सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

भोजपुरी लोककथाओं की लुप्त होती दुनिया : स्मृति, समाज और प्रतिरोध की मौखिक परंपरा_ लक्ष्मीकांत मुकुल


भोजपुरी लोककथाओं की लुप्त होती दुनिया : स्मृति, समाज और प्रतिरोध की मौखिक परंपरा
_ लक्ष्मीकांत मुकुल 

प्रस्तावना

भोजपुरी लोककथाएँ केवल मनोरंजन के लिए कही-सुनी जाने वाली कहानियाँ नहीं हैं। वे भोजपुरी समाज की सामूहिक स्मृति, सामाजिक अनुभव, जीवन-दर्शन, नैतिक चेतना और लोक-बुद्धि की जीवित अभिव्यक्तियाँ रही हैं। इन कथाओं में राजा-रानी और देवी-देवताओं के साथ-साथ किसान, मजदूर, लकड़हारा, चिरई, सियार, साँप, चींटी, हाथी और यहाँ तक कि निर्जीव वस्तुएँ भी बोलती हैं। इसीलिए भोजपुरी लोककथा का संसार केवल कल्पना का संसार नहीं है; वह लोकजीवन के अनुभवों से निर्मित एक ऐसा सांस्कृतिक दस्तावेज है, जिसमें समाज स्वयं को पहचान सकता है।

कभी भोजपुरी अंचल के गाँवों में रात केवल अँधेरे का नाम नहीं थी। वह कथा की रात होती थी। बच्चे दादी-नानी की चारपाई के पास बैठकर कहानी सुनते थे। खेत-खलिहान की रखवाली करते किसान और अगोरिया रात के सन्नाटे को लंबी लोककथाओं से भर देते थे। एक कथा समाप्त होती तो दूसरी शुरू हो जाती और कई बार कहानी कई-कई रातों तक चलती रहती। कथावाचक के पास लिखी हुई कोई पुस्तक नहीं होती थी, फिर भी उसकी स्मृति में पूरा संसार सुरक्षित रहता था।

आज वह संसार तेजी से सिकुड़ गया है। मोबाइल फोन, टेलीविजन, इंटरनेट, बदलती जीवन-शैली, संयुक्त परिवारों का विघटन और गाँवों में सामूहिक जीवन के कम होते अवसरों ने लोककथा सुनने-सुनाने की परंपरा को गहरा आघात पहुँचाया है। समस्या केवल इतनी नहीं है कि कुछ पुरानी कहानियाँ अब सुनाई नहीं जातीं। असली संकट यह है कि उनके साथ वह लोक-स्मृति, भाषा, मुहावरा, कथन-शैली और सामाजिक अनुभव भी विलुप्त हो रहा है, जिसने उन्हें जन्म दिया था।

इस संदर्भ में भोजपुरी की दो लोककथाएँ—‘कउवाहँकनी’ और ‘चिरई और दाल का दाना’—विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। पहली कथा में स्त्री के साथ होने वाले छल, सत्ता की अधीरता, मातृत्व और अंततः सत्य की विजय का आख्यान है; दूसरी कथा में एक छोटी-सी चिरई के माध्यम से न्याय, अधिकार और सामूहिक शक्ति का अद्भुत रूपक निर्मित होता है। दोनों कथाएँ मिलकर भोजपुरी लोकमानस की गहराई और उसकी सामाजिक दृष्टि को सामने लाती हैं।

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1. लोककथा : लोक की स्मृति का जीवित दस्तावेज

लोककथा का सबसे बड़ा गुण यह है कि उसका कोई एक लेखक नहीं होता। वह पीढ़ियों के अनुभवों से बनती है। कोई व्यक्ति उसे सुनाता है, दूसरा उसमें कुछ जोड़ देता है, तीसरा अपनी परिस्थिति के अनुसार उसका रूप बदल देता है और चौथी पीढ़ी उसे फिर नए ढंग से सुनाती है। इस प्रक्रिया में लोककथा किसी व्यक्ति की संपत्ति न रहकर समुदाय की संपत्ति बन जाती है।

भोजपुरी लोककथाओं में यह विशेषता और भी स्पष्ट दिखाई देती है। भोजपुरी समाज मूलतः मजबूत मौखिक परंपरा वाला समाज रहा है। लोकगीत, सोहर, कजरी, बिरहा, चैता, कहावत, मुहावरा और लोककथा—इन सभी ने लिखित साहित्य से बाहर एक विशाल सांस्कृतिक संसार निर्मित किया।

इस संसार में भाषा किताब से नहीं, जीवन से आती है। इसलिए लोककथा में मिलने वाले संबोधन, ध्वनियाँ, दोहराव, तुक, संवाद और स्थानीय शब्द केवल भाषिक सामग्री नहीं हैं; वे उस समाज की मानसिक बनावट के प्रमाण हैं।

लोककथा की एक और विशेषता है कि वह जटिल सामाजिक प्रश्नों को सरल प्रतीकों में व्यक्त करती है। राजा सत्ता का प्रतीक बन जाता है, रानी सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था का, चिरई सामान्य जन की, चींटी सामूहिक शक्ति की और खूँटा उस छोटी-सी बाधा का जिसे हटाना आवश्यक है, चाहे वह देखने में कितनी ही मामूली क्यों न लगे।

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2. ‘कउवाहँकनी’ : स्त्री, सत्ता और सत्य की कथा

‘कउवाहँकनी’ भोजपुरी लोकमानस की उन कथाओं में है जिनमें पारिवारिक ईर्ष्या से शुरू होकर सत्ता, स्त्री और न्याय का प्रश्न सामने आता है।

कथा का आरंभ एक राजा की तीन रानियों से होता है। पहली दो रानियाँ संतानहीन हैं, जबकि तीसरी रानी के गर्भवती होते ही उनके भीतर ईर्ष्या पैदा हो जाती है। यहाँ लोककथा बहुत सहज ढंग से एक गहरी सामाजिक सच्चाई को पकड़ती है—जहाँ मातृत्व को स्त्री की प्रतिष्ठा और सामाजिक स्वीकार्यता से जोड़ दिया जाता है, वहाँ संतान का जन्म केवल निजी सुख नहीं रह जाता; वह सत्ता और प्रतिस्पर्धा का प्रश्न भी बन जाता है।

तीसरी रानी के प्रसव का प्रसंग कथा का निर्णायक बिंदु है। राजा का शिकार पर जाना, घंटी देकर सहायता का आश्वासन देना और फिर घंटी बजाने पर नाराज होकर लौट जाना—ये घटनाएँ केवल कथा को आगे बढ़ाने वाली घटनाएँ नहीं हैं। इनमें पति-पत्नी के बीच विश्वास और सत्ता-संबंधों की एक झलक दिखाई देती है।

जब वास्तविक प्रसव के समय राजा नहीं आता और बड़ी रानियाँ तीसरी रानी को चूल्हे में मुँह डालकर शांत रहने की सलाह देती हैं, तब कथा का संसार अचानक क्रूर हो जाता है। तीसरी रानी बच्चों को जन्म देती है, लेकिन उसके सामने ईंट-पत्थर रख दिए जाते हैं। उसके नवजात बच्चों को छिपा दिया जाता है और राजा के सामने झूठ प्रस्तुत किया जाता है।

यहाँ लोककथा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—सत्य बोलने की शक्ति किसके पास है?

राजा के पास सत्ता है, लेकिन सत्य नहीं। बड़ी रानियों के पास षड्यंत्र है, लेकिन नैतिक शक्ति नहीं। तीसरी रानी के पास सत्य है, लेकिन उसे सिद्ध करने का कोई साधन नहीं।

इस तरह कथा एक ऐसी स्थिति बनाती है जिसमें सामाजिक प्रतिष्ठा और सत्ता सत्य पर भारी पड़ती दिखाई देती है।

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3. ‘कउवाहँकनी’ में स्त्री की त्रासदी

तीसरी रानी को राजा द्वारा महल से निकाल दिया जाना और ‘कउवाहँकनी’ बना दिया जाना इस कथा का अत्यंत मार्मिक पक्ष है।

यहाँ लोककथा स्त्री के उस सामाजिक संकट को सामने लाती है जिसमें उसके बारे में निर्णय लेने वाला समाज पुरुष-सत्ता है। वह स्वयं अपनी निर्दोषता सिद्ध नहीं कर सकती। उसका मातृत्व भी उसके विरुद्ध प्रमाण बना दिया जाता है।

लेकिन लोककथा का लोकन्याय आधुनिक अदालत की तरह काम नहीं करता। यहाँ सत्य को अंततः कोई न कोई पहचानता है। मिट्टी लेने वाली कोहइनियाँ जब सुंदर बच्चों को देखती है और उन्हें अपने घर ले जाती है, तो लोकसमाज की एक दूसरी शक्ति सामने आती है—साधारण मनुष्य की करुणा।

राजमहल जहाँ असत्य का केंद्र बन गया था, वहीं एक सामान्य ग्रामीण स्त्री बच्चों को जीवन देती है।

यह विरोधाभास अत्यंत अर्थपूर्ण है।

राजा के महल में सत्य हारता है, लेकिन गाँव की मिट्टी में सत्य बचा रहता है।

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4. मिट्टी से जन्मा सत्य

कथा में बच्चों का मिट्टी के बीच मिलना केवल एक चमत्कारिक घटना नहीं है। भोजपुरी लोकजीवन में मिट्टी जीवन का आधार है। किसान का संसार मिट्टी से शुरू होकर मिट्टी तक जाता है। इसलिए मिट्टी में छिपे बच्चे लोकमानस में पुनर्जन्म लेते सत्य की तरह दिखाई देते हैं।

जिन बच्चों को सत्ता ने मिटा देने की कोशिश की थी, वही बच्चे मिट्टी से फिर सामने आते हैं।

यहाँ लोककथा एक अद्भुत संदेश देती है—

सत्य को कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता।

कथा के अंत में बच्चों की बातचीत राजा तक पहुँचती है और धीरे-धीरे पूरा षड्यंत्र खुल जाता है। राजा को अपनी भूल का पता चलता है। तीसरी रानी वापस महल में आती है और बड़ी रानियों को दंड मिलता है।

लोककथा अपने ढंग से न्याय स्थापित करती है।

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5. ‘कउवाहँकनी’ का सुखद अंत और लोकन्याय

भोजपुरी लोककथाओं में सुखद अंत की परंपरा महत्त्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह नहीं कि लोकसमाज वास्तविक जीवन की कठिनाइयों से अनजान था। इसके उलट, शायद इसलिए कि वास्तविक जीवन में न्याय हमेशा समय पर नहीं मिलता था, लोककथा ने अपने संसार में न्याय की स्थापना की।

कथा का अंत इस विश्वास पर होता है कि बुराई अंततः पराजित होगी और सत्य की प्रतिष्ठा होगी।

यह लोकमानस की आशावादी शक्ति है।

लोककथा कहती है कि राजा भूल कर सकता है, समाज भ्रमित हो सकता है, ईर्ष्या षड्यंत्र कर सकती है, लेकिन अंततः सत्य अपना रास्ता खोज लेता है।

इस अर्थ में ‘कउवाहँकनी’ केवल राजा और तीन रानियों की कहानी नहीं है। यह सत्य और असत्य के बीच संघर्ष की लोकगाथा है।

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6. ‘चिरई और दाल का दाना’ : एक दाने से शुरू हुआ न्याय का प्रश्न

दूसरी कथा का संसार पूरी तरह अलग है, लेकिन उसका सामाजिक संदेश उतना ही गहरा है।

एक छोटी चिरई को चने की दाल का एक दाना मिलता है। दाल दलते समय उसका एक हिस्सा खूँटे में फँस जाता है। चिरई उसे निकाल नहीं पाती। वह पहले बढ़ई के पास जाती है।

उसकी पुकार अत्यंत सरल है—

«“बढ़ई-बढ़ई खूँटा चीर…”»

लेकिन बढ़ई उसे टाल देता है।

इसके बाद चिरई राजा के पास जाती है। राजा भी उसकी बात नहीं सुनता। रानी व्यस्त है। साँप तैयार नहीं। लाठी मदद नहीं करती। आग उदासीन है। सागर भी उसकी बात नहीं सुनता। हाथी भी उसकी समस्या को महत्व नहीं देता।

यह क्रम वास्तव में एक पूरे प्रशासनिक और सामाजिक ढाँचे का व्यंग्य बन जाता है।

छोटी-सी समस्या लेकर एक सामान्य प्राणी व्यवस्था के हर दरवाजे पर जाता है, लेकिन हर दरवाजा उसके लिए बंद है।

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7. ‘एक दाना’ नहीं, अपने हक का सवाल

कथा का सबसे धारदार वाक्य अंत में आता है। जब चिरई दाना प्राप्त कर लेती है और बढ़ई उससे पूछता है कि उसने एक दाने के लिए इतना हंगामा क्यों किया, तो चिरई का उत्तर कथा को सामान्य बाल-कहानी से उठाकर सामाजिक चेतना के स्तर पर ले जाता है—

«“सवाल एक दाना का नहीं, बल्कि अपने हक का है।”»

यही इस पूरी लोककथा का केंद्रीय दर्शन है।

दाना छोटा है, लेकिन अधिकार छोटा नहीं है।

समस्या मामूली है, लेकिन अन्याय मामूली नहीं है।

यदि किसी छोटे व्यक्ति की छोटी-सी समस्या को इसलिए अनदेखा किया जाए कि वह शक्तिशाली नहीं है, तो वह केवल उस व्यक्ति का नुकसान नहीं है; वह पूरे न्याय-तंत्र की कमजोरी है।

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8. चींटी : संख्या में छोटी, शक्ति में बड़ी

कथा का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है जब चिरई बड़े-बड़े लोगों और शक्तिशाली जीवों से निराश होकर चींटियों के पास जाती है।

यहाँ लोकबुद्धि अचानक अपना सबसे शक्तिशाली रूप प्रकट करती है।

राजा असफल रहा।

रानी असफल रही।

साँप, लाठी, आग, सागर और हाथी—सब असफल रहे।

लेकिन चींटियाँ सफल होती हैं।

क्यों?

क्योंकि वे संगठित हैं।

एक चींटी शायद हाथी को चुनौती न दे सके, लेकिन असंख्य चींटियाँ हाथी को विवश कर सकती हैं।

यह लोककथा का अत्यंत गहरा सामाजिक रूपक है।

व्यक्ति की शक्ति सीमित हो सकती है, लेकिन सामूहिकता की शक्ति बहुत बड़ी होती है।

लोकसमाज शायद आधुनिक राजनीतिक सिद्धांतों की भाषा नहीं जानता था, लेकिन उसने अपने अनुभव से यह समझ लिया था कि संगठित छोटे लोग बड़े से बड़े शक्तिशाली को भी विवश कर सकते हैं।

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9. सत्ता की श्रृंखला और भय का मनोविज्ञान

कथा में घटनाएँ एक श्रृंखला की तरह आगे बढ़ती हैं—

चींटी हाथी को विवश करती है।

हाथी सागर को।

सागर आग को।

आग लाठी को।

लाठी साँप को।

साँप रानी को।

रानी राजा को।

राजा बढ़ई को।

और अंततः बढ़ई खूँटा चीरता है।

यह क्रम लोककथा की अद्भुत संरचनात्मक विशेषता है।

जिस व्यवस्था में कोई भी नीचे वाले की बात नहीं सुनता, वहाँ ऊपर वाला भी तभी सक्रिय होता है जब उसे नीचे से आने वाले दबाव का अनुभव होता है।

कथा इस प्रकार सत्ता के पूरे ढाँचे पर व्यंग्य करती है।

यह व्यंग्य आज भी प्रासंगिक लगता है।

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10. भोजपुरी लोककथा का लोकतांत्रिक पक्ष

भोजपुरी लोककथा का संसार आश्चर्यजनक रूप से लोकतांत्रिक है।

राजा और चिरई एक ही कथा के पात्र हैं।

हाथी और चींटी एक ही सामाजिक संरचना में संवाद करते हैं।

निर्जीव वस्तुएँ भी बोलती हैं।

इससे लोककथा सत्ता और सामान्य जन के बीच की दूरी को तोड़ती है।

राजा सर्वशक्तिमान नहीं है।

हाथी अजेय नहीं है।

सागर अंतिम शक्ति नहीं है।

और चिरई असहाय नहीं है।

यह लोकमानस की कल्पनाशील लोकतांत्रिक चेतना है।

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11. दोनों कथाओं में समान सूत्र

पहली दृष्टि में ‘कउवाहँकनी’ और ‘चिरई और दाल का दाना’ बिल्कुल अलग कथाएँ लगती हैं। एक राजमहल की कथा है और दूसरी एक छोटी चिरई की। लेकिन दोनों को ध्यान से पढ़ने पर इनके भीतर कई समान सूत्र दिखाई देते हैं।

पहला सूत्र : अन्याय

‘कउवाहँकनी’ में तीसरी रानी के साथ अन्याय होता है।

‘चिरई और दाल का दाना’ में चिरई के अधिकार की उपेक्षा होती है।

दूसरा सूत्र : सत्ता की विफलता

पहली कथा में राजा बिना सत्य जाने निर्णय कर देता है।

दूसरी कथा में राजा एक छोटी प्रजा की समस्या सुनने से इनकार कर देता है।

तीसरा सूत्र : कमजोर की आवाज

पहली कथा में तीसरी रानी की आवाज दबा दी जाती है।

दूसरी कथा में चिरई की आवाज लगातार दबाई जाती है।

चौथा सूत्र : सत्य की वापसी

पहली कथा में बच्चों के माध्यम से सत्य सामने आता है।

दूसरी कथा में सामूहिक दबाव के माध्यम से चिरई को उसका अधिकार मिलता है।

पाँचवाँ सूत्र : लोकन्याय

दोनों कथाओं में अंततः न्याय स्थापित होता है।

यही भोजपुरी लोककथा की मूल शक्ति है—वह निराशा के बीच न्याय की कल्पना करती है।

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12. लोककथा में पशु-पक्षी क्यों बोलते हैं?

भोजपुरी लोककथाओं में चिरई, कौवा, सियार, लोमड़ी, साँप, हाथी और चींटी जैसे पात्रों की भरमार है।

इसका कारण केवल मनोरंजन नहीं है।

पशु-पक्षियों के माध्यम से कथाकार समाज की आलोचना अधिक स्वतंत्रता से कर सकता था। यदि कोई कथावाचक सीधे राजा या किसी शक्तिशाली व्यक्ति की आलोचना करे तो समस्या हो सकती थी; लेकिन यदि वही बात चिरई और हाथी के माध्यम से कही जाए, तो वह लोककथा बन जाती है।

इस प्रकार पशु पात्र लोकव्यंग्य के सुरक्षित माध्यम भी थे।

चिरई सामान्य व्यक्ति का प्रतिनिधित्व कर सकती है।

सियार चालाकी का।

हाथी शक्ति का।

चींटी सामूहिकता का।

साँप भय का।

और राजा सत्ता का।

यह प्रतीकात्मक संसार लोककथा को कई स्तरों पर अर्थवान बनाता है।

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13. लोककथा और भोजपुरी भाषा

लोककथा का सबसे बड़ा खजाना केवल उसकी कहानी नहीं, उसकी भाषा भी है।

“माई रे माई”, “धिया री धिया”, “बढ़ई-बढ़ई”, “राजा-राजा”, “रानी-रानी”—ऐसे संबोधन लोकभाषा के भावात्मक संसार को जीवित रखते हैं।

कथा में दोहराव भी महत्त्वपूर्ण है। एक ही संरचना बार-बार लौटती है। बच्चों को यह दोहराव आनंद देता है और उन्हें कथा याद रखने में भी सहायता करता है।

मौखिक परंपरा में यही दोहराव स्मृति की तकनीक था।

कथावाचक लिखित पाठ नहीं देखता था। उसे कथा याद रखनी होती थी। इसलिए संवाद, तुक, दोहराव और क्रमबद्धता ने उसकी स्मृति को सहारा दिया।

इस दृष्टि से लोककथा भोजपुरी भाषा की मौखिक पाठशाला थी।

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14. दादी-नानी की कहानी : घर की अनौपचारिक पाठशाला

लगभग तीन दशक पहले तक भोजपुरी क्षेत्र के गाँवों में दादी-नानी और घर के बड़े-बुजुर्ग बच्चों को रात में कहानी सुनाते थे।

यह केवल मनोरंजन का समय नहीं था।

उस समय बच्चे भाषा सीखते थे।

मुहावरे सीखते थे।

संबंधों की भाषा सीखते थे।

अच्छे-बुरे आचरण का फर्क समझते थे।

धैर्य, बुद्धिमत्ता, साहस और न्याय जैसे मूल्यों को कथा के पात्रों के माध्यम से समझते थे।

दादी-नानी किसी पाठ्यपुस्तक की तरह नैतिक शिक्षा नहीं देती थीं। वे कहानी सुनाती थीं और बच्चे कहानी के भीतर से नैतिकता खोजते थे।

यही लोकशिक्षा की विशिष्टता थी।

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15. खलिहान की रात और कथा की सामूहिकता

भोजपुरी लोककथा का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थल था—खलिहान।

फसल की रखवाली करने वाले अगोरिया रात-रात भर जागते थे। चारों ओर अँधेरा, दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की आवाज, खेतों की हवा और बीच में किसी बुजुर्ग कथावाचक की आवाज।

एक कथा शुरू होती।

फिर कोई श्रोता बीच में प्रश्न करता।

कथावाचक किसी पुराने प्रसंग को याद करता।

हँसी होती।

कभी भय पैदा होता।

कभी बच्चे उत्साहित होते।

और कभी कथा इतनी लंबी होती कि रात बीत जाती।

कई कथाएँ एक रात में पूरी नहीं होती थीं।

अगली रात वहीं से कथा फिर शुरू होती।

इस प्रकार लोककथा केवल कहानी नहीं थी; वह सामुदायिक समय का निर्माण करती थी।

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16. आज कहानी क्यों खत्म हो रही है?

आधुनिकता ने मनुष्य को सुविधाएँ दी हैं, लेकिन उसने उसके सामूहिक समय को भी बदल दिया है।

पहले परिवार एक साथ बैठता था।

अब हर व्यक्ति अपनी स्क्रीन के सामने बैठ सकता है।

पहले मनोरंजन सामूहिक था।

अब मनोरंजन निजी हो गया है।

पहले कहानी कहने वाला व्यक्ति परिवार का बुजुर्ग था।

अब कहानी कहने का काम स्क्रीन, वीडियो और डिजिटल मंच कर रहे हैं।

इस बदलाव को केवल ‘पुराना अच्छा था, नया खराब है’ जैसी सरल दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। आधुनिक तकनीक अपने साथ ज्ञान और अभिव्यक्ति के नए अवसर भी लाई है।

लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब नई तकनीक पुरानी स्मृति को पूरी तरह विस्थापित कर देती है।

यदि भोजपुरी लोककथाएँ केवल इंटरनेट पर किसी एक लिखित रूप में बची रह जाएँ और उन्हें बोलने वाला कोई न रहे, तो उनकी भाषा का जीवंत स्वर खो जाएगा।

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17. संकट केवल लोककथा का नहीं, लोकभाषा का भी है

लोककथा के खत्म होने का अर्थ भोजपुरी भाषा की एक पूरी परत के खत्म होने से है।

कथा के साथ स्थानीय शब्द चले जाते हैं।

संबोधन चले जाते हैं।

मुहावरे चले जाते हैं।

उच्चारण की विशिष्टता चली जाती है।

कथावाचन की लय चली जाती है।

और अंततः उस भाषा की वह आत्मीयता भी कम हो जाती है जो लिखित शब्दों में हमेशा पूरी तरह नहीं उतर सकती।

इसलिए भोजपुरी लोककथाओं का संरक्षण वास्तव में भोजपुरी की भाषिक विविधता और सांस्कृतिक स्मृति का संरक्षण है।

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18. लोककथा को केवल ‘बच्चों की कहानी’ समझना भूल है

लोककथाओं को अक्सर बच्चों की कहानियों के रूप में देखा जाता है। यह दृष्टि अधूरी है।

‘चिरई और दाल का दाना’ को यदि केवल बच्चों के मनोरंजन की कहानी माना जाए, तो उसका सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्य छूट जाएगा—“सवाल एक दाना का नहीं, बल्कि अपने हक का है।”

इसी प्रकार ‘कउवाहँकनी’ को केवल सौतेली रानियों की ईर्ष्या की कहानी मानना भी उसके सामाजिक अर्थ को सीमित कर देगा।

इन कथाओं में परिवार, सत्ता, स्त्री, न्याय, अधिकार, श्रम, वर्गीय संबंध और सामूहिक शक्ति जैसे प्रश्न मौजूद हैं।

लोककथा की भाषा सरल हो सकती है, लेकिन उसका अनुभव सरल नहीं होता।

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19. लोककथा में स्त्री की भूमिका

भोजपुरी लोककथा संसार में स्त्रियाँ केवल पीड़ित पात्र नहीं हैं।

वे कथावाचक भी हैं।

दादी, नानी, माँ और गाँव की बुजुर्ग महिलाएँ पीढ़ियों तक इन कथाओं को बचाती रही हैं।

‘कउवाहँकनी’ में तीसरी रानी पीड़ा का प्रतीक है, लेकिन कोहइनियाँ करुणा और संरक्षण की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है।

‘चिरई और दाल का दाना’ में रानी की भूमिका नकारात्मक रूप से शुरू होती है, लेकिन अंततः वही राजा को न्याय के प्रश्न पर सक्रिय करती है।

इसलिए लोककथाओं में स्त्री की भूमिका एकरेखीय नहीं है। उसमें पीड़ा, ईर्ष्या, मातृत्व, करुणा, विवेक और हस्तक्षेप—सभी दिखाई देते हैं।

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20. लोककथा का असली नायक कौन है?

यदि इन दोनों कथाओं से नायक चुनना हो तो उत्तर किसी राजा या राजकुमार का नाम नहीं होगा।

‘कउवाहँकनी’ में असली शक्ति सत्य की है।

‘चिरई और दाल का दाना’ में असली शक्ति सामूहिकता की है।

यानी भोजपुरी लोककथा का नायक अक्सर वही होता है जिसके पास राजसत्ता नहीं है।

छोटी चिरई।

चींटी।

मिट्टी में छिपे बच्चे।

एक सामान्य ग्रामीण स्त्री।

यही लोककथा का लोकतांत्रिक चरित्र है।

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21. आज के समय में ‘चिरई’ की प्रासंगिकता

आज भी समाज में अनेक ऐसी समस्याएँ हैं जिनमें समस्या छोटी दिखाई देती है, लेकिन उसके पीछे अधिकार का बड़ा प्रश्न छिपा होता है।

किसी गरीब की छोटी समस्या।

किसी श्रमिक की छोटी माँग।

किसी ग्रामीण की छोटी शिकायत।

किसी बच्चे की छोटी-सी आवाज।

यदि व्यवस्था यह कहकर उन्हें टाल दे कि “इतनी-सी बात के लिए क्यों परेशान हो?”, तो चिरई की कथा हमें याद दिलाती है कि प्रश्न केवल वस्तु का नहीं, अधिकार का है।

इसीलिए लोककथा पुरानी होकर भी अप्रासंगिक नहीं होती।

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22. और ‘कउवाहँकनी’ आज हमें क्या बताती है?

‘कउवाहँकनी’ आज भी यह सवाल पूछती है कि क्या केवल सत्ता के पास होना सत्य का प्रमाण है?

क्या किसी व्यक्ति पर बिना उसकी बात सुने निर्णय कर देना न्याय है?

क्या ईर्ष्या और षड्यंत्र किसी निर्दोष को अपराधी बना सकते हैं?

और क्या समाज किसी पीड़ित की आवाज सुनने से पहले उसके बारे में फैसला कर देता है?

इन प्रश्नों के कारण यह कथा आज भी पढ़े जाने और पुनः सुनाए जाने योग्य है।

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23. संरक्षण की आवश्यकता : केवल संग्रह नहीं, पुनर्जीवन

लोककथाओं को बचाने का अर्थ केवल उन्हें किताब में छाप देना नहीं है।

किताब जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं।

इन कथाओं के ऑडियो रिकॉर्ड होने चाहिए।

बुजुर्ग कथावाचकों की आवाज सुरक्षित की जानी चाहिए।

गाँवों में कथा-संध्या आयोजित होनी चाहिए।

विद्यालयों में भोजपुरी लोककथा-पाठ की परंपरा विकसित की जा सकती है।

स्थानीय विश्वविद्यालय और शोधार्थी गाँव-गाँव जाकर कथाओं का दस्तावेजीकरण कर सकते हैं।

एक ही कथा के अलग-अलग गाँवों में प्रचलित रूपों को रिकॉर्ड करना चाहिए, क्योंकि मौखिक परंपरा की खूबसूरती ही उसके विविध रूपों में है।

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24. डिजिटल युग लोककथा का शत्रु ही क्यों बने?

डिजिटल माध्यम को केवल संकट के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा।

जिस मोबाइल फोन ने लोककथा सुनने की पुरानी परंपरा को कमजोर किया है, वही मोबाइल फोन लोककथा को बचाने का सबसे प्रभावी साधन भी बन सकता है।

किसी दादी की आवाज रिकॉर्ड की जा सकती है।

किसी बुजुर्ग अगोरिया की पूरी रात की कथा रिकॉर्ड की जा सकती है।

भोजपुरी के अलग-अलग इलाकों में प्रचलित एक ही कथा के अलग संस्करण सुरक्षित किए जा सकते हैं।

ऑडियो, वीडियो, डिजिटल संग्रह और ऑनलाइन अभिलेखागार बनाए जा सकते हैं।

अर्थात चुनौती यह नहीं कि तकनीक को हटाया जाए।

चुनौती यह है कि तकनीक को लोकस्मृति का दुश्मन नहीं, उसका अभिलेखागार बनाया जाए।

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25. लोककथा बचाना क्यों जरूरी है?

लोककथा बचाना अतीत को बचाना नहीं है।

यह वर्तमान को अपनी जड़ों से जोड़ना है।

लोककथा में किसी समाज की कल्पना शक्ति बची रहती है।

उसकी हँसी बचती है।

उसका भय बचता है।

उसका दुख बचता है।

उसका प्रतिरोध बचता है।

उसकी भाषा बचती है।

और सबसे बढ़कर उसकी सामूहिक स्मृति बचती है।

जिस समाज को अपनी कहानियाँ याद नहीं रहतीं, वह धीरे-धीरे अपनी सांस्कृतिक स्मृति खो देता है।

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निष्कर्ष : कहानी बचाइए, क्योंकि कहानी में समाज बचा है

भोजपुरी लोककथाएँ उस समय की आवाज हैं जब गाँवों में मनोरंजन के साधन कम थे, लेकिन कल्पना की कोई कमी नहीं थी। जब पुस्तकें हर घर में नहीं थीं, लेकिन स्मृति में हजारों कथाएँ थीं। जब रेडियो और टेलीविजन गाँवों तक सीमित रूप से पहुँचते थे, लेकिन दादी-नानी की आवाज हर घर में पहुँचती थी।

आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं।

अब रात में खलिहान की अगोरिया के बीच कथा सुनाने वाले लोग कम हो गए हैं। बच्चों को सुलाने के लिए दादी की कहानी की जगह मोबाइल की स्क्रीन ने ले ली है। परिवार के बुजुर्गों की स्मृति में सुरक्षित कथाएँ उनके साथ ही समाप्त होने के खतरे में हैं।

यह केवल nostalgia का विषय नहीं है।

यह सांस्कृतिक क्षरण का प्रश्न है।

‘कउवाहँकनी’ हमें बताती है कि सत्य को दबाया जा सकता है, समाप्त नहीं किया जा सकता।

‘चिरई और दाल का दाना’ हमें बताती है कि अधिकार छोटा-बड़ा नहीं होता और सामूहिकता सबसे कमजोर आवाज को भी शक्ति दे सकती है।

इन दोनों कथाओं में भोजपुरी लोकमानस की दो बड़ी आकांक्षाएँ दिखाई देती हैं—न्याय और सम्मान।

और शायद यही कारण है कि लोककथाएँ बूढ़ी नहीं होतीं। बूढ़े केवल उनके कथावाचक होते हैं; कथा स्वयं हर पीढ़ी में नया अर्थ लेकर जन्म ले सकती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भोजपुरी लोककथा को संग्रहालय की वस्तु न बनने दें। उसे फिर से घरों में, विद्यालयों में, गाँव की चौपालों में, साहित्यिक आयोजनों में और डिजिटल माध्यमों में जीवित करें।

क्योंकि जब कोई दादी किसी बच्चे से कहती है—“एक बार की बात है…”—तब केवल कहानी शुरू नहीं होती।

एक पूरी सभ्यता बोलना शुरू करती है।

और जब वह आवाज हमेशा के लिए बंद हो जाती है, तब केवल एक कहानी समाप्त नहीं होती—

लोक की स्मृति का एक अध्याय समाप्त हो जाता है।

इसलिए भोजपुरी लोककथाओं को बचाना अतीत की रक्षा करना भर नहीं है; यह उस समाज की आत्मा को बचाना है जिसने अपनी सबसे कठिन परिस्थितियों में भी कहानी कहने की कला नहीं छोड़ी।

कहानी बचाइए।
कथावाचक बचाइए।
भोजपुरी की लोकस्मृति बचाइए।

क्योंकि आने वाली पीढ़ियाँ केवल यह नहीं पूछेंगी कि हमारे पूर्वजों ने क्या बनाया था—वे यह भी पूछेंगी कि वे क्या सुनते थे, क्या कहते थे और अपने बच्चों को कौन-सी कहानियाँ सुनाकर बड़ा करते थे।





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परिचय
लक्ष्मीकांत मुकुल 
जन्म – 08 जनवरी 1973
शिक्षा – विधि स्नातक 
किसान कवि। कवितायें एवं आलेख विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित । दो कविता संकलन “लाल चोंच वाले पंछी’’ व  "घिस रहा है धान का कटोरा" और ग्रामीण इतिहास पर केंद्रित पुस्तक "यात्रियों के नजरिए में शाहाबाद" प्रकाशित।

संपर्क :-
ग्राम – मैरा, पोस्ट – सैसड,
भाया – धनसोई ,
बक्सर,
(बिहार) – 802117
ईमेल – kvimukul12111@gmail.com
मोबाइल नंबर - 6202077236









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