सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ_ लक्ष्मीकांत मुकुल


कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ
_ लक्ष्मीकांत मुकुल



सोन नदी बिहार की कृषि-अर्थव्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में है। इसके किनारे विकसित सोन नहर प्रणाली ने शाहाबाद और दक्षिण-पश्चिम बिहार के विशाल भूभाग को लंबे समय तक सिंचाई का आधार दिया है। लेकिन इस व्यवस्था की एक मूलभूत कमजोरी है—इंद्रपुरी बराज पानी को नियंत्रित तो कर सकता है, पर बड़े पैमाने पर मानसूनी जल का दीर्घकालीन भंडारण नहीं कर सकता। यही कमी कदवन जलाशय परियोजना की अवधारणा के पीछे रही है।
आज यह परियोजना केवल एक बाँध बनाने की योजना नहीं है। यह प्रश्न है कि मानसून में उपलब्ध अतिरिक्त सोन जल का कितना हिस्सा सुरक्षित रखकर सूखे मौसम में खेती, पेयजल और अन्य आवश्यकताओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है; और यह काम बिहार, झारखंड तथा उत्तर प्रदेश के बीच जल-अधिकारों और स्थानीय आबादी के हितों का संतुलन बनाकर कैसे किया जाए।
कहाँ है कदवन परियोजना?
जिसे मूल रूप से कदवन जलाशय परियोजना (Kadhwan Reservoir Scheme) कहा गया, उसका प्रस्तावित बाँध सोन नदी पर बिहार और वर्तमान झारखंड की सीमा के निकट है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार प्रस्तावित बाँध की धुरी झारखंड के गढ़वा जिले के कदवन क्षेत्र में दाहिने तट और बिहार के रोहतास जिले के नौहट्टा प्रखंड स्थित जदुनाथपुर पंचायत के मटियावां गांव- क्षेत्र में बाएँ तट के बीच प्रस्तावित रही है। यह स्थल इंद्रपुरी बराज से लगभग 70 किलोमीटर ऊपर की ओर है। बाद में झारखंड के गठन के बाद परियोजना का नाम इंद्रपुरी जलाशय परियोजना (Indrapuri Reservoir Project) कर दिया गया। 


इस अवस्थिति को समझना इसलिए महत्वपूर्ण है कि परियोजना का लाभ केवल बाँध के आसपास के क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसका मूल उद्देश्य सोन नहर प्रणाली को अधिक भरोसेमंद जल उपलब्ध कराना है। इसलिए इसका प्रभाव रोहतास, औरंगाबाद, भोजपुर, बक्सर, कैमूर आदि सोन कमांड क्षेत्र के कृषि भूभाग तक पहुँच सकता है। 2026 के बिहार-झारखंड समझौते के संदर्भ में केंद्र सरकार ने बिहार के भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, गया और पटना तथा झारखंड के पलामू और गढ़वा क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल लाभ की बात कही है। 


परियोजना की मूल आवश्यकता क्या है?
कदवन परियोजना की सबसे मजबूत दलील पानी की कमी नहीं, बल्कि पानी के समय और स्थान की समस्या है।
केंद्रीय जल आयोग के परियोजना-स्थिति दस्तावेज के अनुसार 1973 के बाणसागर समझौते में बिहार के लिए सोन जल का 7.75 MAF आवंटन निर्धारित था। लेकिन सोन नहर प्रणाली को मिलने वाला पानी काफी हद तक ऊपरी क्षेत्रों से आने वाले नियंत्रित प्रवाह और मानसूनी उपलब्धता पर निर्भर है। आयोग के अनुसार मानसून में उपलब्ध पानी के बड़े हिस्से को ऊपरी भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण उपयोग में नहीं लाया जा पाता। 


यहीं जलाशय की उपयोगिता सामने आती है।
मानसून में अधिक पानी → जलाशय में संचय → रबी/ग्रीष्म में नियंत्रित निकासी → सोन नहरों में अपेक्षाकृत स्थिर जलापूर्ति।
यदि यह व्यवस्था सफल होती है तो सिंचाई का संकट केवल वर्षा पर निर्भर नहीं रहेगा। किसानों के लिए इसका अर्थ होगा कि धान की रोपनी, गेहूँ, दलहन, तिलहन और अन्य फसलों की सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता अधिक पूर्वानुमेय हो सकती है।
साथ ही, नहरों में नियमित पानी उपलब्ध होने से भूजल पर कृषि की निर्भरता कम करने की संभावना भी बनती है। लेकिन इसे स्वतः सिद्ध लाभ मानना उचित नहीं होगा; वास्तविक लाभ जलाशय के संचालन, नहरों की स्थिति और जल-वितरण की दक्षता पर निर्भर करेगा।
जलविद्युत भी, लेकिन मुख्य उद्देश्य सिंचाई
कदवन परियोजना की प्रारंभिक अवधारणा में जलविद्युत उत्पादन भी शामिल था। केंद्रीय जल आयोग के उपलब्ध 2018 PPR के अनुसार संशोधित प्रस्ताव में चार इकाइयों में 75-75 मेगावाट, यानी कुल 300 मेगावाट विद्युत उत्पादन की क्षमता प्रस्तावित थी। प्रस्तावित Full Reservoir Level (FRL) 169 मीटर, Maximum Water Level 171 मीटर और Minimum Drawdown Level 160.50 मीटर रखा गया था। 

इससे स्पष्ट है कि परियोजना बहुउद्देशीय स्वरूप रखती है। फिर भी इसकी बुनियादी उपयोगिता को केवल बिजली उत्पादन से नहीं आँकना चाहिए। इसका केंद्रीय प्रश्न सोन नहर प्रणाली के लिए जल-सुरक्षा है।
विवाद इतना लंबा क्यों चला?
कदवन परियोजना की कहानी तकनीकी कठिनाई से अधिक अंतरराज्यीय जल-राजनीति और स्थानीय प्रभावों की कहानी रही है।
झारखंड के गठन के बाद 1973 के मूल सोन जल-बंटवारा ढाँचे में परिस्थितियाँ बदल गईं। झारखंड ने यह प्रश्न उठाया कि अविभाजित बिहार के लिए निर्धारित सोन जल में वर्तमान झारखंड का हिस्सा किस प्रकार सुनिश्चित होगा। केंद्रीय जल आयोग के 2025 के आधिकारिक उत्तर के अनुसार बिहार ने दिसंबर 2018 में परियोजना की PPR प्रस्तुत की थी। उसे उत्तर प्रदेश और झारखंड की टिप्पणियों के लिए भेजा गया। झारखंड ने पहले जल-बंटवारे का प्रश्न सुलझाने की आवश्यकता जताई और अंतरराज्यीय सहमति न बनने के कारण CWC ने मार्च 2022 में प्रस्ताव राज्य को वापस कर दिया था। 


इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश की भी तकनीकी आपत्ति थी। CWC के अनुसार प्रस्तावित जलाशय का FRL यदि अधिक रखा जाता तो उससे उत्तर प्रदेश के ओबरा पावरहाउस के Tail Water Level पर प्रभाव पड़ सकता था। इसी कारण FRL को 173 मीटर से घटाकर 169 मीटर करने का प्रश्न उठा और बाद के प्रस्ताव में 169 मीटर FRL तथा 171 मीटर MWL स्वीकार किए गए। 


अर्थात विवाद का एक ही कारण नहीं था—
बिहार की सिंचाई और जल-संचयन की आवश्यकता;
झारखंड का जल-अधिकार;
उत्तर प्रदेश की परियोजनाओं पर संभावित प्रभाव;
जलाशय से होने वाला डूब क्षेत्र;
विस्थापन और पुनर्वास;
तथा परियोजना की लागत और लाभ के बँटवारे का प्रश्न।
सबसे संवेदनशील मुद्दा—डूब क्षेत्र और विस्थापन
किसी भी बड़े जलाशय को केवल उसके लाभ से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक मूल्य से भी परखा जाना चाहिए।
यदि किसी क्षेत्र में बाँध बनता है तो केवल नदी की धारा ही नहीं बदलती; खेत, गाँव, सड़कें, वनक्षेत्र, धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल और लोगों की आजीविका भी प्रभावित हो सकती है। कदवन के पुराने प्रस्तावों को लेकर झारखंड के गढ़वा-पलामू क्षेत्र में डूब और विस्थापन की आशंकाएँ इसी कारण महत्वपूर्ण रही हैं।
इसलिए किसी भी नए DPR में केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि कितनी भूमि डूबेगी। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि—
कितने परिवार प्रभावित होंगे, कितनी कृषि भूमि जाएगी, कितने सार्वजनिक संसाधन प्रभावित होंगे, पुनर्वास कहाँ होगा, मुआवजा कैसे निर्धारित होगा और परियोजना से स्थानीय लोगों को प्रत्यक्ष लाभ क्या मिलेगा।
यही वह कसौटी है जिस पर किसी बड़े जलाशय की सामाजिक स्वीकार्यता तय होती है।
2026 : क्या अब कदवन की सबसे बड़ी बाधा दूर हो गई?
यहाँ 2026 का घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है।
31 अगस्त 2026 को बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी जल-बंटवारे से संबंधित समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए। केंद्र सरकार के अनुसार इस समझौते का उद्देश्य दोनों राज्यों के लंबे समय से चले आ रहे जल-विवाद का समाधान करना है। 

इस घटनाक्रम से कदवन/इंद्रपुरी परियोजना के लिए एक महत्वपूर्ण अंतरराज्यीय बाधा कम हुई है। 2026 में बिहार सरकार ने भी परियोजना को इंद्रपुरी जलाशय के रूप में आगे बढ़ाने की बात कही है। 

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है:
जल-बंटवारा समझौता परियोजना का निर्माण शुरू हो जाने के बराबर नहीं है।
अभी भी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, जल-विज्ञान, जलाशय-डिजाइन, लागत, भूमि एवं पुनर्वास, पर्यावरणीय स्वीकृतियों और केंद्रीय तकनीकी मूल्यांकन जैसे चरण निर्णायक होंगे। CWC के उपलब्ध परियोजना दस्तावेज में भी PPR के विभिन्न तकनीकी पक्षों पर टिप्पणियों और अनुपालनों की प्रक्रिया दर्ज है तथा DPR की ओर आगे बढ़ने के लिए प्रक्रियात्मक स्वीकृतियों की आवश्यकता बताई गई थी। 


इसलिए 2026 को 'परियोजना बन गई' का वर्ष नहीं, बल्कि 'परियोजना के लिए अंतरराज्यीय रास्ता खुलने' का वर्ष कहना अधिक सटीक होगा।
संभावनाएँ : केवल सिंचाई से कहीं आगे
यदि परियोजना तकनीकी और सामाजिक रूप से व्यवहार्य रूप में आगे बढ़ती है, तो इसके संभावित प्रभाव कई स्तरों पर हो सकते हैं।
1. सोन नहर प्रणाली को जल-सुरक्षा
सबसे बड़ा लाभ यही हो सकता है कि नहरों को केवल तत्काल नदी-प्रवाह पर निर्भर रहने के बजाय जलाशय से नियंत्रित आपूर्ति मिले।
2. कृषि उत्पादन में स्थिरता
सिंचाई की अनिश्चितता कम होने पर फसल-चक्र में विविधता और दूसरी फसल की संभावना बढ़ सकती है।
3. पेयजल
2026 के अंतरराज्यीय समझौते को केंद्र सरकार ने दोनों राज्यों के बड़े ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल उपलब्धता से भी जोड़ा है। 

4. जलविद्युत
2018 PPR में 300 MW की प्रस्तावित क्षमता थी। हालांकि अंतिम क्षमता वर्तमान DPR और तकनीकी मूल्यांकन पर निर्भर करेगी। 

5. भूजल पर दबाव में संभावित कमी
यदि नहर प्रणाली वास्तव में नियमित और पर्याप्त जल उपलब्ध करा सके, तो सिंचाई के लिए अत्यधिक भूजल दोहन को कम करने में सहायता मिल सकती है।
लेकिन खतरे भी कम नहीं हैं
परियोजना की संभावनाओं को स्वीकार करते समय चार प्रश्नों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पहला—क्या उपलब्ध जल वास्तव में उतना है जितना परियोजना को चाहिए?
जलवायु परिवर्तन और वर्षा की अनिश्चितता के दौर में पुराने hydrological assumptions की पुनः जाँच जरूरी है।
दूसरा—क्या जलाशय की लागत और लाभ का अनुपात स्वीकार्य होगा?
बड़े बाँध की वास्तविक लागत केवल निर्माण लागत नहीं होती। पुनर्वास, भूमि, पर्यावरणीय क्षति, नहरों का आधुनिकीकरण और दीर्घकालीन रखरखाव भी इसमें शामिल होना चाहिए।
तीसरा—क्या स्थानीय लोगों को केवल मुआवजा मिलेगा या विकास में हिस्सेदारी भी?
प्रभावित परिवारों को बेहतर पुनर्वास, आजीविका, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था परियोजना की सामाजिक वैधता के लिए आवश्यक होगी।
चौथा—क्या जलाशय बनने के बाद सोन नहर प्रणाली आधुनिक भी होगी?
यदि जलाशय में पानी जमा हो जाए लेकिन पुरानी और क्षतिग्रस्त नहरों में पानी की भारी हानि होती रहे, तो परियोजना का अपेक्षित लाभ घट सकता है।
कदवन से इंद्रपुरी तक : नाम बदला है, प्रश्न नहीं
कदवन परियोजना का नाम बदलकर इंद्रपुरी जलाशय परियोजना होना अपने आप में समाधान नहीं है। परियोजना का वास्तविक प्रश्न वही है—
क्या सोन के मानसूनी पानी को वैज्ञानिक ढंग से संग्रहित कर दक्षिण-पश्चिम बिहार और झारखंड के सूखा-प्रवण क्षेत्रों को अधिक भरोसेमंद जल उपलब्ध कराया जा सकता है, और क्या यह काम प्रभावित लोगों के अधिकारों की रक्षा करते हुए किया जा सकता है?
2026 के समझौते ने इस प्रश्न के राजनीतिक-अंतरराज्यीय पक्ष में महत्वपूर्ण बदलाव जरूर किया है। लेकिन आगे की सफलता DPR की गुणवत्ता, जल-विज्ञान के पुनर्मूल्यांकन, वित्तीय व्यवहार्यता, पर्यावरणीय आकलन और सबसे बढ़कर न्यायपूर्ण पुनर्वास पर निर्भर करेगी।
निष्कर्ष : बिहार के लिए अवसर, पर बिना शर्त नहीं
कदवन जलाशय की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि यह सोन नदी के समय-असंतुलित जल को कृषि और पेयजल की अधिक नियमित उपलब्धता में बदलने की संभावना रखता है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस लाभ की कीमत कहीं उन लोगों को न चुकानी पड़े जिनकी जमीन और बस्तियाँ जलाशय के नीचे चली जाएँ।
इसलिए परियोजना को केवल “बिहार के किसानों को पानी देने वाला बाँध” या केवल “विस्थापन पैदा करने वाली परियोजना” के रूप में देखना दोनों ही अधूरे दृष्टिकोण होंगे।
सही दृष्टिकोण होगा—सोन बेसिन की समग्र जल-व्यवस्था के रूप में इसे देखना।
यदि नया DPR आधुनिक जल-विज्ञान, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय प्रवाह, नहर आधुनिकीकरण, पारदर्शी जल-वितरण और प्रभावित परिवारों के अधिकारों को एक साथ लेकर बनाया जाता है, तो कदवन/इंद्रपुरी परियोजना सोन क्षेत्र की दीर्घकालीन जल-सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बन सकती है। लेकिन यदि पुराने ढाँचे को केवल नए नाम और नए समझौते के सहारे आगे बढ़ाया गया, तो वर्षों पुराना विवाद नए रूप में लौट सकता है।
अतः 2026 के बाद असली परीक्षा बाँध बनाने की नहीं, बल्कि ऐसा जलाशय बनाने की है जिसका लाभ बिहार और झारखंड दोनों के लोगों को मिले और जिसकी सामाजिक तथा पर्यावरणीय कीमत न्यायसंगत हो।



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परिचय



लक्ष्मीकांत मुकुल 
जन्म – 08 जनवरी 1973
शिक्षा – विधि स्नातक 
किसान कवि। कवितायें एवं आलेख विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित । दो कविता संकलन “लाल चोंच वाले पंछी’’ व  "घिस रहा है धान का कटोरा" और ग्रामीण इतिहास पर केंद्रित पुस्तक "यात्रियों के नजरिए में शाहाबाद" प्रकाशित।

संपर्क :-
ग्राम – मैरा, पोस्ट – सैसड,
भाया – धनसोई ,
बक्सर,
(बिहार) – 802117
ईमेल – kvimukul12111@gmail.com
मोबाइल नंबर - 6202077236

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