सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ_ लक्ष्मीकांत मुकुल


कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ
_ लक्ष्मीकांत मुकुल



सोन नदी बिहार की कृषि-अर्थव्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में है। इसके किनारे विकसित सोन नहर प्रणाली ने शाहाबाद और दक्षिण-पश्चिम बिहार के विशाल भूभाग को लंबे समय तक सिंचाई का आधार दिया है। लेकिन इस व्यवस्था की एक मूलभूत कमजोरी है—इंद्रपुरी बराज पानी को नियंत्रित तो कर सकता है, पर बड़े पैमाने पर मानसूनी जल का दीर्घकालीन भंडारण नहीं कर सकता। यही कमी कदवन जलाशय परियोजना की अवधारणा के पीछे रही है।
आज यह परियोजना केवल एक बाँध बनाने की योजना नहीं है। यह प्रश्न है कि मानसून में उपलब्ध अतिरिक्त सोन जल का कितना हिस्सा सुरक्षित रखकर सूखे मौसम में खेती, पेयजल और अन्य आवश्यकताओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है; और यह काम बिहार, झारखंड तथा उत्तर प्रदेश के बीच जल-अधिकारों और स्थानीय आबादी के हितों का संतुलन बनाकर कैसे किया जाए।
कहाँ है कदवन परियोजना?
जिसे मूल रूप से कदवन जलाशय परियोजना (Kadhwan Reservoir Scheme) कहा गया, उसका प्रस्तावित बाँध सोन नदी पर बिहार और वर्तमान झारखंड की सीमा के निकट है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार प्रस्तावित बाँध की धुरी झारखंड के गढ़वा जिले के कदवन क्षेत्र में दाहिने तट और बिहार के रोहतास जिले के नौहट्टा प्रखंड स्थित जदुनाथपुर पंचायत के मटियावां गांव- क्षेत्र में बाएँ तट के बीच प्रस्तावित रही है। यह स्थल इंद्रपुरी बराज से लगभग 70 किलोमीटर ऊपर की ओर है। बाद में झारखंड के गठन के बाद परियोजना का नाम इंद्रपुरी जलाशय परियोजना (Indrapuri Reservoir Project) कर दिया गया। 


इस अवस्थिति को समझना इसलिए महत्वपूर्ण है कि परियोजना का लाभ केवल बाँध के आसपास के क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसका मूल उद्देश्य सोन नहर प्रणाली को अधिक भरोसेमंद जल उपलब्ध कराना है। इसलिए इसका प्रभाव रोहतास, औरंगाबाद, भोजपुर, बक्सर, कैमूर आदि सोन कमांड क्षेत्र के कृषि भूभाग तक पहुँच सकता है। 2026 के बिहार-झारखंड समझौते के संदर्भ में केंद्र सरकार ने बिहार के भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, गया और पटना तथा झारखंड के पलामू और गढ़वा क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल लाभ की बात कही है। 


परियोजना की मूल आवश्यकता क्या है?
कदवन परियोजना की सबसे मजबूत दलील पानी की कमी नहीं, बल्कि पानी के समय और स्थान की समस्या है।
केंद्रीय जल आयोग के परियोजना-स्थिति दस्तावेज के अनुसार 1973 के बाणसागर समझौते में बिहार के लिए सोन जल का 7.75 MAF आवंटन निर्धारित था। लेकिन सोन नहर प्रणाली को मिलने वाला पानी काफी हद तक ऊपरी क्षेत्रों से आने वाले नियंत्रित प्रवाह और मानसूनी उपलब्धता पर निर्भर है। आयोग के अनुसार मानसून में उपलब्ध पानी के बड़े हिस्से को ऊपरी भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण उपयोग में नहीं लाया जा पाता। 


यहीं जलाशय की उपयोगिता सामने आती है।
मानसून में अधिक पानी → जलाशय में संचय → रबी/ग्रीष्म में नियंत्रित निकासी → सोन नहरों में अपेक्षाकृत स्थिर जलापूर्ति।
यदि यह व्यवस्था सफल होती है तो सिंचाई का संकट केवल वर्षा पर निर्भर नहीं रहेगा। किसानों के लिए इसका अर्थ होगा कि धान की रोपनी, गेहूँ, दलहन, तिलहन और अन्य फसलों की सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता अधिक पूर्वानुमेय हो सकती है।
साथ ही, नहरों में नियमित पानी उपलब्ध होने से भूजल पर कृषि की निर्भरता कम करने की संभावना भी बनती है। लेकिन इसे स्वतः सिद्ध लाभ मानना उचित नहीं होगा; वास्तविक लाभ जलाशय के संचालन, नहरों की स्थिति और जल-वितरण की दक्षता पर निर्भर करेगा।
जलविद्युत भी, लेकिन मुख्य उद्देश्य सिंचाई
कदवन परियोजना की प्रारंभिक अवधारणा में जलविद्युत उत्पादन भी शामिल था। केंद्रीय जल आयोग के उपलब्ध 2018 PPR के अनुसार संशोधित प्रस्ताव में चार इकाइयों में 75-75 मेगावाट, यानी कुल 300 मेगावाट विद्युत उत्पादन की क्षमता प्रस्तावित थी। प्रस्तावित Full Reservoir Level (FRL) 169 मीटर, Maximum Water Level 171 मीटर और Minimum Drawdown Level 160.50 मीटर रखा गया था। 

इससे स्पष्ट है कि परियोजना बहुउद्देशीय स्वरूप रखती है। फिर भी इसकी बुनियादी उपयोगिता को केवल बिजली उत्पादन से नहीं आँकना चाहिए। इसका केंद्रीय प्रश्न सोन नहर प्रणाली के लिए जल-सुरक्षा है।
विवाद इतना लंबा क्यों चला?
कदवन परियोजना की कहानी तकनीकी कठिनाई से अधिक अंतरराज्यीय जल-राजनीति और स्थानीय प्रभावों की कहानी रही है।
झारखंड के गठन के बाद 1973 के मूल सोन जल-बंटवारा ढाँचे में परिस्थितियाँ बदल गईं। झारखंड ने यह प्रश्न उठाया कि अविभाजित बिहार के लिए निर्धारित सोन जल में वर्तमान झारखंड का हिस्सा किस प्रकार सुनिश्चित होगा। केंद्रीय जल आयोग के 2025 के आधिकारिक उत्तर के अनुसार बिहार ने दिसंबर 2018 में परियोजना की PPR प्रस्तुत की थी। उसे उत्तर प्रदेश और झारखंड की टिप्पणियों के लिए भेजा गया। झारखंड ने पहले जल-बंटवारे का प्रश्न सुलझाने की आवश्यकता जताई और अंतरराज्यीय सहमति न बनने के कारण CWC ने मार्च 2022 में प्रस्ताव राज्य को वापस कर दिया था। 


इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश की भी तकनीकी आपत्ति थी। CWC के अनुसार प्रस्तावित जलाशय का FRL यदि अधिक रखा जाता तो उससे उत्तर प्रदेश के ओबरा पावरहाउस के Tail Water Level पर प्रभाव पड़ सकता था। इसी कारण FRL को 173 मीटर से घटाकर 169 मीटर करने का प्रश्न उठा और बाद के प्रस्ताव में 169 मीटर FRL तथा 171 मीटर MWL स्वीकार किए गए। 


अर्थात विवाद का एक ही कारण नहीं था—
बिहार की सिंचाई और जल-संचयन की आवश्यकता;
झारखंड का जल-अधिकार;
उत्तर प्रदेश की परियोजनाओं पर संभावित प्रभाव;
जलाशय से होने वाला डूब क्षेत्र;
विस्थापन और पुनर्वास;
तथा परियोजना की लागत और लाभ के बँटवारे का प्रश्न।
सबसे संवेदनशील मुद्दा—डूब क्षेत्र और विस्थापन
किसी भी बड़े जलाशय को केवल उसके लाभ से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक मूल्य से भी परखा जाना चाहिए।
यदि किसी क्षेत्र में बाँध बनता है तो केवल नदी की धारा ही नहीं बदलती; खेत, गाँव, सड़कें, वनक्षेत्र, धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल और लोगों की आजीविका भी प्रभावित हो सकती है। कदवन के पुराने प्रस्तावों को लेकर झारखंड के गढ़वा-पलामू क्षेत्र में डूब और विस्थापन की आशंकाएँ इसी कारण महत्वपूर्ण रही हैं।
इसलिए किसी भी नए DPR में केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि कितनी भूमि डूबेगी। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि—
कितने परिवार प्रभावित होंगे, कितनी कृषि भूमि जाएगी, कितने सार्वजनिक संसाधन प्रभावित होंगे, पुनर्वास कहाँ होगा, मुआवजा कैसे निर्धारित होगा और परियोजना से स्थानीय लोगों को प्रत्यक्ष लाभ क्या मिलेगा।
यही वह कसौटी है जिस पर किसी बड़े जलाशय की सामाजिक स्वीकार्यता तय होती है।
2026 : क्या अब कदवन की सबसे बड़ी बाधा दूर हो गई?
यहाँ 2026 का घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है।
31 अगस्त 2026 को बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी जल-बंटवारे से संबंधित समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए। केंद्र सरकार के अनुसार इस समझौते का उद्देश्य दोनों राज्यों के लंबे समय से चले आ रहे जल-विवाद का समाधान करना है। 

इस घटनाक्रम से कदवन/इंद्रपुरी परियोजना के लिए एक महत्वपूर्ण अंतरराज्यीय बाधा कम हुई है। 2026 में बिहार सरकार ने भी परियोजना को इंद्रपुरी जलाशय के रूप में आगे बढ़ाने की बात कही है। 

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है:
जल-बंटवारा समझौता परियोजना का निर्माण शुरू हो जाने के बराबर नहीं है।
अभी भी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, जल-विज्ञान, जलाशय-डिजाइन, लागत, भूमि एवं पुनर्वास, पर्यावरणीय स्वीकृतियों और केंद्रीय तकनीकी मूल्यांकन जैसे चरण निर्णायक होंगे। CWC के उपलब्ध परियोजना दस्तावेज में भी PPR के विभिन्न तकनीकी पक्षों पर टिप्पणियों और अनुपालनों की प्रक्रिया दर्ज है तथा DPR की ओर आगे बढ़ने के लिए प्रक्रियात्मक स्वीकृतियों की आवश्यकता बताई गई थी। 


इसलिए 2026 को 'परियोजना बन गई' का वर्ष नहीं, बल्कि 'परियोजना के लिए अंतरराज्यीय रास्ता खुलने' का वर्ष कहना अधिक सटीक होगा।
संभावनाएँ : केवल सिंचाई से कहीं आगे
यदि परियोजना तकनीकी और सामाजिक रूप से व्यवहार्य रूप में आगे बढ़ती है, तो इसके संभावित प्रभाव कई स्तरों पर हो सकते हैं।
1. सोन नहर प्रणाली को जल-सुरक्षा
सबसे बड़ा लाभ यही हो सकता है कि नहरों को केवल तत्काल नदी-प्रवाह पर निर्भर रहने के बजाय जलाशय से नियंत्रित आपूर्ति मिले।
2. कृषि उत्पादन में स्थिरता
सिंचाई की अनिश्चितता कम होने पर फसल-चक्र में विविधता और दूसरी फसल की संभावना बढ़ सकती है।
3. पेयजल
2026 के अंतरराज्यीय समझौते को केंद्र सरकार ने दोनों राज्यों के बड़े ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल उपलब्धता से भी जोड़ा है। 

4. जलविद्युत
2018 PPR में 300 MW की प्रस्तावित क्षमता थी। हालांकि अंतिम क्षमता वर्तमान DPR और तकनीकी मूल्यांकन पर निर्भर करेगी। 

5. भूजल पर दबाव में संभावित कमी
यदि नहर प्रणाली वास्तव में नियमित और पर्याप्त जल उपलब्ध करा सके, तो सिंचाई के लिए अत्यधिक भूजल दोहन को कम करने में सहायता मिल सकती है।
लेकिन खतरे भी कम नहीं हैं
परियोजना की संभावनाओं को स्वीकार करते समय चार प्रश्नों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पहला—क्या उपलब्ध जल वास्तव में उतना है जितना परियोजना को चाहिए?
जलवायु परिवर्तन और वर्षा की अनिश्चितता के दौर में पुराने hydrological assumptions की पुनः जाँच जरूरी है।
दूसरा—क्या जलाशय की लागत और लाभ का अनुपात स्वीकार्य होगा?
बड़े बाँध की वास्तविक लागत केवल निर्माण लागत नहीं होती। पुनर्वास, भूमि, पर्यावरणीय क्षति, नहरों का आधुनिकीकरण और दीर्घकालीन रखरखाव भी इसमें शामिल होना चाहिए।
तीसरा—क्या स्थानीय लोगों को केवल मुआवजा मिलेगा या विकास में हिस्सेदारी भी?
प्रभावित परिवारों को बेहतर पुनर्वास, आजीविका, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था परियोजना की सामाजिक वैधता के लिए आवश्यक होगी।
चौथा—क्या जलाशय बनने के बाद सोन नहर प्रणाली आधुनिक भी होगी?
यदि जलाशय में पानी जमा हो जाए लेकिन पुरानी और क्षतिग्रस्त नहरों में पानी की भारी हानि होती रहे, तो परियोजना का अपेक्षित लाभ घट सकता है।
कदवन से इंद्रपुरी तक : नाम बदला है, प्रश्न नहीं
कदवन परियोजना का नाम बदलकर इंद्रपुरी जलाशय परियोजना होना अपने आप में समाधान नहीं है। परियोजना का वास्तविक प्रश्न वही है—
क्या सोन के मानसूनी पानी को वैज्ञानिक ढंग से संग्रहित कर दक्षिण-पश्चिम बिहार और झारखंड के सूखा-प्रवण क्षेत्रों को अधिक भरोसेमंद जल उपलब्ध कराया जा सकता है, और क्या यह काम प्रभावित लोगों के अधिकारों की रक्षा करते हुए किया जा सकता है?
2026 के समझौते ने इस प्रश्न के राजनीतिक-अंतरराज्यीय पक्ष में महत्वपूर्ण बदलाव जरूर किया है। लेकिन आगे की सफलता DPR की गुणवत्ता, जल-विज्ञान के पुनर्मूल्यांकन, वित्तीय व्यवहार्यता, पर्यावरणीय आकलन और सबसे बढ़कर न्यायपूर्ण पुनर्वास पर निर्भर करेगी।
निष्कर्ष : बिहार के लिए अवसर, पर बिना शर्त नहीं
कदवन जलाशय की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि यह सोन नदी के समय-असंतुलित जल को कृषि और पेयजल की अधिक नियमित उपलब्धता में बदलने की संभावना रखता है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस लाभ की कीमत कहीं उन लोगों को न चुकानी पड़े जिनकी जमीन और बस्तियाँ जलाशय के नीचे चली जाएँ।
इसलिए परियोजना को केवल “बिहार के किसानों को पानी देने वाला बाँध” या केवल “विस्थापन पैदा करने वाली परियोजना” के रूप में देखना दोनों ही अधूरे दृष्टिकोण होंगे।
सही दृष्टिकोण होगा—सोन बेसिन की समग्र जल-व्यवस्था के रूप में इसे देखना।
यदि नया DPR आधुनिक जल-विज्ञान, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय प्रवाह, नहर आधुनिकीकरण, पारदर्शी जल-वितरण और प्रभावित परिवारों के अधिकारों को एक साथ लेकर बनाया जाता है, तो कदवन/इंद्रपुरी परियोजना सोन क्षेत्र की दीर्घकालीन जल-सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बन सकती है। लेकिन यदि पुराने ढाँचे को केवल नए नाम और नए समझौते के सहारे आगे बढ़ाया गया, तो वर्षों पुराना विवाद नए रूप में लौट सकता है।
अतः 2026 के बाद असली परीक्षा बाँध बनाने की नहीं, बल्कि ऐसा जलाशय बनाने की है जिसका लाभ बिहार और झारखंड दोनों के लोगों को मिले और जिसकी सामाजिक तथा पर्यावरणीय कीमत न्यायसंगत हो।



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परिचय



लक्ष्मीकांत मुकुल 
जन्म – 08 जनवरी 1973
शिक्षा – विधि स्नातक 
किसान कवि। कवितायें एवं आलेख विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित । दो कविता संकलन “लाल चोंच वाले पंछी’’ व  "घिस रहा है धान का कटोरा" और ग्रामीण इतिहास पर केंद्रित पुस्तक "यात्रियों के नजरिए में शाहाबाद" प्रकाशित।

संपर्क :-
ग्राम – मैरा, पोस्ट – सैसड,
भाया – धनसोई ,
बक्सर,
(बिहार) – 802117
ईमेल – kvimukul12111@gmail.com
मोबाइल नंबर - 6202077236

भोजपुरी लोककथाओं की लुप्त होती दुनिया : स्मृति, समाज और प्रतिरोध की मौखिक परंपरा_ लक्ष्मीकांत मुकुल


भोजपुरी लोककथाओं की लुप्त होती दुनिया : स्मृति, समाज और प्रतिरोध की मौखिक परंपरा
_ लक्ष्मीकांत मुकुल 

प्रस्तावना

भोजपुरी लोककथाएँ केवल मनोरंजन के लिए कही-सुनी जाने वाली कहानियाँ नहीं हैं। वे भोजपुरी समाज की सामूहिक स्मृति, सामाजिक अनुभव, जीवन-दर्शन, नैतिक चेतना और लोक-बुद्धि की जीवित अभिव्यक्तियाँ रही हैं। इन कथाओं में राजा-रानी और देवी-देवताओं के साथ-साथ किसान, मजदूर, लकड़हारा, चिरई, सियार, साँप, चींटी, हाथी और यहाँ तक कि निर्जीव वस्तुएँ भी बोलती हैं। इसीलिए भोजपुरी लोककथा का संसार केवल कल्पना का संसार नहीं है; वह लोकजीवन के अनुभवों से निर्मित एक ऐसा सांस्कृतिक दस्तावेज है, जिसमें समाज स्वयं को पहचान सकता है।

कभी भोजपुरी अंचल के गाँवों में रात केवल अँधेरे का नाम नहीं थी। वह कथा की रात होती थी। बच्चे दादी-नानी की चारपाई के पास बैठकर कहानी सुनते थे। खेत-खलिहान की रखवाली करते किसान और अगोरिया रात के सन्नाटे को लंबी लोककथाओं से भर देते थे। एक कथा समाप्त होती तो दूसरी शुरू हो जाती और कई बार कहानी कई-कई रातों तक चलती रहती। कथावाचक के पास लिखी हुई कोई पुस्तक नहीं होती थी, फिर भी उसकी स्मृति में पूरा संसार सुरक्षित रहता था।

आज वह संसार तेजी से सिकुड़ गया है। मोबाइल फोन, टेलीविजन, इंटरनेट, बदलती जीवन-शैली, संयुक्त परिवारों का विघटन और गाँवों में सामूहिक जीवन के कम होते अवसरों ने लोककथा सुनने-सुनाने की परंपरा को गहरा आघात पहुँचाया है। समस्या केवल इतनी नहीं है कि कुछ पुरानी कहानियाँ अब सुनाई नहीं जातीं। असली संकट यह है कि उनके साथ वह लोक-स्मृति, भाषा, मुहावरा, कथन-शैली और सामाजिक अनुभव भी विलुप्त हो रहा है, जिसने उन्हें जन्म दिया था।

इस संदर्भ में भोजपुरी की दो लोककथाएँ—‘कउवाहँकनी’ और ‘चिरई और दाल का दाना’—विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। पहली कथा में स्त्री के साथ होने वाले छल, सत्ता की अधीरता, मातृत्व और अंततः सत्य की विजय का आख्यान है; दूसरी कथा में एक छोटी-सी चिरई के माध्यम से न्याय, अधिकार और सामूहिक शक्ति का अद्भुत रूपक निर्मित होता है। दोनों कथाएँ मिलकर भोजपुरी लोकमानस की गहराई और उसकी सामाजिक दृष्टि को सामने लाती हैं।

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1. लोककथा : लोक की स्मृति का जीवित दस्तावेज

लोककथा का सबसे बड़ा गुण यह है कि उसका कोई एक लेखक नहीं होता। वह पीढ़ियों के अनुभवों से बनती है। कोई व्यक्ति उसे सुनाता है, दूसरा उसमें कुछ जोड़ देता है, तीसरा अपनी परिस्थिति के अनुसार उसका रूप बदल देता है और चौथी पीढ़ी उसे फिर नए ढंग से सुनाती है। इस प्रक्रिया में लोककथा किसी व्यक्ति की संपत्ति न रहकर समुदाय की संपत्ति बन जाती है।

भोजपुरी लोककथाओं में यह विशेषता और भी स्पष्ट दिखाई देती है। भोजपुरी समाज मूलतः मजबूत मौखिक परंपरा वाला समाज रहा है। लोकगीत, सोहर, कजरी, बिरहा, चैता, कहावत, मुहावरा और लोककथा—इन सभी ने लिखित साहित्य से बाहर एक विशाल सांस्कृतिक संसार निर्मित किया।

इस संसार में भाषा किताब से नहीं, जीवन से आती है। इसलिए लोककथा में मिलने वाले संबोधन, ध्वनियाँ, दोहराव, तुक, संवाद और स्थानीय शब्द केवल भाषिक सामग्री नहीं हैं; वे उस समाज की मानसिक बनावट के प्रमाण हैं।

लोककथा की एक और विशेषता है कि वह जटिल सामाजिक प्रश्नों को सरल प्रतीकों में व्यक्त करती है। राजा सत्ता का प्रतीक बन जाता है, रानी सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था का, चिरई सामान्य जन की, चींटी सामूहिक शक्ति की और खूँटा उस छोटी-सी बाधा का जिसे हटाना आवश्यक है, चाहे वह देखने में कितनी ही मामूली क्यों न लगे।

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2. ‘कउवाहँकनी’ : स्त्री, सत्ता और सत्य की कथा

‘कउवाहँकनी’ भोजपुरी लोकमानस की उन कथाओं में है जिनमें पारिवारिक ईर्ष्या से शुरू होकर सत्ता, स्त्री और न्याय का प्रश्न सामने आता है।

कथा का आरंभ एक राजा की तीन रानियों से होता है। पहली दो रानियाँ संतानहीन हैं, जबकि तीसरी रानी के गर्भवती होते ही उनके भीतर ईर्ष्या पैदा हो जाती है। यहाँ लोककथा बहुत सहज ढंग से एक गहरी सामाजिक सच्चाई को पकड़ती है—जहाँ मातृत्व को स्त्री की प्रतिष्ठा और सामाजिक स्वीकार्यता से जोड़ दिया जाता है, वहाँ संतान का जन्म केवल निजी सुख नहीं रह जाता; वह सत्ता और प्रतिस्पर्धा का प्रश्न भी बन जाता है।

तीसरी रानी के प्रसव का प्रसंग कथा का निर्णायक बिंदु है। राजा का शिकार पर जाना, घंटी देकर सहायता का आश्वासन देना और फिर घंटी बजाने पर नाराज होकर लौट जाना—ये घटनाएँ केवल कथा को आगे बढ़ाने वाली घटनाएँ नहीं हैं। इनमें पति-पत्नी के बीच विश्वास और सत्ता-संबंधों की एक झलक दिखाई देती है।

जब वास्तविक प्रसव के समय राजा नहीं आता और बड़ी रानियाँ तीसरी रानी को चूल्हे में मुँह डालकर शांत रहने की सलाह देती हैं, तब कथा का संसार अचानक क्रूर हो जाता है। तीसरी रानी बच्चों को जन्म देती है, लेकिन उसके सामने ईंट-पत्थर रख दिए जाते हैं। उसके नवजात बच्चों को छिपा दिया जाता है और राजा के सामने झूठ प्रस्तुत किया जाता है।

यहाँ लोककथा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—सत्य बोलने की शक्ति किसके पास है?

राजा के पास सत्ता है, लेकिन सत्य नहीं। बड़ी रानियों के पास षड्यंत्र है, लेकिन नैतिक शक्ति नहीं। तीसरी रानी के पास सत्य है, लेकिन उसे सिद्ध करने का कोई साधन नहीं।

इस तरह कथा एक ऐसी स्थिति बनाती है जिसमें सामाजिक प्रतिष्ठा और सत्ता सत्य पर भारी पड़ती दिखाई देती है।

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3. ‘कउवाहँकनी’ में स्त्री की त्रासदी

तीसरी रानी को राजा द्वारा महल से निकाल दिया जाना और ‘कउवाहँकनी’ बना दिया जाना इस कथा का अत्यंत मार्मिक पक्ष है।

यहाँ लोककथा स्त्री के उस सामाजिक संकट को सामने लाती है जिसमें उसके बारे में निर्णय लेने वाला समाज पुरुष-सत्ता है। वह स्वयं अपनी निर्दोषता सिद्ध नहीं कर सकती। उसका मातृत्व भी उसके विरुद्ध प्रमाण बना दिया जाता है।

लेकिन लोककथा का लोकन्याय आधुनिक अदालत की तरह काम नहीं करता। यहाँ सत्य को अंततः कोई न कोई पहचानता है। मिट्टी लेने वाली कोहइनियाँ जब सुंदर बच्चों को देखती है और उन्हें अपने घर ले जाती है, तो लोकसमाज की एक दूसरी शक्ति सामने आती है—साधारण मनुष्य की करुणा।

राजमहल जहाँ असत्य का केंद्र बन गया था, वहीं एक सामान्य ग्रामीण स्त्री बच्चों को जीवन देती है।

यह विरोधाभास अत्यंत अर्थपूर्ण है।

राजा के महल में सत्य हारता है, लेकिन गाँव की मिट्टी में सत्य बचा रहता है।

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4. मिट्टी से जन्मा सत्य

कथा में बच्चों का मिट्टी के बीच मिलना केवल एक चमत्कारिक घटना नहीं है। भोजपुरी लोकजीवन में मिट्टी जीवन का आधार है। किसान का संसार मिट्टी से शुरू होकर मिट्टी तक जाता है। इसलिए मिट्टी में छिपे बच्चे लोकमानस में पुनर्जन्म लेते सत्य की तरह दिखाई देते हैं।

जिन बच्चों को सत्ता ने मिटा देने की कोशिश की थी, वही बच्चे मिट्टी से फिर सामने आते हैं।

यहाँ लोककथा एक अद्भुत संदेश देती है—

सत्य को कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता।

कथा के अंत में बच्चों की बातचीत राजा तक पहुँचती है और धीरे-धीरे पूरा षड्यंत्र खुल जाता है। राजा को अपनी भूल का पता चलता है। तीसरी रानी वापस महल में आती है और बड़ी रानियों को दंड मिलता है।

लोककथा अपने ढंग से न्याय स्थापित करती है।

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5. ‘कउवाहँकनी’ का सुखद अंत और लोकन्याय

भोजपुरी लोककथाओं में सुखद अंत की परंपरा महत्त्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह नहीं कि लोकसमाज वास्तविक जीवन की कठिनाइयों से अनजान था। इसके उलट, शायद इसलिए कि वास्तविक जीवन में न्याय हमेशा समय पर नहीं मिलता था, लोककथा ने अपने संसार में न्याय की स्थापना की।

कथा का अंत इस विश्वास पर होता है कि बुराई अंततः पराजित होगी और सत्य की प्रतिष्ठा होगी।

यह लोकमानस की आशावादी शक्ति है।

लोककथा कहती है कि राजा भूल कर सकता है, समाज भ्रमित हो सकता है, ईर्ष्या षड्यंत्र कर सकती है, लेकिन अंततः सत्य अपना रास्ता खोज लेता है।

इस अर्थ में ‘कउवाहँकनी’ केवल राजा और तीन रानियों की कहानी नहीं है। यह सत्य और असत्य के बीच संघर्ष की लोकगाथा है।

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6. ‘चिरई और दाल का दाना’ : एक दाने से शुरू हुआ न्याय का प्रश्न

दूसरी कथा का संसार पूरी तरह अलग है, लेकिन उसका सामाजिक संदेश उतना ही गहरा है।

एक छोटी चिरई को चने की दाल का एक दाना मिलता है। दाल दलते समय उसका एक हिस्सा खूँटे में फँस जाता है। चिरई उसे निकाल नहीं पाती। वह पहले बढ़ई के पास जाती है।

उसकी पुकार अत्यंत सरल है—

«“बढ़ई-बढ़ई खूँटा चीर…”»

लेकिन बढ़ई उसे टाल देता है।

इसके बाद चिरई राजा के पास जाती है। राजा भी उसकी बात नहीं सुनता। रानी व्यस्त है। साँप तैयार नहीं। लाठी मदद नहीं करती। आग उदासीन है। सागर भी उसकी बात नहीं सुनता। हाथी भी उसकी समस्या को महत्व नहीं देता।

यह क्रम वास्तव में एक पूरे प्रशासनिक और सामाजिक ढाँचे का व्यंग्य बन जाता है।

छोटी-सी समस्या लेकर एक सामान्य प्राणी व्यवस्था के हर दरवाजे पर जाता है, लेकिन हर दरवाजा उसके लिए बंद है।

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7. ‘एक दाना’ नहीं, अपने हक का सवाल

कथा का सबसे धारदार वाक्य अंत में आता है। जब चिरई दाना प्राप्त कर लेती है और बढ़ई उससे पूछता है कि उसने एक दाने के लिए इतना हंगामा क्यों किया, तो चिरई का उत्तर कथा को सामान्य बाल-कहानी से उठाकर सामाजिक चेतना के स्तर पर ले जाता है—

«“सवाल एक दाना का नहीं, बल्कि अपने हक का है।”»

यही इस पूरी लोककथा का केंद्रीय दर्शन है।

दाना छोटा है, लेकिन अधिकार छोटा नहीं है।

समस्या मामूली है, लेकिन अन्याय मामूली नहीं है।

यदि किसी छोटे व्यक्ति की छोटी-सी समस्या को इसलिए अनदेखा किया जाए कि वह शक्तिशाली नहीं है, तो वह केवल उस व्यक्ति का नुकसान नहीं है; वह पूरे न्याय-तंत्र की कमजोरी है।

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8. चींटी : संख्या में छोटी, शक्ति में बड़ी

कथा का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है जब चिरई बड़े-बड़े लोगों और शक्तिशाली जीवों से निराश होकर चींटियों के पास जाती है।

यहाँ लोकबुद्धि अचानक अपना सबसे शक्तिशाली रूप प्रकट करती है।

राजा असफल रहा।

रानी असफल रही।

साँप, लाठी, आग, सागर और हाथी—सब असफल रहे।

लेकिन चींटियाँ सफल होती हैं।

क्यों?

क्योंकि वे संगठित हैं।

एक चींटी शायद हाथी को चुनौती न दे सके, लेकिन असंख्य चींटियाँ हाथी को विवश कर सकती हैं।

यह लोककथा का अत्यंत गहरा सामाजिक रूपक है।

व्यक्ति की शक्ति सीमित हो सकती है, लेकिन सामूहिकता की शक्ति बहुत बड़ी होती है।

लोकसमाज शायद आधुनिक राजनीतिक सिद्धांतों की भाषा नहीं जानता था, लेकिन उसने अपने अनुभव से यह समझ लिया था कि संगठित छोटे लोग बड़े से बड़े शक्तिशाली को भी विवश कर सकते हैं।

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9. सत्ता की श्रृंखला और भय का मनोविज्ञान

कथा में घटनाएँ एक श्रृंखला की तरह आगे बढ़ती हैं—

चींटी हाथी को विवश करती है।

हाथी सागर को।

सागर आग को।

आग लाठी को।

लाठी साँप को।

साँप रानी को।

रानी राजा को।

राजा बढ़ई को।

और अंततः बढ़ई खूँटा चीरता है।

यह क्रम लोककथा की अद्भुत संरचनात्मक विशेषता है।

जिस व्यवस्था में कोई भी नीचे वाले की बात नहीं सुनता, वहाँ ऊपर वाला भी तभी सक्रिय होता है जब उसे नीचे से आने वाले दबाव का अनुभव होता है।

कथा इस प्रकार सत्ता के पूरे ढाँचे पर व्यंग्य करती है।

यह व्यंग्य आज भी प्रासंगिक लगता है।

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10. भोजपुरी लोककथा का लोकतांत्रिक पक्ष

भोजपुरी लोककथा का संसार आश्चर्यजनक रूप से लोकतांत्रिक है।

राजा और चिरई एक ही कथा के पात्र हैं।

हाथी और चींटी एक ही सामाजिक संरचना में संवाद करते हैं।

निर्जीव वस्तुएँ भी बोलती हैं।

इससे लोककथा सत्ता और सामान्य जन के बीच की दूरी को तोड़ती है।

राजा सर्वशक्तिमान नहीं है।

हाथी अजेय नहीं है।

सागर अंतिम शक्ति नहीं है।

और चिरई असहाय नहीं है।

यह लोकमानस की कल्पनाशील लोकतांत्रिक चेतना है।

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11. दोनों कथाओं में समान सूत्र

पहली दृष्टि में ‘कउवाहँकनी’ और ‘चिरई और दाल का दाना’ बिल्कुल अलग कथाएँ लगती हैं। एक राजमहल की कथा है और दूसरी एक छोटी चिरई की। लेकिन दोनों को ध्यान से पढ़ने पर इनके भीतर कई समान सूत्र दिखाई देते हैं।

पहला सूत्र : अन्याय

‘कउवाहँकनी’ में तीसरी रानी के साथ अन्याय होता है।

‘चिरई और दाल का दाना’ में चिरई के अधिकार की उपेक्षा होती है।

दूसरा सूत्र : सत्ता की विफलता

पहली कथा में राजा बिना सत्य जाने निर्णय कर देता है।

दूसरी कथा में राजा एक छोटी प्रजा की समस्या सुनने से इनकार कर देता है।

तीसरा सूत्र : कमजोर की आवाज

पहली कथा में तीसरी रानी की आवाज दबा दी जाती है।

दूसरी कथा में चिरई की आवाज लगातार दबाई जाती है।

चौथा सूत्र : सत्य की वापसी

पहली कथा में बच्चों के माध्यम से सत्य सामने आता है।

दूसरी कथा में सामूहिक दबाव के माध्यम से चिरई को उसका अधिकार मिलता है।

पाँचवाँ सूत्र : लोकन्याय

दोनों कथाओं में अंततः न्याय स्थापित होता है।

यही भोजपुरी लोककथा की मूल शक्ति है—वह निराशा के बीच न्याय की कल्पना करती है।

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12. लोककथा में पशु-पक्षी क्यों बोलते हैं?

भोजपुरी लोककथाओं में चिरई, कौवा, सियार, लोमड़ी, साँप, हाथी और चींटी जैसे पात्रों की भरमार है।

इसका कारण केवल मनोरंजन नहीं है।

पशु-पक्षियों के माध्यम से कथाकार समाज की आलोचना अधिक स्वतंत्रता से कर सकता था। यदि कोई कथावाचक सीधे राजा या किसी शक्तिशाली व्यक्ति की आलोचना करे तो समस्या हो सकती थी; लेकिन यदि वही बात चिरई और हाथी के माध्यम से कही जाए, तो वह लोककथा बन जाती है।

इस प्रकार पशु पात्र लोकव्यंग्य के सुरक्षित माध्यम भी थे।

चिरई सामान्य व्यक्ति का प्रतिनिधित्व कर सकती है।

सियार चालाकी का।

हाथी शक्ति का।

चींटी सामूहिकता का।

साँप भय का।

और राजा सत्ता का।

यह प्रतीकात्मक संसार लोककथा को कई स्तरों पर अर्थवान बनाता है।

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13. लोककथा और भोजपुरी भाषा

लोककथा का सबसे बड़ा खजाना केवल उसकी कहानी नहीं, उसकी भाषा भी है।

“माई रे माई”, “धिया री धिया”, “बढ़ई-बढ़ई”, “राजा-राजा”, “रानी-रानी”—ऐसे संबोधन लोकभाषा के भावात्मक संसार को जीवित रखते हैं।

कथा में दोहराव भी महत्त्वपूर्ण है। एक ही संरचना बार-बार लौटती है। बच्चों को यह दोहराव आनंद देता है और उन्हें कथा याद रखने में भी सहायता करता है।

मौखिक परंपरा में यही दोहराव स्मृति की तकनीक था।

कथावाचक लिखित पाठ नहीं देखता था। उसे कथा याद रखनी होती थी। इसलिए संवाद, तुक, दोहराव और क्रमबद्धता ने उसकी स्मृति को सहारा दिया।

इस दृष्टि से लोककथा भोजपुरी भाषा की मौखिक पाठशाला थी।

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14. दादी-नानी की कहानी : घर की अनौपचारिक पाठशाला

लगभग तीन दशक पहले तक भोजपुरी क्षेत्र के गाँवों में दादी-नानी और घर के बड़े-बुजुर्ग बच्चों को रात में कहानी सुनाते थे।

यह केवल मनोरंजन का समय नहीं था।

उस समय बच्चे भाषा सीखते थे।

मुहावरे सीखते थे।

संबंधों की भाषा सीखते थे।

अच्छे-बुरे आचरण का फर्क समझते थे।

धैर्य, बुद्धिमत्ता, साहस और न्याय जैसे मूल्यों को कथा के पात्रों के माध्यम से समझते थे।

दादी-नानी किसी पाठ्यपुस्तक की तरह नैतिक शिक्षा नहीं देती थीं। वे कहानी सुनाती थीं और बच्चे कहानी के भीतर से नैतिकता खोजते थे।

यही लोकशिक्षा की विशिष्टता थी।

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15. खलिहान की रात और कथा की सामूहिकता

भोजपुरी लोककथा का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थल था—खलिहान।

फसल की रखवाली करने वाले अगोरिया रात-रात भर जागते थे। चारों ओर अँधेरा, दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की आवाज, खेतों की हवा और बीच में किसी बुजुर्ग कथावाचक की आवाज।

एक कथा शुरू होती।

फिर कोई श्रोता बीच में प्रश्न करता।

कथावाचक किसी पुराने प्रसंग को याद करता।

हँसी होती।

कभी भय पैदा होता।

कभी बच्चे उत्साहित होते।

और कभी कथा इतनी लंबी होती कि रात बीत जाती।

कई कथाएँ एक रात में पूरी नहीं होती थीं।

अगली रात वहीं से कथा फिर शुरू होती।

इस प्रकार लोककथा केवल कहानी नहीं थी; वह सामुदायिक समय का निर्माण करती थी।

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16. आज कहानी क्यों खत्म हो रही है?

आधुनिकता ने मनुष्य को सुविधाएँ दी हैं, लेकिन उसने उसके सामूहिक समय को भी बदल दिया है।

पहले परिवार एक साथ बैठता था।

अब हर व्यक्ति अपनी स्क्रीन के सामने बैठ सकता है।

पहले मनोरंजन सामूहिक था।

अब मनोरंजन निजी हो गया है।

पहले कहानी कहने वाला व्यक्ति परिवार का बुजुर्ग था।

अब कहानी कहने का काम स्क्रीन, वीडियो और डिजिटल मंच कर रहे हैं।

इस बदलाव को केवल ‘पुराना अच्छा था, नया खराब है’ जैसी सरल दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। आधुनिक तकनीक अपने साथ ज्ञान और अभिव्यक्ति के नए अवसर भी लाई है।

लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब नई तकनीक पुरानी स्मृति को पूरी तरह विस्थापित कर देती है।

यदि भोजपुरी लोककथाएँ केवल इंटरनेट पर किसी एक लिखित रूप में बची रह जाएँ और उन्हें बोलने वाला कोई न रहे, तो उनकी भाषा का जीवंत स्वर खो जाएगा।

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17. संकट केवल लोककथा का नहीं, लोकभाषा का भी है

लोककथा के खत्म होने का अर्थ भोजपुरी भाषा की एक पूरी परत के खत्म होने से है।

कथा के साथ स्थानीय शब्द चले जाते हैं।

संबोधन चले जाते हैं।

मुहावरे चले जाते हैं।

उच्चारण की विशिष्टता चली जाती है।

कथावाचन की लय चली जाती है।

और अंततः उस भाषा की वह आत्मीयता भी कम हो जाती है जो लिखित शब्दों में हमेशा पूरी तरह नहीं उतर सकती।

इसलिए भोजपुरी लोककथाओं का संरक्षण वास्तव में भोजपुरी की भाषिक विविधता और सांस्कृतिक स्मृति का संरक्षण है।

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18. लोककथा को केवल ‘बच्चों की कहानी’ समझना भूल है

लोककथाओं को अक्सर बच्चों की कहानियों के रूप में देखा जाता है। यह दृष्टि अधूरी है।

‘चिरई और दाल का दाना’ को यदि केवल बच्चों के मनोरंजन की कहानी माना जाए, तो उसका सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्य छूट जाएगा—“सवाल एक दाना का नहीं, बल्कि अपने हक का है।”

इसी प्रकार ‘कउवाहँकनी’ को केवल सौतेली रानियों की ईर्ष्या की कहानी मानना भी उसके सामाजिक अर्थ को सीमित कर देगा।

इन कथाओं में परिवार, सत्ता, स्त्री, न्याय, अधिकार, श्रम, वर्गीय संबंध और सामूहिक शक्ति जैसे प्रश्न मौजूद हैं।

लोककथा की भाषा सरल हो सकती है, लेकिन उसका अनुभव सरल नहीं होता।

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19. लोककथा में स्त्री की भूमिका

भोजपुरी लोककथा संसार में स्त्रियाँ केवल पीड़ित पात्र नहीं हैं।

वे कथावाचक भी हैं।

दादी, नानी, माँ और गाँव की बुजुर्ग महिलाएँ पीढ़ियों तक इन कथाओं को बचाती रही हैं।

‘कउवाहँकनी’ में तीसरी रानी पीड़ा का प्रतीक है, लेकिन कोहइनियाँ करुणा और संरक्षण की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है।

‘चिरई और दाल का दाना’ में रानी की भूमिका नकारात्मक रूप से शुरू होती है, लेकिन अंततः वही राजा को न्याय के प्रश्न पर सक्रिय करती है।

इसलिए लोककथाओं में स्त्री की भूमिका एकरेखीय नहीं है। उसमें पीड़ा, ईर्ष्या, मातृत्व, करुणा, विवेक और हस्तक्षेप—सभी दिखाई देते हैं।

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20. लोककथा का असली नायक कौन है?

यदि इन दोनों कथाओं से नायक चुनना हो तो उत्तर किसी राजा या राजकुमार का नाम नहीं होगा।

‘कउवाहँकनी’ में असली शक्ति सत्य की है।

‘चिरई और दाल का दाना’ में असली शक्ति सामूहिकता की है।

यानी भोजपुरी लोककथा का नायक अक्सर वही होता है जिसके पास राजसत्ता नहीं है।

छोटी चिरई।

चींटी।

मिट्टी में छिपे बच्चे।

एक सामान्य ग्रामीण स्त्री।

यही लोककथा का लोकतांत्रिक चरित्र है।

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21. आज के समय में ‘चिरई’ की प्रासंगिकता

आज भी समाज में अनेक ऐसी समस्याएँ हैं जिनमें समस्या छोटी दिखाई देती है, लेकिन उसके पीछे अधिकार का बड़ा प्रश्न छिपा होता है।

किसी गरीब की छोटी समस्या।

किसी श्रमिक की छोटी माँग।

किसी ग्रामीण की छोटी शिकायत।

किसी बच्चे की छोटी-सी आवाज।

यदि व्यवस्था यह कहकर उन्हें टाल दे कि “इतनी-सी बात के लिए क्यों परेशान हो?”, तो चिरई की कथा हमें याद दिलाती है कि प्रश्न केवल वस्तु का नहीं, अधिकार का है।

इसीलिए लोककथा पुरानी होकर भी अप्रासंगिक नहीं होती।

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22. और ‘कउवाहँकनी’ आज हमें क्या बताती है?

‘कउवाहँकनी’ आज भी यह सवाल पूछती है कि क्या केवल सत्ता के पास होना सत्य का प्रमाण है?

क्या किसी व्यक्ति पर बिना उसकी बात सुने निर्णय कर देना न्याय है?

क्या ईर्ष्या और षड्यंत्र किसी निर्दोष को अपराधी बना सकते हैं?

और क्या समाज किसी पीड़ित की आवाज सुनने से पहले उसके बारे में फैसला कर देता है?

इन प्रश्नों के कारण यह कथा आज भी पढ़े जाने और पुनः सुनाए जाने योग्य है।

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23. संरक्षण की आवश्यकता : केवल संग्रह नहीं, पुनर्जीवन

लोककथाओं को बचाने का अर्थ केवल उन्हें किताब में छाप देना नहीं है।

किताब जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं।

इन कथाओं के ऑडियो रिकॉर्ड होने चाहिए।

बुजुर्ग कथावाचकों की आवाज सुरक्षित की जानी चाहिए।

गाँवों में कथा-संध्या आयोजित होनी चाहिए।

विद्यालयों में भोजपुरी लोककथा-पाठ की परंपरा विकसित की जा सकती है।

स्थानीय विश्वविद्यालय और शोधार्थी गाँव-गाँव जाकर कथाओं का दस्तावेजीकरण कर सकते हैं।

एक ही कथा के अलग-अलग गाँवों में प्रचलित रूपों को रिकॉर्ड करना चाहिए, क्योंकि मौखिक परंपरा की खूबसूरती ही उसके विविध रूपों में है।

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24. डिजिटल युग लोककथा का शत्रु ही क्यों बने?

डिजिटल माध्यम को केवल संकट के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा।

जिस मोबाइल फोन ने लोककथा सुनने की पुरानी परंपरा को कमजोर किया है, वही मोबाइल फोन लोककथा को बचाने का सबसे प्रभावी साधन भी बन सकता है।

किसी दादी की आवाज रिकॉर्ड की जा सकती है।

किसी बुजुर्ग अगोरिया की पूरी रात की कथा रिकॉर्ड की जा सकती है।

भोजपुरी के अलग-अलग इलाकों में प्रचलित एक ही कथा के अलग संस्करण सुरक्षित किए जा सकते हैं।

ऑडियो, वीडियो, डिजिटल संग्रह और ऑनलाइन अभिलेखागार बनाए जा सकते हैं।

अर्थात चुनौती यह नहीं कि तकनीक को हटाया जाए।

चुनौती यह है कि तकनीक को लोकस्मृति का दुश्मन नहीं, उसका अभिलेखागार बनाया जाए।

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25. लोककथा बचाना क्यों जरूरी है?

लोककथा बचाना अतीत को बचाना नहीं है।

यह वर्तमान को अपनी जड़ों से जोड़ना है।

लोककथा में किसी समाज की कल्पना शक्ति बची रहती है।

उसकी हँसी बचती है।

उसका भय बचता है।

उसका दुख बचता है।

उसका प्रतिरोध बचता है।

उसकी भाषा बचती है।

और सबसे बढ़कर उसकी सामूहिक स्मृति बचती है।

जिस समाज को अपनी कहानियाँ याद नहीं रहतीं, वह धीरे-धीरे अपनी सांस्कृतिक स्मृति खो देता है।

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निष्कर्ष : कहानी बचाइए, क्योंकि कहानी में समाज बचा है

भोजपुरी लोककथाएँ उस समय की आवाज हैं जब गाँवों में मनोरंजन के साधन कम थे, लेकिन कल्पना की कोई कमी नहीं थी। जब पुस्तकें हर घर में नहीं थीं, लेकिन स्मृति में हजारों कथाएँ थीं। जब रेडियो और टेलीविजन गाँवों तक सीमित रूप से पहुँचते थे, लेकिन दादी-नानी की आवाज हर घर में पहुँचती थी।

आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं।

अब रात में खलिहान की अगोरिया के बीच कथा सुनाने वाले लोग कम हो गए हैं। बच्चों को सुलाने के लिए दादी की कहानी की जगह मोबाइल की स्क्रीन ने ले ली है। परिवार के बुजुर्गों की स्मृति में सुरक्षित कथाएँ उनके साथ ही समाप्त होने के खतरे में हैं।

यह केवल nostalgia का विषय नहीं है।

यह सांस्कृतिक क्षरण का प्रश्न है।

‘कउवाहँकनी’ हमें बताती है कि सत्य को दबाया जा सकता है, समाप्त नहीं किया जा सकता।

‘चिरई और दाल का दाना’ हमें बताती है कि अधिकार छोटा-बड़ा नहीं होता और सामूहिकता सबसे कमजोर आवाज को भी शक्ति दे सकती है।

इन दोनों कथाओं में भोजपुरी लोकमानस की दो बड़ी आकांक्षाएँ दिखाई देती हैं—न्याय और सम्मान।

और शायद यही कारण है कि लोककथाएँ बूढ़ी नहीं होतीं। बूढ़े केवल उनके कथावाचक होते हैं; कथा स्वयं हर पीढ़ी में नया अर्थ लेकर जन्म ले सकती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भोजपुरी लोककथा को संग्रहालय की वस्तु न बनने दें। उसे फिर से घरों में, विद्यालयों में, गाँव की चौपालों में, साहित्यिक आयोजनों में और डिजिटल माध्यमों में जीवित करें।

क्योंकि जब कोई दादी किसी बच्चे से कहती है—“एक बार की बात है…”—तब केवल कहानी शुरू नहीं होती।

एक पूरी सभ्यता बोलना शुरू करती है।

और जब वह आवाज हमेशा के लिए बंद हो जाती है, तब केवल एक कहानी समाप्त नहीं होती—

लोक की स्मृति का एक अध्याय समाप्त हो जाता है।

इसलिए भोजपुरी लोककथाओं को बचाना अतीत की रक्षा करना भर नहीं है; यह उस समाज की आत्मा को बचाना है जिसने अपनी सबसे कठिन परिस्थितियों में भी कहानी कहने की कला नहीं छोड़ी।

कहानी बचाइए।
कथावाचक बचाइए।
भोजपुरी की लोकस्मृति बचाइए।

क्योंकि आने वाली पीढ़ियाँ केवल यह नहीं पूछेंगी कि हमारे पूर्वजों ने क्या बनाया था—वे यह भी पूछेंगी कि वे क्या सुनते थे, क्या कहते थे और अपने बच्चों को कौन-सी कहानियाँ सुनाकर बड़ा करते थे।





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परिचय
लक्ष्मीकांत मुकुल 
जन्म – 08 जनवरी 1973
शिक्षा – विधि स्नातक 
किसान कवि। कवितायें एवं आलेख विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित । दो कविता संकलन “लाल चोंच वाले पंछी’’ व  "घिस रहा है धान का कटोरा" और ग्रामीण इतिहास पर केंद्रित पुस्तक "यात्रियों के नजरिए में शाहाबाद" प्रकाशित।

संपर्क :-
ग्राम – मैरा, पोस्ट – सैसड,
भाया – धनसोई ,
बक्सर,
(बिहार) – 802117
ईमेल – kvimukul12111@gmail.com
मोबाइल नंबर - 6202077236









शाहाबाद में घिस रहा है धान का कटोरा {कृषि, सिंचाई, बाजार, प्रवास और बदलती ग्रामीण संस्कृति के बीच एक ऐतिहासिक भूभाग की पड़ताल}— लक्ष्मीकांत मुकुल


शाहाबाद में घिस रहा है धान का कटोरा

{कृषि, सिंचाई, बाजार, प्रवास और बदलती ग्रामीण संस्कृति के बीच एक ऐतिहासिक भूभाग की पड़ताल}

— लक्ष्मीकांत मुकुल

बिहार के पश्चिमी अंचल की चर्चा जब भी होती है, तो उसके भूगोल के साथ-साथ एक विशेष कृषि-संस्कृति की स्मृति सामने आती है—गंगा और सोन का विस्तृत मैदान, नहरों का जाल, धान के खेत, गांवों के तालाब, खलिहान, चूड़ा-दही, माड़-भात और भोजपुरी लोकजीवन की वह सहज लय, जिसमें कृषि केवल रोजी-रोटी नहीं बल्कि सामाजिक जीवन का आधार रही है।

ऐतिहासिक रूप से इस भूभाग को शाहाबाद कहा जाता रहा है। प्रशासनिक पुनर्गठन के बाद पुराना शाहाबाद मुख्यतः भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर जिलों में विभाजित है। आरा, बक्सर, सासाराम और भभुआ इसके प्रमुख नगर हैं।

यह भूभाग लंबे समय से कृषि की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। विशेष रूप से रोहतास को जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट आज भी बिहार का “Rice Bowl”कहती है।

लेकिन आज इस ‘धान के कटोरे’ की कहानी एक नए मोड़ पर खड़ी है।

कटोरा टूटा नहीं है। धान आज भी बोया जाता है। किसान आज भी खेत में उतरता है। नहरें आज भी बहती हैं और चावल आज भी इस भूभाग के भोजन और बाजार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

लेकिन कटोरे की चमक जरूर फीकी हुई है।

कहीं सिंचाई की विश्वसनीयता कमजोर हुई है, कहीं भूजल पर निर्भरता बढ़ी है, कहीं खेती की लागत ने किसान को दबाया है, कहीं श्रमिकों का प्रवास कृषि-चक्र को प्रभावित कर रहा है, कहीं बाजार और खरीद व्यवस्था के बीच किसान की स्थिति कमजोर है और कहीं धान से जुड़ी पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियाँ खेतों से निकलकर केवल आयोजनों और स्मृति-कथाओं में सिमटती जा रही हैं।

इसलिए ‘शाहाबाद में घिस रहा है धान का कटोरा’ केवल कृषि-संकट का शीर्षक नहीं है। यह एक पूरे कृषि-सांस्कृतिक भूगोल में हो रहे परिवर्तन की पड़ताल है।


1. शाहाबाद और धान : एक कृषि-संस्कृति की कहानी

किसी क्षेत्र को ‘धान का कटोरा’ कहना केवल इस बात का प्रमाण नहीं है कि वहाँ बहुत धान पैदा होता है।

धान का कटोरा तब बनता है जब—

मिट्टी + पानी + श्रम + किसान का ज्ञान + बाजार + सामाजिक संस्कृति

मिलकर एक स्थायी कृषि-व्यवस्था का निर्माण करते हैं।

शाहाबाद में धान का महत्व इसी व्यापक अर्थ में रहा है।

धान खेत की फसल होने के साथ-साथ घर का भोजन था। उससे चावल बनता था, चूड़ा बनता था, माड़ निकलता था। धान का भूसा पशुओं के काम आता था और कृषि-अवशेष ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहे हैं।

धान की खेती का एक सामाजिक कैलेंडर भी था।

खेत की तैयारी, रोपनी, निराई, फसल की निगरानी, कटाई, दौनी, सुखाई और भंडारण—हर चरण ग्रामीण जीवन में अलग गतिविधि पैदा करता था।

इसलिए धान की फसल को केवल उत्पादन के आंकड़े से नहीं समझा जा सकता।

यह ग्रामीण जीवन की समय-सारणी भी थी।


2. सोन और शाहाबाद : पानी ने बनाया कृषि का भूगोल

शाहाबाद की कृषि-समृद्धि की चर्चा सोन नदी और उससे जुड़ी सिंचाई व्यवस्था के बिना अधूरी है।

सोन नदी पर आधारित नहर प्रणाली ने पुराने शाहाबाद के कृषि भूगोल को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नहरों के विस्तार के साथ सिंचित क्षेत्र बढ़े और अनेक इलाकों में कृषि की उत्पादकता और फसल-पद्धति पर इसका प्रभाव पड़ा।

सोन नहर प्रणाली की महत्ता केवल इस बात में नहीं थी कि उसने खेतों को पानी दिया। उसने कृषि के जोखिम को कम किया और किसान को वर्षा पर पूरी तरह निर्भर रहने से कुछ राहत दी।

लेकिन नहर व्यवस्था की उपयोगिता उसके निर्माण से नहीं, उसके संचालन और रखरखाव से तय होती है।

मुख्य नहर में पानी हो और खेत तक न पहुँचे तो किसान के लिए नहर का अस्तित्व अधूरा है।

नहर की क्षमता कम हो, गाद जमा हो, वितरण नालियाँ क्षतिग्रस्त हों या पानी समय पर उपलब्ध न हो, तो किसान को वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़ते हैं।

यहीं से सिंचाई का संकट लागत के संकट में बदल जाता है।

सरकार ने सोन नहर प्रणाली के आधुनिकीकरण और लाइनिंग जैसी परियोजनाओं पर भी काम किया है। इससे यह स्पष्ट है कि इस ऐतिहासिक सिंचाई तंत्र की क्षमता और दक्षता का प्रश्न आज भी नीति के केंद्र में है।


3. धान का कटोरा : आंकड़ों की कसौटी पर

भावनात्मक रूपक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन शोधपरक लेखन में आंकड़ों की भूमिका उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का Directorate of Economics and Statistics (DES) जिला-वार Area, Production and Yield डेटाबेस उपलब्ध कराता है। इसमें राज्य, जिला, फसल, मौसम और वर्ष के आधार पर क्षेत्रफल, उत्पादन और उत्पादकता देखी जा सकती है।

शाहाबाद पर गंभीर शोध के लिए भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर का यही डेटाबेस सबसे महत्वपूर्ण आधार होना चाहिए।

उपलब्ध पुराने सरकारी आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि धान चारों जिलों की कृषि-अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण रहा है।

उदाहरण के लिए 2016-17 के जिला-स्तरीय आंकड़ों में भोजपुर में लगभग 0.96 लाख हेक्टेयर और बक्सर में लगभग 0.85 लाख हेक्टेयर क्षेत्र धान के अंतर्गत दर्ज किया गया था। इसी स्रोत में भोजपुर का धान उत्पादन लगभग 2.84 लाख टनऔर बक्सर का लगभग 2.58 लाख टन दर्ज है।

ये आंकड़े वर्तमान उत्पादन के आंकड़े नहीं हैं। उनका महत्व ऐतिहासिक प्रवृत्ति समझने में है।

इसीलिए आज आवश्यकता है कि चारों जिलों के लिए कम-से-कम 2000-01 से 2024-25 तक की वर्षवार श्रृंखला तैयार की जाए—

सूचकभोजपुरबक्सररोहतासकैमूर
धान क्षेत्रफलवर्षवार सरकारी आंकड़ावर्षवार सरकारी आंकड़ावर्षवार सरकारी आंकड़ावर्षवार सरकारी आंकड़ा
धान उत्पादनवर्षवार सरकारी आंकड़ावर्षवार सरकारी आंकड़ावर्षवार सरकारी आंकड़ावर्षवार सरकारी आंकड़ा
उत्पादकताउत्पादन/हेक्टेयरउत्पादन/हेक्टेयरउत्पादन/हेक्टेयरउत्पादन/हेक्टेयर
सिंचित क्षेत्रजिला स्रोत सेजिला स्रोत सेजिला स्रोत सेजिला स्रोत से
MSP खरीदराज्य/जिला खरीद आंकड़ाराज्य/जिला खरीद आंकड़ाराज्य/जिला खरीद आंकड़ाराज्य/जिला खरीद आंकड़ा

यह तालिका केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं होगी।

इससे यह पता चलेगा कि पिछले 20–25 वर्षों में धान का क्षेत्र घटा है या बढ़ा, उत्पादन किस गति से बदला और उत्पादकता में क्या परिवर्तन आया।

यही वह शोध है जिसकी जरूरत शाहाबाद के ‘धान के कटोरे’ की वर्तमान स्थिति को वैज्ञानिक ढंग से समझने के लिए है।


4. बिहार में धान की व्यापक तस्वीर

बिहार की कृषि में धान की केंद्रीय भूमिका आज भी बनी हुई है।

ICAR के अनुसार बिहार में लगभग 3.2 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र धान के अधीनहै। संस्थान ने राज्य में धान की कम उत्पादकता तथा बाढ़, जलभराव, सूखा और पोषक तत्वों की कमी जैसी चुनौतियों को रेखांकित किया है।

इसका अर्थ यह नहीं कि बिहार धान की खेती से बाहर जा रहा है।

बल्कि वास्तविक प्रश्न है—

क्या वही भूमि, वही पानी और वही श्रम भविष्य में पहले की तरह लाभकारी ढंग से धान पैदा कर पाएंगे?

यहीं शाहाबाद की चिंता शुरू होती है।


5. सिंचाई : धान के कटोरे की सबसे बड़ी परीक्षा

धान की खेती और पानी का संबंध स्वाभाविक है।

लेकिन ‘धान को पानी चाहिए’ कहना समस्या को बहुत सरल बना देना होगा।

असल प्रश्न है—

कब पानी चाहिए? कितना पानी चाहिए? किस स्रोत से चाहिए? और उसकी लागत कितनी है?

शाहाबाद में ऐतिहासिक नहर व्यवस्था के बावजूद किसान अनेक स्थानों पर निजी सिंचाई स्रोतों पर निर्भर रहते हैं।

भूजल इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2024 के बिहार आकलन के अनुसार राज्य में कृषि क्षेत्र भूजल निष्कर्षण का लगभग 72.41 प्रतिशत हिस्सा उपयोग करता है।

यह पूरे बिहार का आंकड़ा है, केवल शाहाबाद का नहीं। लेकिन इससे कृषि और भूजल के संबंध की व्यापक तस्वीर सामने आती है।

यदि नहर कमजोर होगी तो भूजल पर दबाव बढ़ेगा।

यदि भूजल महँगा होगा तो सिंचाई की लागत बढ़ेगी।

यदि सिंचाई की लागत बढ़ेगी तो धान की खेती की लाभप्रदता प्रभावित होगी।

इसलिए शाहाबाद के लिए जल-नीति का मूल सिद्धांत होना चाहिए—

नहर को मजबूत करो, भूजल को बचाओ और वर्षाजल को रोककर रखो।


6. सोन नहर : विरासत से आगे

सोन नहर प्रणाली को केवल ऐतिहासिक धरोहर की तरह देखना पर्याप्त नहीं है।

इसे 21वीं सदी की कृषि-व्यवस्था के अनुरूप पुनर्गठित करने की आवश्यकता है।

इसके लिए चार स्तरों पर काम होना चाहिए—

पहला : मुख्य नहर

जल-धारण क्षमता और संरचनात्मक मजबूती।

दूसरा : वितरण तंत्र

शाखा और उप-नहरों की नियमित सफाई और मरम्मत।

तीसरा : खेत तक पानी

अंतिम छोर के किसानों तक पानी पहुँचने की निगरानी।

चौथा : जल-दक्षता

खेत में उपलब्ध पानी का अधिक कुशल उपयोग।

सिर्फ बड़ी नहर बनाना पर्याप्त नहीं।

‘हेड से टेल तक पानी’ पहुँचना असली कसौटी है।


7. श्रम संकट : गांव का युवा और खेत का भविष्य

धान की खेती श्रम-सघन रही है।

रोपनी, निराई और कटाई जैसे कार्यों में बड़ी मात्रा में श्रम की जरूरत पड़ती है।

लेकिन शाहाबाद के गांवों में एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन हुआ है—युवा पीढ़ी का एक हिस्सा रोजगार की तलाश में गांव से बाहर जा रहा है।

यह प्रवास अपने आप में नकारात्मक घटना नहीं है। बाहर से आने वाली आय अनेक ग्रामीण परिवारों की आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण स्रोत हो सकती है।

लेकिन कृषि के लिए समस्या तब उत्पन्न होती है जब—

  • रोपनी के समय मजदूर उपलब्ध नहीं होते,
  • मजदूरी तेजी से बढ़ती है,
  • कटाई समय पर नहीं हो पाती,
  • छोटे किसान मशीन किराये पर लेने को मजबूर होते हैं।

इसलिए प्रवास को रोकना समाधान नहीं।

समाधान है—

प्रवास की वास्तविकता को स्वीकार करते हुए कृषि को श्रम-कुशल बनाना।

इसके लिए कृषि-मशीनीकरण जरूरी है।


8. छोटे किसान और मशीन

कंबाइन हार्वेस्टर या आधुनिक कृषि मशीन बड़े किसान के लिए समाधान हो सकती है, लेकिन छोटे किसान के लिए वह महँगी पूंजी है।

यहीं कस्टम हायरिंग सेंटर और सामुदायिक मशीन बैंक उपयोगी हो सकते हैं।

एक पंचायत या किसान उत्पादक संगठन के स्तर पर मशीन उपलब्ध हो और किसान उसे आवश्यकता के समय किराये पर ले सके।

इससे दो लाभ होंगे—

  1. मशीन का उपयोग बढ़ेगा।
  2. छोटे किसान की लागत घटेगी।

भविष्य की कृषि का मॉडल संभवतः ‘हर किसान के पास मशीन’ नहीं, बल्कि—

‘हर किसान को समय पर मशीन उपलब्ध’

होना चाहिए।


9. लागत बनाम MSP

धान के आर्थिक संकट पर चर्चा करते समय न्यूनतम समर्थन मूल्य सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक है।

2025-26 में सामान्य धान का MSP ₹2,369 प्रति क्विंटल था।

2026-27 के लिए इसे बढ़ाकर ₹2,441 प्रति क्विंटल किया गया है। Grade-A धान का MSP 2026-27 के लिए ₹2,461 प्रति क्विंटल है।

सरकारी लागत-गणना में 2026-27 के लिए सामान्य धान की लागत ₹1,627 प्रति क्विंटल बताई गई है और MSP को उस लागत से 50 प्रतिशत के मार्जिन के साथ निर्धारित किया गया है।

यह सरकारी मूल्य-निर्धारण का महत्वपूर्ण पक्ष है।

लेकिन किसान की वास्तविक स्थिति समझने के लिए एक दूसरा सवाल भी जरूरी है—

क्या किसान वास्तव में अपनी पूरी उपज MSP पर बेच पाता है?

यदि किसान को स्थानीय व्यापारी को कम कीमत पर बेचना पड़े, तो घोषित MSP और वास्तविक प्राप्त मूल्य के बीच अंतर पैदा होता है।

इसलिए किसान की आय पर शोध करते समय केवल MSP नहीं, बल्कि actual farm-gate price भी दर्ज होना चाहिए।


10. खरीद व्यवस्था : घोषणा से ज्यादा महत्वपूर्ण क्रियान्वयन

MSP तभी किसान के लिए आर्थिक सुरक्षा बनता है जब खरीद की व्यवस्था प्रभावी हो।

किसान के लिए प्रक्रिया सरल होनी चाहिए—

पंजीकरण → खरीद केंद्र → गुणवत्ता परीक्षण → तौल → भुगतान।

यदि इनमें से किसी चरण में समस्या है तो MSP की उपयोगिता घटती है।

यही कारण है कि शाहाबाद के चारों जिलों के लिए हर वर्ष निम्न आंकड़े सार्वजनिक किए जाने चाहिए—

  • कुल धान उत्पादन,
  • खरीद का लक्ष्य,
  • वास्तविक खरीद,
  • खरीद करने वाले किसानों की संख्या,
  • औसत खरीदी मात्रा,
  • भुगतान का औसत समय।

इन आंकड़ों से पता चलेगा कि सरकारी खरीद वास्तव में कितने किसानों तक पहुँचती है।


11. बाजार और मूल्य-वर्धन

किसान धान बेचता है।

लेकिन धान चावल बनकर अधिक मूल्यवान उत्पाद बन जाता है।

फिर पैकेजिंग होती है।

फिर ब्रांड बनता है।

फिर वही उत्पाद शहरों और ऑनलाइन बाजार तक पहुँचता है।

यदि किसान इस पूरी मूल्य-श्रृंखला से बाहर रहेगा तो उसकी आय केवल कच्चे उत्पाद के मूल्य तक सीमित रहेगी।

इसलिए शाहाबाद में किसान उत्पादक संगठनों को केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि कृषि-व्यवसाय की इकाई बनाना होगा।

एक संभावित श्रृंखला हो सकती है—

किसान → FPO → मिलिंग → ग्रेडिंग → पैकेजिंग → ब्रांड → बाजार।

इससे शाहाबाद के चावल की स्थानीय पहचान भी विकसित की जा सकती है।


12. ‘शाहाबाद राइस’ : एक संभावित कृषि-ब्रांड

यदि किसी क्षेत्र में भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान मजबूत हो तो उसका उपयोग कृषि विपणन में भी किया जा सकता है।

शाहाबाद की पहचान—

  • सोन नदी,
  • भोजपुरी संस्कृति,
  • कृषि इतिहास,
  • धान,
  • चूड़ा,
  • स्थानीय भोजन

से जुड़ी है।

यदि वैज्ञानिक गुणवत्ता मानक पूरे किए जाएँ तो ‘शाहाबाद’ नाम से क्षेत्रीय चावल ब्रांड विकसित करने की संभावना पर अध्ययन किया जा सकता है।

यह किसी एक किसान या कंपनी का ब्रांड नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कृषि पहचान बन सकता है।

हालाँकि इसके लिए पहले यह निर्धारित करना होगा कि किस किस्म या किस गुणवत्ता को इस नाम से बाजार में प्रस्तुत किया जाए।


13. बीज : खेत की स्मृति

धान की कहानी बीज से शुरू होती है।

शाहाबाद में किसानों की पीढ़ियों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अनेक धान किस्मों का चयन किया।

लोक-स्मृति में सोनाचुर, सितवा, कनकजिर, मंसूरिया जैसे नाम मिलते हैं।

लेकिन शोधपरक लेखन में किसी स्थानीय नाम को प्रमाणित किस्म मानने से पहले उसके स्थानीय स्रोत, कृषि विश्वविद्यालयों के अभिलेख और किसानों के मौखिक इतिहास का मिलान जरूरी है।

इसलिए इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शोध परियोजना हो सकती है—

“शाहाबाद धान बीज सर्वेक्षण”

हर प्रखंड से किसानों से जानकारी ली जाए—

  • पुरानी किस्म का नाम,
  • बोआई का समय,
  • फसल अवधि,
  • पानी की आवश्यकता,
  • स्वाद,
  • सुगंध,
  • चूड़ा बनाने की उपयोगिता,
  • बाजार मूल्य,
  • वर्तमान उपलब्धता।

इससे एक लोक-कृषि जैवविविधता रजिस्टर तैयार किया जा सकता है।


14. नई किस्म बनाम पुरानी किस्म : सही बहस क्या है?

पुरानी किस्म हमेशा बेहतर और नई किस्म हमेशा खराब—यह वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं है।

नई किस्मों में अधिक उत्पादकता, रोग-प्रतिरोध, कम अवधि या विशेष पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप गुण हो सकते हैं।

दूसरी ओर स्थानीय किस्मों में स्वाद, सुगंध, पोषण, सांस्कृतिक उपयोग और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूलन जैसे गुण हो सकते हैं।

इसलिए सही नीति है—

संरक्षण भी, अनुसंधान भी।

बिहार में कृषि अनुसंधान संस्थानों ने विभिन्न परिस्थितियों के लिए धान की अनेक किस्मों पर काम किया है।

भविष्य का किसान अपनी भूमि और बाजार के अनुसार किस्म चुने—यह अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।


15. जलवायु परिवर्तन और धान

धान की खेती मौसम से गहराई से जुड़ी है।

अत्यधिक बारिश, लंबे शुष्क अंतराल, असामान्य तापमान, बाढ़ और कटाई के समय वर्षा—सभी फसल को प्रभावित कर सकते हैं।

बिहार के लिए ICAR ने बाढ़, जलभराव, सूखा और विभिन्न भूमि परिस्थितियों को धान उत्पादन की प्रमुख चुनौतियों में शामिल किया है।

इसलिए शाहाबाद में भविष्य की कृषि नीति को climate-resilient agriculture की ओर ले जाना होगा।

इसके लिए—

  • कम अवधि वाली किस्में,
  • सूखा-सहनशील किस्में,
  • जलभराव-सहनशील किस्में,
  • मौसम आधारित कृषि सलाह,
  • बेहतर जल प्रबंधन,
  • फसल विविधीकरण

महत्वपूर्ण होंगे।


16. धान और फसल विविधीकरण

‘धान का कटोरा’ होने का अर्थ यह नहीं कि हर खेत में हर साल केवल धान ही बोया जाए।

किसान की आय और मिट्टी दोनों के लिए फसल-विविधीकरण जरूरी है।

जहाँ उपयुक्त हो, धान के बाद गेहूँ, दलहन, तिलहन या सब्जी जैसी फसलों का समावेश किया जा सकता है।

इससे किसान को एक ही फसल पर निर्भर रहने का जोखिम कम होगा।

भविष्य का ‘धान का कटोरा’ वह नहीं होगा जहाँ केवल धान हो।

बल्कि वह होगा जहाँ—

धान मजबूत हो और उसके साथ किसान की पूरी कृषि-अर्थव्यवस्था मजबूत हो।


17. कृषि बीमा : जोखिम का दूसरा सुरक्षा-चक्र

किसान के लिए मौसम का जोखिम वास्तविक है।

एक मौसम की फसल में नुकसान होने पर पूरे वर्ष की आय प्रभावित हो सकती है।

फसल बीमा इस जोखिम को कम करने का माध्यम है।

लेकिन बीमा की सफलता का मूल्यांकन केवल बीमित किसानों की संख्या से नहीं होना चाहिए।

यह देखना आवश्यक है—

  • कितने किसानों ने बीमा कराया?
  • कितने प्रभावित हुए?
  • कितने दावे दाखिल हुए?
  • कितनों को भुगतान मिला?
  • भुगतान में कितना समय लगा?

शाहाबाद के चारों जिलों के लिए यह डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध और जिला-वार विश्लेषण योग्य होना चाहिए।


18. धान और ग्रामीण स्त्री

धान की कृषि-संस्कृति की चर्चा में ग्रामीण महिलाओं की भूमिका अक्सर अदृश्य कर दी जाती है।

बीज संभालना, धान साफ करना, अनाज सुखाना, चूड़ा तैयार करना, भंडारण, घरेलू खाद्य-संसाधन और कृषि-आधारित घरेलू कामों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इसलिए कृषि का मशीनीकरण केवल पुरुष किसान की उत्पादकता का प्रश्न नहीं है।

यह ग्रामीण महिलाओं के श्रम को भी बदलता है।

कई ऐसे काम जो पहले महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे, अब मशीन या बाजार से जुड़े उत्पादों द्वारा किए जा रहे हैं।

इस बदलाव का अध्ययन भी शाहाबाद की कृषि-समाजशास्त्र का आवश्यक हिस्सा है।


19. धान और लोक-संस्कृति

धान खेत में उगता है, लेकिन उसकी संस्कृति गांव में फैलती है।

रोपनी के गीत, कजरी, झूमर, फसल से जुड़े उत्सव, नई फसल के भोजन और सामूहिक श्रम—ये सब धान की कृषि-व्यवस्था के सांस्कृतिक विस्तार हैं।

आज लोकगीत समाप्त नहीं हुए हैं।

लेकिन उनका सामाजिक संदर्भ बदल रहा है।

जो गीत कभी खेत में श्रम करते हुए गाए जाते थे, वे अब सांस्कृतिक मंचों पर सुनाई दे सकते हैं।

इसका अर्थ है कि संस्कृति बची हुई है, लेकिन उसकी सामाजिक भूमि बदल रही है।

यही कारण है कि कृषि-संस्कृति का संरक्षण केवल गीतों की रिकॉर्डिंग से नहीं होगा।

यदि खेत में सामूहिक श्रम समाप्त होता है, तो उससे जुड़े गीतों की जीवन-भूमि भी कमजोर होगी।

इसलिए कृषि-संस्कृति बचाने का अर्थ कृषि-समाज को भी बचाना है।


20. गांव से शहर की ओर : बदलता सामाजिक भूगोल

शाहाबाद के गांवों में आज एक नया सामाजिक भूगोल बन रहा है।

घर गांव में है।

कमाने वाला व्यक्ति दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र या किसी अन्य राज्य में हो सकता है।

पैसा गांव आता है।

लेकिन श्रम गांव से बाहर चला जाता है।

यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नया मॉडल है।

इसे केवल ‘पलायन’ कहकर नकारना उचित नहीं।

यह ग्रामीण परिवारों की आर्थिक रणनीति भी है।

लेकिन इसका कृषि पर प्रभाव जरूर है।

खेत में काम करने वाले लोगों की संख्या घटती है।

बूढ़े माता-पिता खेती संभालते हैं।

मजदूरी महँगी होती है।

मशीनों की मांग बढ़ती है।

इस प्रकार प्रवास और कृषि-मशीनीकरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।


21. क्या खेती अगली पीढ़ी को आकर्षित कर सकती है?

यह सबसे बड़ा सवाल है।

यदि गांव का युवा खेती को केवल कम आय, कठिन श्रम और अनिश्चित भविष्य के रूप में देखेगा तो कृषि का सामाजिक आधार कमजोर होगा।

लेकिन यदि कृषि को—

  • ड्रोन,
  • मौसम विज्ञान,
  • मृदा परीक्षण,
  • मशीनरी,
  • डिजिटल बाजार,
  • खाद्य प्रसंस्करण,
  • FPO,
  • कृषि-उद्यम

से जोड़ा जाए तो खेती की छवि बदल सकती है।

युवा किसान केवल खेत में हल चलाने वाला व्यक्ति नहीं होगा।

वह कृषि-उद्यमी हो सकता है।


22. स्कूल और कृषि

गांव के स्कूलों में स्थानीय कृषि का अध्ययन शुरू किया जा सकता है।

छात्र अपने गांव का—

  • तालाब,
  • नहर,
  • मिट्टी,
  • धान की किस्म,
  • कृषि औजार,
  • लोकगीत,
  • कृषि इतिहास

दस्तावेजित करें।

इससे स्थानीय ज्ञान की अगली पीढ़ी तैयार होगी।

बच्चे जब अपने ही गांव की कृषि को वैज्ञानिक दृष्टि से समझेंगे, तो कृषि ‘पिछड़ेपन’ की पहचान न रहकर स्थानीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का विषय बन सकती है।


23. शाहाबाद कृषि-संस्कृति क्षेत्र की अवधारणा

अब समय आ गया है कि भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर को केवल चार प्रशासनिक इकाइयों के रूप में देखने के बजाय एक व्यापक कृषि-सांस्कृतिक क्षेत्रके रूप में भी देखा जाए।

इन जिलों में भौगोलिक अंतर हैं।

मिट्टी अलग है।

सिंचाई की स्थिति अलग है।

फसल-पद्धति अलग है।

लेकिन इनके बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध मजबूत हैं।

इसलिए ‘शाहाबाद कृषि-संस्कृति क्षेत्र’ के नाम से एक शोध एवं विकास कार्यक्रम बनाया जा सकता है।

इसका उद्देश्य होगा—

जल + कृषि + बीज + बाजार + संस्कृति + ग्रामीण रोजगार

को एक साथ देखना।


24. पुनरुत्थान के दस सूत्र

1. सोन नहर पुनर्जीवन

नहरों की क्षमता, सफाई, मरम्मत और अंतिम छोर तक पानी की निगरानी।

2. खेत-स्तरीय जल प्रबंधन

तालाब, वर्षाजल-संचयन और भूजल पुनर्भरण।

3. सामुदायिक कृषि मशीन बैंक

छोटे किसानों को किराये पर मशीन उपलब्ध कराना।

4. स्थानीय बीज बैंक

पुरानी किस्मों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और संरक्षण।

5. किसान उत्पादक संगठन

किसानों को सामूहिक खरीद और बिक्री से जोड़ना।

6. स्थानीय चावल ब्रांड

गुणवत्ता-आधारित ‘शाहाबाद’ क्षेत्रीय ब्रांड की संभावना का अध्ययन।

7. खाद्य प्रसंस्करण

चावल, चूड़ा और अन्य कृषि-उत्पादों की स्थानीय मूल्य-वृद्धि।

8. मौसम-अनुकूल खेती

जलवायु-सहनशील किस्में और मौसम आधारित कृषि सलाह।

9. युवा कृषि-उद्यम

कृषि को तकनीक और व्यवसाय से जोड़ना।

10. कृषि-संस्कृति अभिलेख

बीज, गीत, औजार, भोजन और किसान-स्मृतियों का संरक्षण।


25. शोध के लिए प्रस्तावित शाहाबाद कृषि डैशबोर्ड

यदि वास्तव में यह पता लगाना है कि ‘धान का कटोरा’ कितना घिसा है, तो भावनात्मक भाषा के साथ ठोस डेटा भी चाहिए।

चारों जिलों के लिए हर वर्ष निम्न संकेतक दर्ज किए जाएँ—

संकेतकभोजपुरबक्सररोहतासकैमूर
धान क्षेत्रफलवार्षिक DES आंकड़ावार्षिक DES आंकड़ावार्षिक DES आंकड़ावार्षिक DES आंकड़ा
कुल धान उत्पादनवार्षिक DES आंकड़ावार्षिक DES आंकड़ावार्षिक DES आंकड़ावार्षिक DES आंकड़ा
उत्पादकताउत्पादन/हेक्टेयरउत्पादन/हेक्टेयरउत्पादन/हेक्टेयरउत्पादन/हेक्टेयर
सिंचित क्षेत्रजिला कृषि आंकड़ाजिला कृषि आंकड़ाजिला कृषि आंकड़ाजिला कृषि आंकड़ा
नहर से सिंचाईउपलब्ध स्रोतउपलब्ध स्रोतउपलब्ध स्रोतउपलब्ध स्रोत
भूजल निर्भरतासर्वेक्षण आवश्यकसर्वेक्षण आवश्यकसर्वेक्षण आवश्यकसर्वेक्षण आवश्यक
MSP खरीदखरीद विभागखरीद विभागखरीद विभागखरीद विभाग
औसत वास्तविक बिक्री मूल्यमंडी/सर्वेक्षणमंडी/सर्वेक्षणमंडी/सर्वेक्षणमंडी/सर्वेक्षण
बीमा कवरेजPMFBY/राज्य डेटाPMFBY/राज्य डेटाPMFBY/राज्य डेटाPMFBY/राज्य डेटा
फसल क्षतिजिला रिपोर्टजिला रिपोर्टजिला रिपोर्टजिला रिपोर्ट

यह तालिका आगे चलकर ‘शाहाबाद कृषि रिपोर्ट’ की रीढ़ बन सकती है।

DES का आधिकारिक डेटाबेस जिला-वार Area, Production और Yield की रिपोर्टिंग की सुविधा देता है।


26. आंकड़ों की राजनीति नहीं, आंकड़ों की पारदर्शिता

कृषि पर बहस में अक्सर दो अतियाँ दिखाई देती हैं।

एक पक्ष कहता है कि खेती पूरी तरह बर्बाद हो रही है।

दूसरा पक्ष कहता है कि कृषि लगातार मजबूत हो रही है।

दोनों कथन तब तक अधूरे हैं जब तक उनके पीछे जिला-स्तरीय, वर्षवार आंकड़े न हों।

शाहाबाद के लिए हमें यह नहीं कहना चाहिए कि—

‘धान समाप्त हो रहा है।’

बल्कि पूछना चाहिए—

2000 में कितना था?
2010 में कितना था?
2020 में कितना था?
आज कितना है?

इसी प्रकार पूछना चाहिए—

उत्पादन बढ़ा तो उत्पादकता कितनी बढ़ी?
उत्पादकता बढ़ी तो किसान की आय कितनी बढ़ी?
MSP बढ़ा तो वास्तविक बिक्री मूल्य कितना बदला?
नहर बनी तो कितने अतिरिक्त हेक्टेयर सिंचित हुए?

यही सवाल कृषि-विमर्श को नारे से शोध में बदलते हैं।


27. धान का कटोरा : संकट या संक्रमण?

शाहाबाद के सामने जो कुछ हो रहा है उसे केवल संकट कहना भी शायद पर्याप्त नहीं।

यह एक संक्रमण भी है।

पुरानी कृषि व्यवस्था—

बैल → मानव श्रम → नहर → स्थानीय बीज → स्थानीय बाजार

से बदलकर नई व्यवस्था की ओर बढ़ रही है—

मशीन → बाहरी श्रम/प्रवास → नहर + बोरिंग → प्रमाणित बीज → राष्ट्रीय बाजार।

इस संक्रमण में कुछ पुरानी चीजें खत्म होंगी।

कुछ नई चीजें आएँगी।

लेकिन चुनौती यह है कि परिवर्तन के दौरान किसान कमजोर न हो।


निष्कर्ष : कटोरा अभी टूटा नहीं है

शाहाबाद का ‘धान का कटोरा’ केवल एक कृषि-उपमा नहीं है।

यह उस सभ्यता का रूपक है जिसमें माटी, पानी, किसान और संस्कृति एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं।

आज इस व्यवस्था के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं।

सिंचाई की विश्वसनीयता, भूजल पर दबाव, बढ़ती लागत, श्रम का बदलता स्वरूप, बाजार की अनिश्चितता, जलवायु जोखिम और ग्रामीण संस्कृति का बदलता आधार—ये सभी मिलकर धान की पारंपरिक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।

लेकिन यह कहना कि धान का कटोरा टूट चुका है, उपलब्ध प्रमाणों से अधिक बड़ा निष्कर्ष होगा।

धान आज भी बिहार की महत्वपूर्ण फसलों में है।
रोहतास आज भी आधिकारिक रूप से ‘Rice Bowl’ की पहचान रखता है।
सोन नहर प्रणाली आज भी कृषि के लिए महत्वपूर्ण आधार है।
सरकार धान के लिए MSP व्यवस्था बनाए हुए है।
कृषि अनुसंधान संस्थान नई किस्मों और नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं।

इसलिए अधिक सही बात यह है—

शाहाबाद का धान का कटोरा टूटा नहीं है; उसकी धार घिसी है।

और घिसे हुए कटोरे को फेंक देना समाधान नहीं।

उसे फिर से मजबूत करना होगा।

इसके लिए सोन की नहरों को पुनर्जीवित करना होगा।
खेतों में पानी का विवेकपूर्ण उपयोग करना होगा।
भूजल को बचाना होगा।
किसान को मशीन तक पहुँच देनी होगी।
MSP के साथ वास्तविक खरीद व्यवस्था मजबूत करनी होगी।
किसान को मूल्य-श्रृंखला में हिस्सेदार बनाना होगा।
स्थानीय बीजों का दस्तावेजीकरण करना होगा।
युवाओं को कृषि-उद्यम से जोड़ना होगा।
और धान से जुड़े गीतों, भोजन और ग्रामीण सामूहिकता को केवल अतीत की स्मृति नहीं बनने देना होगा।

सबसे जरूरी बात यह है कि शाहाबाद को केवल ‘धान पैदा करने वाला इलाका’ न समझा जाए।

उसे एक ‘कृषि-संस्कृति क्षेत्र’ के रूप में देखा जाए।

क्योंकि यहाँ धान केवल खेत में नहीं उगता।

वह किसान की अर्थव्यवस्था में उगता है।
वह गांव की स्मृति में उगता है।
वह लोकगीतों में उगता है।
वह भोजन में उगता है।
वह नदी और नहर के पानी में उगता है।
और वह उस भविष्य की संभावना में भी उगता है जिसमें आधुनिक विज्ञान और पुरानी कृषि-स्मृति एक-दूसरे की विरोधी नहीं, सहयोगी बन सकें।

इसलिए आज शाहाबाद के सामने असली प्रश्न यह नहीं है कि—

‘क्या धान का कटोरा समाप्त हो गया?’

असली प्रश्न है—

‘क्या हम समय रहते इस कटोरे को फिर से भरपूर, टिकाऊ और किसान-केंद्रित बना सकते हैं?’

उत्तर अभी भी संभव है।

क्योंकि कटोरा घिसा है—

टूटा नहीं है।

और किसी समाज की कृषि-बुद्धिमत्ता की असली परीक्षा यही है कि वह अपनी मिट्टी की पुरानी शक्ति को पहचानकर उसे नई परिस्थितियों के अनुरूप कितना नया जीवन दे सकता है।

— लक्ष्मीकांत मुकुल


___________


परिचय
लक्ष्मीकांत मुकुल 
जन्म – 08 जनवरी 1973
शिक्षा – विधि स्नातक 
किसान कवि। कवितायें एवं आलेख विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित । दो कविता संकलन “लाल चोंच वाले पंछी’’ व  "घिस रहा है धान का कटोरा" और ग्रामीण इतिहास पर केंद्रित पुस्तक "यात्रियों के नजरिए में शाहाबाद" प्रकाशित।

संपर्क :-
ग्राम – मैरा, पोस्ट – सैसड,
भाया – धनसोई ,
बक्सर,
(बिहार) – 802117
ईमेल – kvimukul12111@gmail.com
मोबाइल नंबर - 6202077236








लक्ष्मीकांत मुकुल के स्त्री विमर्श पर तीन गो कविता


लक्ष्मीकांत मुकुल के स्त्री विमर्श पर तीन गो कविता

01.

दू सखियन के बीच बचल जिनगी

आज बहुत बरिस बाद
दू गो बूढ़ देह एक-दूसरा के सामने बइठल बा—
जइसे दू पुरान कुआँ, जिनकर पानी सूख गइल होखे,
बाकिर पेंदी में देखाई देत होखे अबहियो आसमान

एक-दूसरा के चेहरा पढ़त 
आ झुर्री के भीतर से ऊ लड़की खोजत बाड़ी
जे नंगे पाँव पोखरा के मेड़ पर
दुपहरिया के धूप से आँख बचावत दौड़त रहे
ओकरा बाद बदलत गइल जिनगी
डोली, अनजान घर, चूल्हा, खेत, कर्ज,
बच्चन के बुखार, मरद के थकान,
आ सपना, जे रोज के रोटी से छोट पड़त गइल
फेरुओ कुछ बचल रहल—
नवका धान के गंध, सावन में भींजल देह,
केहू के चुपके से देखल चेहरा,
आ ऊ उम्मीद जे हर बेर मर के अगिला
 भोर में फेरु जनम लेत रहल

आज दुनो के घर भरल बा—
नाती-पोता, अनाज के बोरा, दीवाल पर 
टँगल पुरनका कैलेंडर;
बाकिर जे जिनगी जीए के चाहत रहलीं,
ओकरा खातिर समय कबो खाली ना मिलल
साँझ उतर रहल बा;
दुनो हँसत बाड़ी—
जइसे हँसी ना, अपना बीतल जिनगी के राख कुरेद के
ओह में अबहियो एगो छोट-सा अंगार बचवले बाड़ी


02.

पीठ पर पहाड़


पीठ पर घास के गट्ठर से कहीं भारी बा
ओकर पूरा घर
ऊ पहाड़ चढ़त नइखे,
रोज-रोज अपना जिनगी के ढलान से
ऊपर उठत बिया

रस्सी के निशान
कंधा पर नइखे भर—
समय ओकर देह पर आपन दस्तखत कइले बा
हथेली में दरांती बा
आँख में चूल्हा के धुआँ,
आ धुआँ के पार
बेटी के स्कूल जात देखे के सपना

जंगल ओकर खेत ह,
घास ओकर फसल,
पहाड़ ओकर बाजार
आ घर ओकर एकमात्र बैंक
शहर के लोग हरियर पहाड़ देखेला,
ऊ ओह हरियरी में
आपन पसीना देखत बिया
हवा ओकरा से पूछत नइखे
कब थकबू—
काहे कि पहाड़ जानेला
ई मेहरारू थाक के भी
घर पहुँचबे करी


03.


रोपनी के बीच औरतन के गीत


धान के पानी में धँसल गोड़ के साथ
 औरतन के भींज रहल बा बचपन

कवनो कहतिया—याद बा,
हमनी मेड़ पर दौड़त रहीं
आ हथेली में अमिया के खट्ट मिठास छुपा के राखत रहीं

दूसर के हँसी में अबहियो
ओह उमिर के चूड़ी खनकत बा,
जब सावन के रात देह पर गीत बन के उतर आवत रहे

अब जिनगी के चूल्हा, कर्जा आ अभाव
ओह गीत के बहुत कुछ निगल गइल बा,
तबो आँख के कोर में कुछ रउआ ना 
कहल सपना चमकत बा

पानी में झुकल धान के पौधा
जइसे बार-बार टूट के फेर हरियर होखे

ओह लोग के हथेली में माटी बा,
माटी में पसीना,
आ पसीना में पूरा घर के भविष्य

ओकरा गीतन में समाइल रहेली
चिरईं के चहचहाहट,
पानी के बहत धारा के सुर,
हवा के सरसराहट
माटी के सोंह महक,
बदरी से झरत फुहार,
जे आवेले पहाड़, जंगल से करत
भेंट - अंकवार

बात-बात में बिटिया के पढ़ाई आ जाड़ के चद्दर आवेला,
कवनो दूर के इच्छा चुपचाप मेड़ पर बैठल रहेला
गीत अचके में तेज हो जाला—
जइसे बरखा से पहिले खेत के भीतर
कोई अनदेखल नदी करवट ले रहल होखे।




संपर्क :-
ग्राम – मैरा, पोस्ट – सैसड,
भाया – धनसोई ,
बक्सर,
(बिहार) – 802117
ईमेल – kvimukul12111@gmail.com
मोबाइल नंबर - 6202077236






कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ_ लक्ष्मीकांत मुकुल

कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ _ लक्ष्मीकांत मुकुल सोन नदी बिहार की कृषि-अर्थव्यवस...