सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

लक्ष्मीकांत मुकुल के स्त्री विमर्श पर तीन गो कविता


लक्ष्मीकांत मुकुल के स्त्री विमर्श पर तीन गो कविता

01.

दू सखियन के बीच बचल जिनगी

आज बहुत बरिस बाद
दू गो बूढ़ देह एक-दूसरा के सामने बइठल बा—
जइसे दू पुरान कुआँ, जिनकर पानी सूख गइल होखे,
बाकिर पेंदी में देखाई देत होखे अबहियो आसमान

एक-दूसरा के चेहरा पढ़त 
आ झुर्री के भीतर से ऊ लड़की खोजत बाड़ी
जे नंगे पाँव पोखरा के मेड़ पर
दुपहरिया के धूप से आँख बचावत दौड़त रहे
ओकरा बाद बदलत गइल जिनगी
डोली, अनजान घर, चूल्हा, खेत, कर्ज,
बच्चन के बुखार, मरद के थकान,
आ सपना, जे रोज के रोटी से छोट पड़त गइल
फेरुओ कुछ बचल रहल—
नवका धान के गंध, सावन में भींजल देह,
केहू के चुपके से देखल चेहरा,
आ ऊ उम्मीद जे हर बेर मर के अगिला
 भोर में फेरु जनम लेत रहल

आज दुनो के घर भरल बा—
नाती-पोता, अनाज के बोरा, दीवाल पर 
टँगल पुरनका कैलेंडर;
बाकिर जे जिनगी जीए के चाहत रहलीं,
ओकरा खातिर समय कबो खाली ना मिलल
साँझ उतर रहल बा;
दुनो हँसत बाड़ी—
जइसे हँसी ना, अपना बीतल जिनगी के राख कुरेद के
ओह में अबहियो एगो छोट-सा अंगार बचवले बाड़ी


02.

पीठ पर पहाड़


पीठ पर घास के गट्ठर से कहीं भारी बा
ओकर पूरा घर
ऊ पहाड़ चढ़त नइखे,
रोज-रोज अपना जिनगी के ढलान से
ऊपर उठत बिया

रस्सी के निशान
कंधा पर नइखे भर—
समय ओकर देह पर आपन दस्तखत कइले बा
हथेली में दरांती बा
आँख में चूल्हा के धुआँ,
आ धुआँ के पार
बेटी के स्कूल जात देखे के सपना

जंगल ओकर खेत ह,
घास ओकर फसल,
पहाड़ ओकर बाजार
आ घर ओकर एकमात्र बैंक
शहर के लोग हरियर पहाड़ देखेला,
ऊ ओह हरियरी में
आपन पसीना देखत बिया
हवा ओकरा से पूछत नइखे
कब थकबू—
काहे कि पहाड़ जानेला
ई मेहरारू थाक के भी
घर पहुँचबे करी


03.


रोपनी के बीच औरतन के गीत


धान के पानी में धँसल गोड़ के साथ
 औरतन के भींज रहल बा बचपन

कवनो कहतिया—याद बा,
हमनी मेड़ पर दौड़त रहीं
आ हथेली में अमिया के खट्ट मिठास छुपा के राखत रहीं

दूसर के हँसी में अबहियो
ओह उमिर के चूड़ी खनकत बा,
जब सावन के रात देह पर गीत बन के उतर आवत रहे

अब जिनगी के चूल्हा, कर्जा आ अभाव
ओह गीत के बहुत कुछ निगल गइल बा,
तबो आँख के कोर में कुछ रउआ ना 
कहल सपना चमकत बा

पानी में झुकल धान के पौधा
जइसे बार-बार टूट के फेर हरियर होखे

ओह लोग के हथेली में माटी बा,
माटी में पसीना,
आ पसीना में पूरा घर के भविष्य

ओकरा गीतन में समाइल रहेली
चिरईं के चहचहाहट,
पानी के बहत धारा के सुर,
हवा के सरसराहट
माटी के सोंह महक,
बदरी से झरत फुहार,
जे आवेले पहाड़, जंगल से करत
भेंट - अंकवार

बात-बात में बिटिया के पढ़ाई आ जाड़ के चद्दर आवेला,
कवनो दूर के इच्छा चुपचाप मेड़ पर बैठल रहेला
गीत अचके में तेज हो जाला—
जइसे बरखा से पहिले खेत के भीतर
कोई अनदेखल नदी करवट ले रहल होखे।




संपर्क :-
ग्राम – मैरा, पोस्ट – सैसड,
भाया – धनसोई ,
बक्सर,
(बिहार) – 802117
ईमेल – kvimukul12111@gmail.com
मोबाइल नंबर - 6202077236






कोई टिप्पणी नहीं:

कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ_ लक्ष्मीकांत मुकुल

कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ _ लक्ष्मीकांत मुकुल सोन नदी बिहार की कृषि-अर्थव्यवस...