। सड़क इतनी सँकरी कि सामने से आने वाले वाहन को निकलने देने के लिए कभी-कभी बस को बिल्कुल किनारे रोकना पड़ता। उस क्षण नीचे झाँकने का साहस जुटाना भी कठिन था।

रेणु कुमारी बार-बार खिड़की से बाहर देखतीं और फिर मेरी ओर मुस्कराकर कहतीं—“इतनी कठिन राह के बाद ही शायद देवताओं का धाम मिलता होगा।” उनके स्वर में भय कम और रोमांच अधिक था। वास्तव में मुक्तिनाथ की यात्रा केवल धार्मिक तीर्थ नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच विश्वास की परीक्षा है।

पोखरा से जानसन चेकपोस्टआगे के बढ़ते ही हरे-भरे वन धीरे-धीरे विरल होने लगे। देवदार और चीड़ के स्थान पर नंगे, भुरभुरे और धूसर पर्वत दिखाई देने लगे। कहीं लाल रंग की चट्टानें थीं, कहीं पीली मिट्टी की परतें, तो कहीं काली शिलाओं का विस्तार। ऐसा लगता था मानो पृथ्वी ने अपने करोड़ों वर्षों का भूगर्भीय इतिहास इन पहाड़ों की परतों में सुरक्षित रख छोड़ा हो।

रास्ते में छोटे-छोटे गाँव दिखाई देते। पत्थरों से बने घर, लकड़ी की खिड़कियाँ और छतों पर सूखती लकड़ियाँ। कुछ स्थानों पर महिलाएँ याक और भेड़ों को चराती दिखतीं, जबकि बच्चे दूर से हाथ हिलाकर यात्रियों का स्वागत करते। उनकी सहज मुस्कान इस कठोर भूगोल में जीवन की जिजीविषा का परिचय देती थी।

मार्ग के किनारे बहती काली गंडकी नदी अनेक स्थानों पर हमारे साथ-साथ चलती रही। उसका जल कहीं शांत था तो कहीं चट्टानों से टकराकर प्रचंड स्वर उत्पन्न करता। नदी के दोनों ओर फैली घाटियाँ और हवा से कटकर बनी विचित्र शिलाकृतियाँ इस क्षेत्र को किसी प्राकृतिक कला दीर्घा का रूप देती थीं।

ज्यों-ज्यों बस ऊपर चढ़ती गई, हवा का तापमान कम होता गया। तेज झोंके खिड़कियों से भीतर प्रवेश कर यात्रियों को ठंड का अहसास कराने लगे। चालक ने बताया कि आगे जोमसोम क्षेत्र में दोपहर बाद हवाएँ और भी प्रबल हो जाती हैं। सचमुच कुछ समय बाद बस को कई बार हवा के तीव्र दबाव का सामना करना पड़ा। उस क्षण प्रकृति की शक्ति के सामने मनुष्य की सीमाएँ स्पष्ट दिखाई देती थीं।

जोंसन के जाँच चौकी के बाद भू-दृश्य ने अचानक नया रूप धारण कर लिया। वृक्ष लगभग समाप्त हो चुके थे। सामने केवल शुष्क पर्वत, दूर-दूर तक फैले पथरीले ढाल और उनके पीछे चमकती हिमाच्छादित अन्नपूर्णा की शिखर-रेखा। यह दृश्य किसी मरुस्थल और हिमालय के अद्भुत संगम जैसा प्रतीत होता था। यहाँ की निस्तब्धता इतनी गहरी थी कि बस के इंजन की आवाज भी अस्वाभाविक लगने लगती।

मुस्तांग क्षेत्र के बारे में पढ़ी हुई बातें स्मरण आने लगीं। कभी यह बाहरी दुनिया से लगभग कटा हुआ राज्य था। सदियों तक यहाँ तिब्बती सांस्कृतिक परंपराएँ बिना किसी बड़े बाहरी प्रभाव के विकसित होती रहीं। पुराने नमक व्यापार मार्ग से होकर गुजरने वाले कारवाँ इन घाटियों में विश्राम करते थे। आज भी अनेक गाँवों की संरचना और जीवनशैली उस ऐतिहासिक विरासत को जीवित रखे हुए है।

यात्रा के दौरान अनेक स्थानों पर चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएँ दिखाई दीं। चालक ने संकेत करते हुए बताया कि इनमें से कुछ हजारों वर्ष पुरानी हैं। कल्पना कीजिए—कभी इन्हीं गुफाओं में साधु, व्यापारी और स्थानीय निवासी रहते होंगे। इन निर्जन पर्वतों में मानव सभ्यता की ऐसी उपस्थिति आश्चर्यचकित कर देती है।

बस की खिड़की से बाहर देखते हुए मुझे बार-बार लगता कि यह यात्रा केवल दूरी तय करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि समय के भीतर पीछे लौटने का अवसर है। आधुनिक महानगरों की भागदौड़ से दूर यहाँ जीवन की गति अलग है। समय मानो धीरे-धीरे चलता है और प्रकृति का प्रत्येक दृश्य मनुष्य को अपनी सीमाओं का बोध कराता है।

दोपहर तक पहुँचते-पहुँचते ऊँचाई का प्रभाव महसूस होने लगा। साँस कुछ भारी प्रतीत होती थी। चालक और स्थानीय यात्रियों ने सलाह दी कि पानी पीते रहें और अनावश्यक तेजी से न चलें। हिमालय अपने अतिथियों का स्वागत अवश्य करता है, पर उनसे संयम और सम्मान की अपेक्षा भी रखता है।

रेणु कुमारी ने दूर दिखाई देती बर्फ से ढकी चोटियों की ओर संकेत करते हुए कहा—“यदि जीवन में केवल एक बार भी ऐसा दृश्य देखने को मिल जाए तो यात्रा सफल हो जाती है।” उनके शब्दों में वह भाव था जिसे किसी कैमरे में कैद नहीं किया जा सकता। वह केवल अनुभव किया जा सकता है।

साँझ की ओर जब मुक्तिनाथ क्षेत्र निकट आने लगा, तब सूर्य की किरणें धूल भरे पर्वतों पर पड़कर उन्हें तांबे जैसा रंग देने लगीं। हवा में ठंड बढ़ चुकी थी। दूर कहीं प्रार्थना-पताकाएँ लहरा रही थीं और उनके बीच हिमालय की श्वेत चोटियाँ किसी मौन देवालय की भाँति खड़ी थीं। उस क्षण यह अनुभव हुआ कि कठिन यात्राएँ केवल गंतव्य तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं; वे मनुष्य के भीतर भी एक नया भूगोल रचती हैं।

दिन भर की कठिन बस यात्रा ने शरीर को थका दिया था, पर मन असाधारण ऊर्जा से भरा हुआ था। पोखरा से मुक्तिनाथ तक का यह मार्ग केवल सड़क नहीं, बल्कि प्रकृति, इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिकता का ऐसा संगम है जहाँ हर मोड़ पर नया आश्चर्य जन्म लेता है और हर दृश्य यात्री के भीतर किसी अनकहे प्रश्न को जगाता है। इस यात्रा ने मुझे यह सिखाया कि हिमालय को केवल देखा नहीं जा सकता, उसे धैर्य, विनम्रता और साहस के साथ जिया जाता है।

02.

अगली सुबह जब मैं अतिथि गृह की खिड़की के बाहर निकला तो लगा जैसे रात भर में पृथ्वी ने अपना एक नया रूप धारण कर लिया हो। हवा में असाधारण शुष्कता थी, पर उसके भीतर हिम की ताजगी भी घुली हुई थी। सूरज अभी क्षितिज के ऊपर पूरी तरह नहीं आया था, फिर भी उसकी हल्की किरणें अन्नपूर्णा और धौलागिरी की हिमाच्छादित चोटियों को स्वर्णाभ बना रही थीं। ऐसा दृश्य केवल आँखों से नहीं, आत्मा से देखा जाता है।

मुक्तिनाथ की ओर बढ़ते हुए रास्ते में अनेक यात्री दिखाई दिए। कोई हाथ में जपमाला लिए मंत्रोच्चार कर रहा था, कोई कैमरे में दृश्य कैद करने में व्यस्त था, तो कोई ऊँचाई के कारण धीरे-धीरे साँस लेते हुए आगे बढ़ रहा था। विविध भाषाएँ, विविध वेशभूषाएँ और विविध संस्कृतियाँ यहाँ एक साझा विश्वास के सूत्र में बँधी हुई प्रतीत होती थीं। हिमालय सचमुच सीमाओं का नहीं, मनुष्यता का भूगोल रचता है।

मंदिर परिसर की ओर जाने वाले मार्ग पर रंग-बिरंगे प्रार्थना ध्वज हवा में लगातार फड़फड़ा रहे थे। उनके कंपन में मानो सदियों की प्रार्थनाएँ समाई थीं। दूर से घंटियों की ध्वनि सुनाई दे रही थी, जिसमें बौद्ध मंत्रों की लय और हिन्दू श्रद्धा का स्वर अद्भुत सामंजस्य बना रहे थे। मुक्तिनाथ उन विरल स्थलों में है जहाँ आस्था किसी एक परम्परा की सीमाओं में कैद नहीं रहती।

जैसे-जैसे हम ऊपर चढ़ते गए, ठंडी हवा का वेग बढ़ता गया। साँसें कुछ भारी होने लगीं, पर भीतर उत्साह बना रहा। मेरी पत्नी रेणु कुमारी कभी पर्वतों को देखतीं, कभी नीचे फैली घाटी को। उन्होंने धीमे स्वर में कहा—“यहाँ आकर लगता है कि मनुष्य कितना छोटा है और प्रकृति कितनी विराट।”

मंदिर प्रांगण में प्रवेश करते ही सबसे पहले १०८ जलधाराओं की पंक्ति दिखाई दी। हिमनदों से आने वाला बर्फ जैसा ठंडा जल निरंतर बह रहा था। अनेक श्रद्धालु उस जल के नीचे स्नान कर रहे थे। उनके चेहरे पर ठंड से कंपन अवश्य था, किंतु आँखों में अटूट विश्वास की चमक भी थी। मैंने उस जल को हाथ से स्पर्श किया। उसकी शीतलता शरीर से अधिक मन को छू गई। लगा जैसे हजारों वर्षों से बहता यह जल समय के सारे अवशेषों को अपने साथ बहा ले जाता हो।

मंदिर के निकट ही अखंड ज्योति का दर्शन हुआ। पृथ्वी से निकलती प्राकृतिक गैस की लौ सदियों से जल रही है। जल, वायु और अग्नि का ऐसा संगम प्रकृति के अद्भुत रहस्यों में से एक है। विज्ञान इसकी व्याख्या कर सकता है, पर उस क्षण वहाँ उपस्थित व्यक्ति इसे केवल विस्मय के साथ अनुभव करता है।

पूरे परिसर में तिब्बती स्थापत्य और नेपाली धार्मिक परम्पराओं का अनूठा मिश्रण दिखाई देता है। लकड़ी पर महीन नक्काशी, पत्थरों से बने छोटे-छोटे स्तूप, घूमते प्रार्थना चक्र और धूप की सुगंध वातावरण को एक आध्यात्मिक गहराई प्रदान करते हैं। यहाँ धर्म किसी बहस का विषय नहीं, बल्कि जीवन की सहज अभिव्यक्ति है।

मंदिर दर्शन के पश्चात हम कुछ देर वहीं बैठ गए। सामने से आती हवा चेहरे को झकझोर रही थी। नीचे काली गंडकी की घाटी दूर तक फैली दिखाई देती थी। उस दृश्य को देखते हुए लगा कि हिमालय का सबसे बड़ा आकर्षण उसकी ऊँचाई नहीं, बल्कि उसका मौन है। यही मौन मनुष्य को अपने भीतर उतरने का अवसर देता है।

दोपहर बाद हमने मुस्तांग की ओर आगे बढ़ने का निश्चय किया। रास्ता अब और अधिक निर्जन होता जा रहा था। कहीं-कहीं केवल मिट्टी और पत्थर के घर दिखाई देते, जिनकी छतों पर सूखती लकड़ियाँ और पशुओं के चारे के ढेर रखे थे। खेत बहुत छोटे थे, पर उनमें जौ और आलू की खेती स्थानीय लोगों की जीवटता का प्रमाण थी। इतनी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी जीवन ने अपने लिए स्थान बना लिया था।

एक छोटे से गाँव में बस कुछ समय के लिए रुकी। हम एक स्थानीय चायघर में गए। वहाँ मक्खन वाली नमकीन चाय और गर्म थुकपा परोसी गई। प्रारम्भ में उसका स्वाद अपरिचित लगा, पर कुछ ही घूँट बाद समझ में आया कि इस कठोर जलवायु में यही भोजन शरीर को आवश्यक ऊर्जा देता है। चायघर की वृद्ध महिला टूटी-फूटी नेपाली और संकेतों के माध्यम से हमसे बातचीत करती रही। भाषा अलग थी, पर आतिथ्य की भाषा सार्वभौमिक होती है।

यहीं एक स्थानीय युवक ने बताया कि उसके पूर्वज कभी तिब्बत तक नमक और ऊन का व्यापार करने जाया करते थे। महीनों तक कारवाँ पहाड़ों के बीच यात्रा करता था। आज सड़कें बन गई हैं, वाहन आ गए हैं, पर उन पुराने व्यापारिक मार्गों की स्मृतियाँ अभी भी लोककथाओं और पारिवारिक इतिहास में जीवित हैं। उसकी बातें सुनते हुए लगा कि मुस्तांग केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि हिमालयी सभ्यता का जीवित संग्रहालय है।

आगे बढ़ने पर परिदृश्य और अधिक अलौकिक होता गया। हवा और पानी के अपरदन ने पर्वतों को ऐसी आकृतियाँ दी थीं मानो किसी मूर्तिकार ने उन्हें तराशा हो। कहीं विशाल स्तम्भ जैसे शिलाखंड, कहीं मधुमक्खी के छत्ते जैसी चट्टानें और कहीं ऊँची दीवारों के भीतर खोदी गई प्राचीन गुफाएँ। वैज्ञानिक इन्हें भूगर्भीय प्रक्रियाओं का परिणाम बताते हैं, पर स्थानीय लोककथाएँ इन्हें देवताओं और सिद्ध पुरुषों का निवास मानती हैं।

इन गुफाओं को देखते हुए मेरे मन में अनेक प्रश्न उठे। हजारों वर्ष पहले यहाँ रहने वाले लोग किन परिस्थितियों में जीवन बिताते होंगे? कैसी रही होगी उनकी दिनचर्या? किन आशंकाओं और किन आशाओं के साथ उन्होंने इन चट्टानों को अपना घर बनाया होगा? इतिहास अक्सर राजाओं और युद्धों का वर्णन करता है, पर इन गुफाओं की नीरवता साधारण मनुष्यों के असाधारण संघर्ष की कहानी कहती है।

जैसे-जैसे हम मुस्तांग के भीतर प्रवेश करते गए, तिब्बती सांस्कृतिक प्रभाव और स्पष्ट दिखाई देने लगा। घरों की बनावट, लोगों की वेशभूषा, प्रार्थना पताकाएँ, मठों की स्थापत्य शैली और स्थानीय बोली—सब कुछ इस क्षेत्र की विशिष्ट पहचान निर्मित करते हैं। यही कारण है कि इसे हिमालय के सबसे अनूठे सांस्कृतिक प्रदेशों में गिना जाता है।

संध्या के समय जब पश्चिमी आकाश पर सूर्य ढलने लगा, तब पूरे परिदृश्य का रंग बदल गया। पीली चट्टानें केसरिया हो उठीं, धूसर पहाड़ बैंगनी छाया में डूब गए और दूर हिमाच्छादित शिखरों पर अंतिम सुनहरी रोशनी ठहर गई। कुछ क्षणों के लिए ऐसा लगा मानो पूरा मुस्तांग किसी प्राचीन चित्रकार की विशाल कैनवास पर उकेरी गई जीवित पेंटिंग बन गया हो।

उस रात डायरी लिखते समय मैंने अनुभव किया कि इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल किसी तीर्थ तक पहुँचना नहीं है। वास्तविक उपलब्धि यह है कि रास्ते ने हमें बदल दिया है। पहाड़ों ने धैर्य सिखाया, नदियों ने निरंतर प्रवाह का अर्थ समझाया और निर्जन घाटियों ने यह बताया कि मौन भी एक भाषा होती है। शायद इसी कारण हिमालय की यात्राएँ समाप्त नहीं होतीं; वे लौटकर भी मनुष्य के भीतर चलती रहती हैं।

03.

रात्रि का अधिकांश समय तेज़ हवा की सनसनाहट सुनते हुए बीता। पहाड़ों के बीच बहती हुई हवा का स्वर किसी महान वाद्ययंत्र की गूँज जैसा लगता था। कभी ऐसा प्रतीत होता कि कोई अदृश्य शक्ति घाटियों में घूम रही है और कभी लगता मानो हिमालय स्वयं अपनी अनंत कथा सुना रहा हो। उस रात नींद और जागरण के बीच कई बार मेरी आँख खुली और हर बार खिड़की के बाहर झाँकने पर वही असीम निस्तब्धता दिखाई दी, जिसमें चाँदनी चट्टानों और बर्फ से ढकी चोटियों पर चाँदी की परत बिछा रही थी।

सुबह हम मुस्तांग की ओर और भीतर बढ़े। जैसे-जैसे रास्ता आगे जाता था, सभ्यता का शोर पीछे छूटता जाता था। सड़क अब कहीं कच्ची थी, कहीं केवल पत्थरों का फैलाव। बस कई बार उछलती, झटके खाती और धूल के बादलों को पीछे छोड़ती हुई आगे बढ़ती रही। यात्रियों के चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में उत्सुकता का प्रकाश भी उतना ही स्पष्ट था।

कुछ दूरी पर एक ऊँची पहाड़ी की ढलान में असंख्य छोटी-छोटी खिड़कियों जैसी आकृतियाँ दिखाई दीं। स्थानीय गाइड ने बताया कि वे प्राचीन स्काई केव्स हैं, जिन्हें सदियों पहले चट्टानों को काटकर बनाया गया था। पहली दृष्टि में विश्वास ही नहीं हुआ कि मनुष्य इतनी ऊँचाई पर जाकर ऐसे आवास बना सकता है। उन गुफाओं को देखकर लगा जैसे समय स्वयं पत्थर के भीतर कैद हो गया हो।

इतिहासकारों का अनुमान है कि इन गुफाओं का उपयोग अलग-अलग कालखंडों में निवास, ध्यान, सुरक्षा और अंतिम संस्कार तक के लिए किया जाता रहा। पुरातात्त्विक उत्खननों में यहाँ से प्राचीन मानव अवशेष, बौद्ध ग्रंथ, मिट्टी के पात्र और अनेक कलात्मक वस्तुएँ मिली हैं। इन तथ्यों ने मुस्तांग को केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि हिमालयी इतिहास के एक महत्त्वपूर्ण अध्याय के रूप में स्थापित किया है।

रास्ते में अनेक स्थानों पर रंग-बिरंगे प्रार्थना ध्वज हवा में लगातार लहराते दिखाई देते। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि हवा के साथ इन पर लिखे मंत्र चारों दिशाओं में फैलते हैं और समस्त जीवों के कल्याण की कामना करते हैं। इन ध्वजों को देखते हुए मुझे लगा कि मनुष्य ने प्रकृति के साथ संवाद स्थापित करने के कितने सुंदर तरीके खोजे हैं।

दोपहर तक हम एक छोटे से मठ पहुँचे। बाहर कुछ वृद्ध भिक्षु लकड़ी के लंबे प्रार्थना चक्र घुमा रहे थे। उनके चेहरों पर अद्भुत शांति थी। हमने भीतर प्रवेश किया। दीवारों पर बुद्ध और बोधिसत्त्वों के चित्र बने थे, जिनके रंग समय के साथ फीके अवश्य पड़ गए थे, किंतु उनकी गरिमा अब भी अक्षुण्ण थी। घी के दीपकों की लौ मंद-मंद जल रही थी और वातावरण में धूप की सुगंध व्याप्त थी।

एक युवा भिक्षु ने हमें गर्म बटर टी दी। बातचीत के दौरान उसने बताया कि यहाँ शिक्षा केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भाषा, चिकित्सा, खगोल, दर्शन और नैतिक जीवन के अनेक आयामों को भी समेटती है। उसके शब्दों में विनम्रता थी और चेहरे पर आत्मविश्वास। आधुनिक सुविधाओं से दूर रहते हुए भी वह अपने परिवेश से पूर्णतः संतुष्ट दिखाई देता था।

मठ से बाहर निकलकर मैंने दूर तक फैली घाटी को देखा। कहीं हरियाली का नामोनिशान नहीं था, फिर भी दृश्य निर्जीव नहीं लगता था। मिट्टी की परतों में लाल, पीले, भूरे और धूसर रंगों का ऐसा संयोजन था कि पूरा भूभाग किसी चित्रकार की रंगपट्टी जैसा प्रतीत होता था। प्रकृति ने यहाँ वृक्षों की जगह रंगों से सौंदर्य रचा है।

दोपहर के बाद हम लो-मान्थांग की दिशा में बढ़े। मार्ग के दोनों ओर कभी-कभी छोटे खेत दिखाई देते, जिनमें स्थानीय लोग कठिन परिश्रम से जौ, कुट्टू और आलू उगाते हैं। पहाड़ों से आने वाले सीमित जल को नहरों द्वारा खेतों तक पहुँचाया जाता है। इस कठोर भूभाग में खेती केवल आजीविका नहीं, बल्कि मनुष्य के अदम्य संकल्प का प्रतीक है।

एक गाँव में कुछ बच्चे विद्यालय से लौट रहे थे। उनकी पीठ पर पुस्तकें थीं और हाथ में लकड़ी की छोटी छड़ियाँ। उन्होंने हमें देखकर मुस्कराते हुए ‘नमस्ते’ कहा। उनकी सहज मुस्कान ने यात्रा की सारी थकान हर ली। उस क्षण लगा कि किसी भी समाज की सबसे बड़ी संपत्ति उसके बच्चे ही होते हैं, जो कठिन परिस्थितियों में भी भविष्य के प्रति आशा बनाए रखते हैं।

साँझ ढलते-ढलते दूर क्षितिज पर लो-मान्थांग की प्राचीरें दिखाई देने लगीं। मिट्टी और पत्थरों से बनी विशाल दीवारें किसी मध्यकालीन नगर की स्मृति जगाती थीं। सदियों तक यह नगर लो साम्राज्य की राजधानी रहा और व्यापार, संस्कृति तथा धर्म का प्रमुख केंद्र भी। जब बस उसके निकट पहुँची तो लगा मानो समय की नदी अचानक कई शताब्दियाँ पीछे मुड़ गई हो।

नगर में प्रवेश करते ही सँकरी गलियाँ, सफ़ेद पुते घर, लकड़ी की नक्काशीदार खिड़कियाँ और प्राचीन मठों के शिखर दिखाई दिए। वातावरण में कोई हड़बड़ी नहीं थी। लोग धीरे-धीरे अपने काम में लगे थे। ऐसा प्रतीत होता था कि आधुनिक जीवन की तेज़ गति अभी तक इस नगर की आत्मा को छू नहीं पाई है।

हम राजा के पुराने चार मंज़िला महल के सामने कुछ देर ठहरे। यद्यपि राजनीतिक परिवर्तन के साथ राजशाही का स्वरूप बदल चुका है, फिर भी यह भवन मुस्तांग के गौरवशाली अतीत का मौन साक्षी बनकर खड़ा है। उसकी दीवारों पर समय के निशान स्पष्ट दिखाई देते हैं, पर उनमें छिपी गरिमा अब भी अक्षुण्ण है।

संध्या के समय नगर के मुख्य चौक में स्थानीय लोग एकत्र होने लगे। कुछ महिलाएँ ऊन कात रही थीं, कुछ पुरुष आपस में बातचीत कर रहे थे और बच्चे खुले मैदान में खेल रहे थे। दूर किसी घर से लोकधुन सुनाई दी। उस संगीत में पहाड़ों की गूँज थी और सदियों पुरानी संस्कृति की आत्मा भी।

रात्रि भोजन में हमें स्थानीय शैली का साधारण किन्तु अत्यंत स्वादिष्ट भोजन मिला—गरम दाल, जौ की रोटी, आलू की सब्ज़ी और मक्खन वाली चाय। ऊँचाई पर बिताए दिन के बाद यह भोजन किसी उत्सव से कम नहीं लगा। भोजन करते समय हमारे मेज़बान ने बताया कि सर्दियों में यहाँ तापमान कई बार शून्य से बहुत नीचे चला जाता है और महीनों तक जीवन कठिन परिस्थितियों में चलता है, फिर भी लोग अपनी परम्पराओं और सामुदायिक सहयोग के सहारे सब कुछ सहजता से निभा लेते हैं।

रात को डायरी लिखते हुए मैंने अनुभव किया कि मुस्तांग की वास्तविक सुंदरता उसके दृश्यों में ही नहीं, बल्कि उसके लोगों की जीवन-पद्धति में भी निहित है। यहाँ प्रकृति कठोर है, संसाधन सीमित हैं, मौसम चुनौतीपूर्ण है, फिर भी जीवन में शिकायत कम और संतोष अधिक दिखाई देता है। शायद इसी कारण यह यात्रा मेरे लिए केवल भौगोलिक भ्रमण नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के संबंधों को नए सिरे से समझने का अवसर बनती जा रही थी।

मैंने अपनी डायरी के अंतिम पृष्ठ पर उस दिन केवल एक पंक्ति लिखी—“हिमालय की सबसे ऊँची चोटियाँ पत्थरों से नहीं, बल्कि मनुष्य के धैर्य और विश्वास से निर्मित होती हैं।”









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परिचय
लक्ष्मीकांत मुकुल 
जन्म – 08 जनवरी 1973
शिक्षा – विधि स्नातक 
किसान कवि। कवितायें एवं आलेख विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित । दो कविता संकलन “लाल चोंच वाले पंछी’’ व  "घिस रहा है धान का कटोरा" और ग्रामीण इतिहास पर केंद्रित पुस्तक "यात्रियों के नजरिए में शाहाबाद" प्रकाशित।

पृथ्वी के भीतर उतरती हुई रोशनी : पोखरा की गुप्तेश्वर और महेंद्र गुफाओं की यात्रा

[रेखाचित्र शैली में]

पृथ्वी के भीतर उतरती हुई रोशनी : पोखरा की गुप्तेश्वर और महेंद्र गुफाओं की यात्रा
_लक्ष्मीकांत मुकुल 


नेपाल की यात्रा केवल पहाड़ों, झीलों और बर्फ़ से ढकी चोटियों का साक्षात्कार नहीं है; वह पृथ्वी के भीतर छिपे उस इतिहास तक पहुँचने की भी यात्रा है जहाँ समय अपनी सबसे धीमी गति से बहता है। 8 जून 2026 की सुबह जब मैं अपनी शिक्षिका पत्नी रेणु कुमारी के साथ पोखरा की सड़कों पर निकला तो हमारे सामने केवल दो गुफाएँ नहीं थीं, बल्कि प्रकृति, आस्था और भूगर्भीय रहस्यों का ऐसा संसार था जो मनुष्य की समूची सभ्यता से कहीं अधिक पुराना और धैर्यवान है।

पोखरा का मौसम उस दिन हल्की धूप और बादलों के बीच झूल रहा था। सड़क के दोनों ओर पर्यटकों की चहल-पहल थी, लेकिन हमारे भीतर एक विचित्र उत्सुकता थी—धरती के भीतर उतरने की उत्सुकता। सबसे पहले हमारा पड़ाव था गुप्तेश्वर महादेव गुफा। सड़क के किनारे बने विशाल प्रवेशद्वार से भीतर प्रवेश करते ही ऐसा लगा मानो किसी धार्मिक स्थल और प्राकृतिक संग्रहालय का सम्मिलित परिसर सामने खुल रहा हो। टिकट लेकर जब गोल-गोल घूमती सीढ़ियों से नीचे उतरना शुरू किया तो हर कदम के साथ ऊपर की दुनिया पीछे छूटती चली गई।

रेणु मेरे आगे थीं। उन्होंने मुस्कराकर कहा—“कितना अजीब है, हम मंदिर में जाने के लिए ऊपर नहीं, नीचे उतर रहे हैं।” उनकी बात सुनकर लगा कि सचमुच शिव का यह निवास आकाश में नहीं, धरती की नाभि में स्थापित है। शायद इसी कारण इसका नाम गुप्तेश्वर पड़ा—एक ऐसा ईश्वर जो प्रकट होकर भी स्वयं को गुप्त रखता है।

सीढ़ियाँ समाप्त होते ही नमी का पहला झोंका चेहरे से टकराया। हवा में चूना पत्थर की गंध थी और कहीं-कहीं से लगातार टपकती जल-बूँदें समय की घड़ी की तरह सुनाई पड़ रही थीं। विद्युत बल्बों की कतारें थीं, लेकिन उनका प्रकाश अँधेरे को परास्त नहीं कर पा रहा था। वह केवल इतना भर करता था कि मनुष्य रास्ता न भूल जाए।

गुफा के भीतर प्रवेश करते ही कामधेनु की प्रतिमा दिखाई दी। उसके नीचे स्थापित शिवलिंग पर गिरती पानी की बूँदें किसी अनवरत अभिषेक का आभास देती थीं। रेणु ने सहज श्रद्धा से हाथ जोड़ लिए। मैं कुछ देर तक उस दृश्य को देखता रहा। लगा जैसे प्रकृति स्वयं पुजारी बनकर सदियों से इस शिवलिंग का पूजन कर रही हो और मनुष्य केवल दर्शक है।

आगे बढ़ते हुए कई बार सिर झुकाना पड़ा। कहीं-कहीं गुफा इतनी नीची थी कि सावधानी न बरती जाए तो पत्थरों से टकराना निश्चित था। फर्श असमतल और फिसलन भरा था। हमारे पैरों की आहट और पानी की टप-टप मिलकर एक विचित्र लय बना रही थी। ऐसा लगता था मानो चट्टानें भी कोई मौन संगीत रच रही हों।

मुख्य गर्भगृह में पहुँचे तो विशाल शिवलिंग के सामने कुछ देर ठहर गए। उसके पीछे चट्टानों की प्राकृतिक बनावट नागफणों जैसी प्रतीत होती थी। श्रद्धालुओं की भीड़ बहुत अधिक नहीं थी, इसलिए वहाँ का मौन और भी गहरा लग रहा था। रेणु ने धीमे स्वर में कहा—“इतने अँधेरे में भी विश्वास अपना रास्ता खोज लेता है।” यह वाक्य पूरे दिन मेरे भीतर गूँजता रहा।

गुफा का दूसरा भाग अधिक रोमांचकारी था। सीढ़ियाँ और नीचे उतरती चली जाती थीं। रास्ता संकरा होता जाता और पानी की गर्जना तेज़ होती जाती। अब समझ में आने लगा कि सामने कहीं डेविस फॉल का जल इसी गुफा के भीतर अपनी अदृश्य यात्रा पूरी कर रहा है। नीचे पहुँचकर जब उस जलधारा को ऊपर से गिरते देखा तो मन विस्मय से भर गया। सड़क के दूसरी ओर जिस झरने को पर्यटक बाहर से देखते हैं, उसका यह भूमिगत रूप कहीं अधिक विराट और रहस्यमय था।

वहाँ कैमरे की सीमा समाप्त हो जाती है। कोई भी तस्वीर उस अनुभव को पकड़ नहीं सकती जिसमें चट्टानों के बीच हजारों वर्षों से गिरता पानी अपनी ही धुन में पृथ्वी को तराश रहा हो। तेज़ गर्जना के कारण बातचीत करना कठिन था। हमने केवल एक-दूसरे की ओर देखा और मुस्करा दिए। कई अनुभव शब्दों से नहीं, आँखों से साझा होते हैं।

गुफा से बाहर निकलते समय विष्णु की विशाल शेषशायी प्रतिमा दिखाई दी। लगा जैसे पृथ्वी के भीतर शिव का मौन और बाहर विष्णु की निद्रा भारतीय आध्यात्मिक कल्पना को एक साथ उपस्थित कर रहे हों। धार्मिक प्रतीक यहाँ प्रकृति से अलग नहीं थे, बल्कि उसी के विस्तार के रूप में उपस्थित थे।

महेंद्र गुफा की ओर बढ़ते हुए पोखरा का शहरी शोर धीरे-धीरे पीछे छूटता जाता है। सड़क के दोनों ओर फैली हरियाली, बीच-बीच में चरते मवेशी और दूर दिखाई देती पहाड़ियों के बीच यह अनुमान लगाना कठिन है कि धरती की सतह के ठीक नीचे एक ऐसा संसार छिपा हुआ है जिसकी रचना में प्रकृति ने हजारों वर्षों का समय लगाया है। गुप्तेश्वर महादेव गुफा की आध्यात्मिक अनुभूति के बाद महेंद्र गुफा का अनुभव बिल्कुल भिन्न था। यहाँ आस्था की घंटियाँ नहीं थीं, बल्कि चट्टानों की निस्तब्ध भाषा थी। यहाँ पूजा का विधान नहीं, बल्कि भूगर्भ का मौन इतिहास था।

मैं और मेरी शिक्षिका पत्नी रेणु कुमारी प्रवेश द्वार से भीतर उतरे तो सबसे पहले ठंडी और नम हवा ने हमारा स्वागत किया। बाहर जून की धूप थी, किंतु भीतर तापमान अचानक बदल गया। ऐसा लगा जैसे पृथ्वी ने अपनी गोद में एक अलग ही ऋतु सँजो रखी हो। प्रवेश मार्ग पर लगे बल्बों की धुँधली रोशनी केवल इतना भर कर रही थी कि रास्ता दिखाई देता रहे, लेकिन गुफा का वास्तविक रहस्य उसी अर्ध-अँधेरे में सुरक्षित था। रोशनी और छाया का यह खेल गुफा को किसी प्राचीन चित्रशाला का रूप दे रहा था।

कुछ ही दूर बढ़ने पर छत से लटकती चूना-पत्थर की लंबी संरचनाएँ दिखाई देने लगीं। कहीं वे शिव की जटाओं जैसी प्रतीत होती थीं, कहीं किसी तपस्वी की बढ़ी हुई दाढ़ी जैसी और कहीं किसी झूमर की तरह हवा में स्थिर लटकी हुई। नीचे धरती से ऊपर उठती शंक्वाकार संरचनाएँ मानो उन्हें छू लेने के लिए सदियों से प्रयत्नशील थीं। प्रकृति का यह धीमा निर्माण देखकर मन में बार-बार यह विचार आता कि मनुष्य जिस काम को मशीनों से कुछ दिनों में पूरा कर लेता है, प्रकृति उसे एक-एक बूँद गिराकर हजारों वर्षों में पूर्ण करती है।

रेणु हर कुछ कदम पर रुक जातीं और किसी नई आकृति की ओर संकेत करतीं। एक जगह उन्हें चट्टान में हाथी का सिर दिखाई दिया, दूसरी जगह किसी योगी की ध्यानमग्न मुद्रा। मैं मुस्कराकर कहता कि यह हमारी कल्पना है, पर अगले ही क्षण स्वयं किसी पत्थर में शिवलिंग का आभास खोजने लगता। महेंद्र गुफा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह हर दर्शक को अपनी कल्पना का स्वतंत्र आकाश देती है। कोई उसे भूविज्ञान की प्रयोगशाला समझता है, कोई देवताओं का निवास और कोई समय की मूर्त कविता।

जैसे-जैसे हम भीतर बढ़ते गए, गुफा का अँधेरा गहरा होता गया। कई स्थानों पर रास्ता ऊबड़-खाबड़ था। छोटे-छोटे पत्थर पैरों के नीचे खिसकते और हल्की चरमराहट पैदा करते। छत से टपकती जल-बूँदें कभी कंधे पर गिरतीं तो कभी हथेली पर। उन बूँदों को छूकर लगता था कि यह केवल पानी नहीं, हजारों वर्षों से चट्टानों में छनकर आया हुआ समय है।

गुफा के एक विशाल कक्ष में पहुँचकर हम कुछ देर रुक गए। ऊपर दृष्टि उठाई तो अनगिनत स्टैलेक्टाइट्स किसी जमे हुए जलप्रपात की तरह लटके हुए थे। नीचे उगते स्टैलेग्माइट्स उनके मौन प्रतिबिंब जैसे लगते थे। दोनों के बीच का अंतराल ऐसा प्रतीत होता था मानो धरती और आकाश एक-दूसरे को छूने की चिरंतन आकांक्षा में स्थिर हो गए हों। वहाँ खड़े होकर मनुष्य स्वयं को बहुत छोटा महसूस करता है। सभ्यताओं का इतिहास, राजाओं की विजय, युद्ध और सीमाएँ—सब कुछ इन चट्टानों के सामने क्षणभंगुर लगता है।

महेंद्र गुफा का वातावरण गुप्तेश्वर की तरह धार्मिक नहीं है, इसलिए यहाँ मन अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र होकर प्रकृति से संवाद करता है। कहीं कोई घंटा नहीं बज रहा, कोई मंत्रोच्चार नहीं हो रहा, फिर भी एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव भीतर उतरता चला जाता है। शायद इसलिए कि यहाँ प्रकृति स्वयं अपनी उपस्थिति का उद्घोष करती है। हर टपकती बूँद, हर चट्टान और हर गहरा कोना करोड़ों वर्षों की पृथ्वी-कथा का एक मौन अध्याय है।

एक जगह बिजली की हल्की रोशनी पड़ने पर चट्टानों का रंग बदलता हुआ दिखाई दिया। कहीं हल्का पीला, कहीं धूसर, कहीं भूरा और कहीं दूधिया सफेद। ऐसा लगता था मानो किसी अदृश्य चित्रकार ने खनिजों की कूची से इन दीवारों पर रंग भर दिए हों। रेणु ने धीरे से कहा—“यह किसी संग्रहालय से कहीं अधिक जीवित है।” सचमुच, यहाँ प्रदर्शित हर आकृति अभी भी बन रही है, बदल रही है, साँस ले रही है।

महेंद्र गुफा का सबसे बड़ा आकर्षण उसका मौन है। बाहर की दुनिया में जहाँ हर क्षण ध्वनियाँ हमारा पीछा करती हैं, वहीं इस गुफा में सुनाई देता है केवल पानी का टपकना और अपने ही कदमों की प्रतिध्वनि। कुछ पल आँखें बंद कर लेने पर ऐसा लगता है जैसे पृथ्वी के भीतर की धड़कन कानों तक पहुँच रही हो। उस क्षण मनुष्य अपनी समस्त आधुनिकता के बावजूद आदिम हो उठता है।

जब हम बाहर निकले तो तेज़ धूप आँखों में चुभने लगी। लगा जैसे किसी दूसरी दुनिया से लौटकर आए हों। पीछे मुड़कर देखा तो साधारण-सा प्रवेश द्वार उस अद्भुत संसार का संकेत भी नहीं देता था जो उसके भीतर छिपा हुआ है। मैंने रेणु से कहा कि महेंद्र गुफा केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि समय का जीवित संग्रहालय है, जहाँ हर चट्टान एक पुस्तक है और हर जल-बूँद उसका धीरे-धीरे लिखा जा रहा नया वाक्य।






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परिचय
लक्ष्मीकांत मुकुल 
जन्म – 08 जनवरी 1973
शिक्षा – विधि स्नातक 
किसान कवि। कवितायें एवं आलेख विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित । दो कविता संकलन “लाल चोंच वाले पंछी’’ व  "घिस रहा है धान का कटोरा" और ग्रामीण इतिहास पर केंद्रित पुस्तक "यात्रियों के नजरिए में शाहाबाद" प्रकाशित।

संपर्क :-
ईमेल – kvimukul12111@gmail.com

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