लक्ष्मीकांत मुकुल के स्त्री विमर्श पर तीन गो कविता01.दू सखियन के बीच बचल जिनगीआज बहुत बरिस बाददू गो बूढ़ देह एक-दूसरा के सामने बइठल बा—जइसे दू पुरान कुआँ, जिनकर पानी सूख गइल होखे,बाकिर पेंदी में देखाई देत होखे अबहियो आसमानएक-दूसरा के चेहरा पढ़तआ झुर्री के भीतर से ऊ लड़की खोजत बाड़ीजे नंगे पाँव पोखरा के मेड़ परदुपहरिया के धूप से आँख बचावत दौड़त रहेओकरा बाद बदलत गइल जिनगीडोली, अनजान घर, चूल्हा, खेत, कर्ज,बच्चन के बुखार, मरद के थकान,आ सपना, जे रोज के रोटी से छोट पड़त गइलफेरुओ कुछ बचल रहल—नवका धान के गंध, सावन में भींजल देह,केहू के चुपके से देखल चेहरा,आ ऊ उम्मीद जे हर बेर मर के अगिलाभोर में फेरु जनम लेत रहलआज दुनो के घर भरल बा—नाती-पोता, अनाज के बोरा, दीवाल परटँगल पुरनका कैलेंडर;बाकिर जे जिनगी जीए के चाहत रहलीं,ओकरा खातिर समय कबो खाली ना मिललसाँझ उतर रहल बा;दुनो हँसत बाड़ी—जइसे हँसी ना, अपना बीतल जिनगी के राख कुरेद केओह में अबहियो एगो छोट-सा अंगार बचवले बाड़ी02.पीठ पर पहाड़पीठ पर घास के गट्ठर से कहीं भारी बाओकर पूरा घरऊ पहाड़ चढ़त नइखे,रोज-रोज अपना जिनगी के ढलान सेऊपर उठत बियारस्सी के निशानकंधा पर नइखे भर—समय ओकर देह पर आपन दस्तखत कइले बाहथेली में दरांती बाआँख में चूल्हा के धुआँ,आ धुआँ के पारबेटी के स्कूल जात देखे के सपनाजंगल ओकर खेत ह,घास ओकर फसल,पहाड़ ओकर बाजारआ घर ओकर एकमात्र बैंकशहर के लोग हरियर पहाड़ देखेला,ऊ ओह हरियरी मेंआपन पसीना देखत बियाहवा ओकरा से पूछत नइखेकब थकबू—काहे कि पहाड़ जानेलाई मेहरारू थाक के भीघर पहुँचबे करी03.रोपनी के बीच औरतन के गीतधान के पानी में धँसल गोड़ के साथऔरतन के भींज रहल बा बचपनकवनो कहतिया—याद बा,हमनी मेड़ पर दौड़त रहींआ हथेली में अमिया के खट्ट मिठास छुपा के राखत रहींदूसर के हँसी में अबहियोओह उमिर के चूड़ी खनकत बा,जब सावन के रात देह पर गीत बन के उतर आवत रहेअब जिनगी के चूल्हा, कर्जा आ अभावओह गीत के बहुत कुछ निगल गइल बा,तबो आँख के कोर में कुछ रउआ नाकहल सपना चमकत बापानी में झुकल धान के पौधाजइसे बार-बार टूट के फेर हरियर होखेओह लोग के हथेली में माटी बा,माटी में पसीना,आ पसीना में पूरा घर के भविष्यओकरा गीतन में समाइल रहेलीचिरईं के चहचहाहट,पानी के बहत धारा के सुर,हवा के सरसराहटमाटी के सोंह महक,बदरी से झरत फुहार,जे आवेले पहाड़, जंगल से करतभेंट - अंकवारबात-बात में बिटिया के पढ़ाई आ जाड़ के चद्दर आवेला,कवनो दूर के इच्छा चुपचाप मेड़ पर बैठल रहेलागीत अचके में तेज हो जाला—जइसे बरखा से पहिले खेत के भीतरकोई अनदेखल नदी करवट ले रहल होखे।
संपर्क :-ग्राम – मैरा, पोस्ट – सैसड,भाया – धनसोई ,बक्सर,(बिहार) – 802117ईमेल – kvimukul12111@gmail.comमोबाइल नंबर - 6202077236
लक्ष्मीकांत मुकुल जन्म 8 जनवरी 1973 हिन्दी कवि, इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता। 2009 में पुष्पांजलि प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हिंदी में एक कविता संग्रह "लाल चोंच वाले पंछी"।, घिस रहा है धान का कटोरा (कविता संग्रह) और "यात्रियों के नजरिए में शाहाबाद" (लेख) 2022 में सृजन लोक प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित। राजभाषा विभाग, बिहार, पटना से पुरस्कृत।
सोमवार, 5 अक्टूबर 2026
लक्ष्मीकांत मुकुल के स्त्री विमर्श पर तीन गो कविता
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