सोमवार, 21 अक्टूबर 2019

लक्ष्मीकांत मुकुल की ग़ज़ल

कोहरे से झांकता हुआ आया
मांगी थी रोशनी ये क्या आया

सूर्य - रथ पर सवार था कोई
उसके आते ही जलजला आया

घोंसले पंछियों के फिर उजड़े
फिर कहीं से बहेलिया आया

दूर अब भी बहार आँखों से
दरमियाँ बस ये फ़ासला आया

काकी की रेत में भूली बटुली
मेघ गरजा तो जल बहा आया

जो गया था उधर उम्मीदों से
उसका चेहरा बुझा बुझा आया

बागों में शोख तितलियां भी थीं
पर नहीं फूल का पता आया

_लक्ष्मीकांत मुकुल

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