शुक्रवार, 22 मई 2026

ग्रामीण इतिहास लेखन : संभावनाएं और चुनौतियां- लक्ष्मीकांत मुकुल


ग्रामीण इतिहास लेखन : संभावनाएं और चुनौतियां
- लक्ष्मीकांत मुकुल
(कवि, लेखक, लोक इतिहास और ग्रामीण संस्कृति के अध्येता)

भारत की सभ्यता और संस्कृति की जड़ें गांवों में गहराई तक फैली हुई हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश है और उसकी आत्मा गांवों में बसती है—यह वाक्य न तो केवल एक राजनीतिक नारा है, न ही कोई भावुक अभिव्यक्ति; यह भारतीय समाज की संरचना और उसकी ऐतिहासिक यात्रा की गूढ़ सच्चाई है। बावजूद इसके, जब हम भारत के इतिहास की औपचारिक प्रस्तुति पर दृष्टिपात करते हैं, तो पाते हैं कि गांव, ग्राम्य संस्कृति और ग्रामीण जनजीवन लंबे समय तक इतिहास लेखन की मुख्यधारा से लगभग अनुपस्थित रहे हैं।

इतिहास की किताबों में युद्धों, राजाओं, साम्राज्यों, महलों, किलों और राजनयिक चतुराइयों की भरमार है, लेकिन कहीं उस किसान का जिक्र नहीं जो हर युग में देश की रोटी उगाता रहा, उस बुनकर का नहीं जिसने सदियों से गांव में करघे पर सभ्यता की पट कथा बुनी, उस स्त्री का नहीं जिसने चूल्हे की आग और खेत की मिट्टी के बीच अपनी आत्मा की तपिश से संस्कृति को सिंचित किया। ऐसे में आज जब इतिहास लेखन की परिपाटी में विविधता की मांग उठ रही है, तब ग्रामीण इतिहास लेखन न केवल एक विकल्प, बल्कि एक आवश्यक ऐतिहासिक दायित्व बन गया है।

ग्रामीण इतिहास को लेकर सबसे पहली चुनौती यही है कि उसका स्वरूप पारंपरिक इतिहास से भिन्न है। यह न तो केवल तिथियों और घटनाओं का सिलसिला है, न ही केवल सामरिक या राजनैतिक घटनाओं का संकलन। यह इतिहास लोक की चेतना, उनके जीवन-प्रसंग, रीति-नीति, परंपरा, संघर्ष, श्रम और सपनों का है। यहां राजा की जय-पराजय से ज़्यादा मायने उस बात का है कि गांव के तालाब क्यों सूख गए, किसानों ने किस फसल में विश्वास किया, किस जाति का व्यक्ति किस कुएँ से पानी भरता था, किस मौसम में किस देवी को पूजा गया, या किस कथा ने किस पीढ़ी को नैतिकता सिखाई।

ग्रामीण इतिहास लेखन की संभावनाएं बहुत व्यापक हैं। ग्रामीण जीवन विविधतापूर्ण है और उसकी प्रत्येक परत इतिहास के किसी अध्याय का संकेत देती है। गांव की बस्तियों की बनावट, जातीय संरचना, धार्मिक स्थल, उत्सव, बोली, कहावतें, गीत, कृषि प्रणाली, जल-स्रोत, पारंपरिक ज्ञान और इलाज की पद्धतियां—ये सब इतिहास की बहुमूल्य सामग्री हैं। गांवों में समय के साथ आए परिवर्तन—जैसे ज़मींदारी उन्मूलन, हरित क्रांति, भूमिहीन मजदूरी का विस्तार, या शिक्षा का प्रवेश—इन सबका विश्लेषण न केवल सामाजिक बदलावों को समझने में मदद करता है, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में विकास और असमानता की जटिलताओं को भी उजागर करता है।

ग्रामीण इतिहास लेखन के लिए स्रोतों की कोई कमी नहीं है, लेकिन वे पारंपरिक अभिलेखीय इतिहास से भिन्न रूप में उपस्थित हैं। गांवों में मौखिक परंपराएं जीवित हैं—लोकगीतों में, बिरहा, आल्हा, करमा, फाग जैसे गायन शैलियों में, गाथाओं में, लोक देवताओं की कथाओं में, त्योहारों के अनुष्ठानों में, शिलाओं पर खुदे कुछेक अक्षरों में या किसी मंदिर के पुजारी द्वारा संभाले गए पीढ़ियों पुराने खाते में। ब्रिटिश काल में गांवों को लेकर जो राजस्व अभिलेख बनाए गए थे, जिनमें मालगुजारी, भूमिकर, जनसंख्या, जातीय संरचना, भूमि की उर्वरता आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन है—वह भी ग्रामीण इतिहास का एक महत्वपूर्ण औपनिवेशिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

इतिहासकारों के सामने सबसे बड़ा दायित्व यह है कि वे इन स्रोतों को गंभीरता से लें, उनका व्यवस्थित अध्ययन करें और उनसे उस लोक की कहानी निकालें जो सदियों से मौन रहा है। ग्रामीण इतिहास लेखन में यह मौन ध्वनि सबसे महत्वपूर्ण है—यह केवल रेखांकनों में नहीं, बल्कि प्रतीकों और संकेतों में प्रकट होता है। उदाहरण के लिए, किसी गांव में एक विशेष देवी की पूजा क्यों होती है, क्यों कुछ जातियों को गांव के भीतर मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं रही, क्यों एक पीढ़ी विशेष ने गांव छोड़ कर शहर की ओर पलायन किया—इन प्रश्नों के उत्तर इतिहास में नहीं, उस लोक स्मृति में हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी एक-दूसरे को सुनाई जाती रही है।

मगर यह कार्य जितना जरूरी है, उतना ही कठिन भी। ग्रामीण इतिहास लेखन के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं। पहली चुनौती है — स्रोतों की प्रामाणिकता और वैज्ञानिक पद्धति की अनुपस्थिति। मौखिक परंपराएं समय के साथ बदलती हैं। वे स्मृति की उपज होती हैं, और स्मृति अक्सर चयन करती है, कल्पना जोड़ती है, या विस्मरण का शिकार हो जाती है। ऐसे में मौखिक स्रोतों की पड़ताल करते हुए उन्हें अन्य स्रोतों से मिलाकर देखना जरूरी हो जाता है।

दूसरी चुनौती है—इतिहासकारों की मनोवृत्ति। अधिकांश इतिहासकार शहरी पृष्ठभूमि से आते हैं और उनकी दृष्टि ग्राम्य जीवन को बेतुका या ‘पिछड़ा’ मानकर चलती है। उन्हें गांव का भूगोल, वहां की सामाजिक संरचना, बोलचाल की भाषा और संस्कृति से अपरिचित रहना पड़ता है, जिससे इतिहास लेखन में दूरी और अजनबीपन आ जाता है। केवल आंकड़ों से गांव नहीं समझे जा सकते; गांव को समझने के लिए वहां की मिट्टी से संवाद करना होता है।

तीसरी चुनौती है—राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व का हस्तक्षेप। ग्रामीण समाज सदियों से जाति आधारित असमानता, लिंग भेद, और आर्थिक शोषण का शिकार रहा है। ऐसे में इतिहास लेखन इन कड़वी सच्चाइयों से मुंह नहीं मोड़ सकता। मगर जब कोई इतिहासकार इन प्रश्नों को उठाता है, तो सामाजिक और राजनीतिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है। गांव में आज भी कई असमानताएं मौजूद हैं और उनका ऐतिहासिक मूल खोजने का प्रयास कई लोगों को असुविधाजनक लगता है।

इसके अतिरिक्त, ग्रामीण इतिहास लेखन के लिए संस्थागत समर्थन और प्रशिक्षण की भी कमी है। गांवों में कार्यरत शिक्षकों, लेखकों, शोधकर्ताओं को यदि ग्रामीण इतिहास संकलन के लिए प्रशिक्षित किया जाए, उन्हें साधन और प्रोत्साहन दिया जाए, तो यह लेखन एक आंदोलन का रूप ले सकता है। आज भी हजारों गांवों में ऐसी स्मृतियां, वस्तुएं, रीति-नीतियां मौजूद हैं जो किसी भी इतिहास संग्रहालय की शोभा बन सकती हैं।

यहां पर स्थानीय लेखकों, पत्रकारों और कवियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाती है। वे न केवल गांवों की सांसों को पहचानते हैं, बल्कि अपनी भाषा में उसे अभिव्यक्त भी कर सकते हैं। यह भाषा अक्सर अकादमिक भाषा नहीं होती—यह बोली, लोक, लय और भाव की भाषा होती है। यदि इस प्रकार के लेखन को स्थान मिले, तो वह इतिहास के शुष्क पृष्ठों में जीवन का रंग भर सकता है।

प्रश्न यह भी उठता है कि ग्रामीण इतिहास लेखन की दृष्टि कैसी होनी चाहिए? क्या वह केवल अतीत के गौरव का बखान करे? क्या केवल परंपराओं का उत्सव मनाए? नहीं। ग्रामीण इतिहास लेखन का उद्देश्य केवल अतीत की स्मृति नहीं, वर्तमान की समझ और भविष्य की दिशा तय करना होना चाहिए। गांवों में आई आर्थिक विषमता, खेती का संकट, पलायन की मजबूरी, शिक्षा और स्वास्थ्य की असमान पहुंच—इन सबकी जड़ें इतिहास में हैं। यदि हम अतीत को समझें, तो वर्तमान को बदलने की शक्ति हमारे पास आ सकती है।

विकास के नाम पर गांवों को शहरीकरण की ओर ढकेला जा रहा है। गांवों की आत्मनिर्भर व्यवस्था, जल-प्रबंधन प्रणाली, पारंपरिक कृषि, हस्तकला आदि। इस विनाश के विरुद्ध ग्रामीण इतिहास लेखन एक सांस्कृतिक प्रतिरोध बन सकता है। जब हम गांव के अतीत की सजीव तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, तो हम यह भी दिखाते हैं कि आधुनिकता का विकल्प केवल शहरीकरण नहीं, बल्कि ग्राम्य परंपरा और नवाचार का संयोजन भी हो सकता है।

आज तकनीक हमारे साथ है। गांवों की कहानियों को रिकॉर्ड करना, वीडियो साक्षात्कार लेना, स्थानीय वस्तुओं की तस्वीरें और वृत्तांत संजोना पहले से कहीं अधिक आसान है। यदि हर गांव में एक ‘लोक स्मृति कोष’ की परिकल्पना की जाए, जिसमें गांव की जन्मकथा, प्रमुख घटनाएं, लोक कथाएं, उत्सवों की परंपरा, पुराने नक्शे, वंशावलियां, लोकगीत आदि संग्रहीत किए जाएं, तो वह पूरे देश के लिए एक अनूठा इतिहास कोश बन सकता है।

ग्रामीण इतिहास की समझ को भूमंडलीकरण और ग्लोबल विलेज के प्रतिरोध में विकसित किया जा सकता है।भूमंडलीकरण ने दुनिया को एक ‘ग्लोबल विलेज’ में बदलने का सपना दिखाया है—जहाँ सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं, सांस्कृतिक भिन्नताएँ पिघल जाती हैं, और एक समान उपभोक्ता संस्कृति का वर्चस्व स्थापित होता है। लेकिन इस चमकदार वैश्विक परिदृश्य के भीतर एक गंभीर चिंता यह है कि यह प्रक्रिया स्थानीयता, विशेषतः ग्रामीण समाजों के इतिहास, स्मृति और आत्मा को विस्थापित करती जा रही है। ऐसे समय में ग्रामीण इतिहास की समझ केवल एक अकादमिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतिरोध का एक जरूरी औजार बन जाती है।

ग्रामीण इतिहास महज अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि वह स्मृतियों, परंपराओं, श्रम संस्कृति, भूमि से रिश्ते और सामूहिक जीवन की संरचना का जीवंत दस्तावेज होता है। यह इतिहास खेतों की मेड़ पर बोए गए अनुभवों, ऋतुचक्र के अनुसार चलने वाली जीवन-शैली, और लोक परंपराओं में रचे-बसे ज्ञान का रूप है। भूमंडलीकरण जब उपभोक्तावादी मानसिकता को थोपता है, तब यह इतिहास हमें यह याद दिलाता है कि मानव समाज केवल बाज़ार से नहीं चलता, बल्कि संबंधों, साझेदारी और आत्मनिर्भरता की नींव पर खड़ा होता है।

‘ग्लोबल विलेज’ का विचार सुनने में आकर्षक लगता है, किंतु इसके पीछे जो एकरूपता का दबाव है, वह विविधता की हत्या करता है। यह एक ऐसी दुनिया रचता है जिसमें लंदन, लखनऊ और लातेहार के बीच जीवनशैली में कोई खास फर्क न रह जाए। यह सोच ग्रामीण अनुभवों को ‘पिछड़ा’, ‘अप्रासंगिक’ या ‘आउटडेटेड’ मानती है। ऐसे में ग्रामीण इतिहास हमें यह बताता है कि वहाँ जीवन के अपने मूल्य हैं—सहजीविता, प्रकृति के साथ सामंजस्य, और सामूहिकता की भावना—जो आज के खंडित और तनावपूर्ण समाज में अधिक प्रासंगिक हो सकते हैं।

ग्रामीण इतिहास की समझ स्थानीय भाषाओं, लोक साहित्य, गीत, गाथाओं, पर्यावरणीय ज्ञान और परंपरागत कृषि पद्धतियों के संरक्षण से जुड़ी होती है। जब हम इस इतिहास को समझते हैं, तो हम केवल अतीत को नहीं पढ़ते, बल्कि वर्तमान के लिए विकल्प तलाशते हैं—ऐसे विकल्प जो भूमंडलीकरण के आर्थिक और सांस्कृतिक दबावों से इतर एक वैकल्पिक आधुनिकता की संभावना रचते हैं।

इसलिए आज ज़रूरत है कि हम गाँवों की मिट्टी से उठती स्मृतियों को नष्ट होने से पहले समेटें, उन्हें दस्तावेज़ करें, उनकी व्याख्या करें, और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुँचाएँ। ग्रामीण इतिहास न केवल हमारे सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा करता है, बल्कि वह उस वैश्विक दबाव के विरुद्ध एक जीवंत प्रतिरोध भी है जो हमें हमारी जड़ों से काट देना चाहता है। यह इतिहास हमें सिखाता है कि आधुनिकता और स्थानीयता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व की खोज के सहचर हो सकते हैं।

अंततः, ग्रामीण इतिहास लेखन का आशय केवल ‘इतिहास लिखना’ नहीं, बल्कि एक दृष्टि बनाना है—वह दृष्टि जो गांव को केवल ‘पिछड़ा’ या ‘विकासशील’ कह कर नहीं टालती, बल्कि उसे भारत के निर्माण की केंद्रीय इकाई मानकर उसके अनुभवों को इतिहास की मुख्यधारा में लाने का कार्य करती है। यह लेखन हमें याद दिलाता है कि खेतों में पसीना बहाता किसान भी उतना ही ऐतिहासिक पात्र है जितना कोई सम्राट; कि किसी गांव के पोखरे की खुदाई भी इतिहास है, उतनी ही जितनी किसी किले की नींव।

जब गांव का अतीत, उसकी स्मृति, उसकी पीड़ा, उसकी भाषा, उसकी आशा—इन सबको इतिहास की भाषा में स्थान मिलेगा, तभी भारत का इतिहास संपूर्ण और लोकतांत्रिक होगा। यही ग्रामीण इतिहास लेखन की सबसे बड़ी संभावना और सबसे बड़ा लक्ष्य है।

शाहाबाद में घिस रहा है धान का कटोरा_ लक्ष्मीकांत मुकुल


शाहाबाद में घिस रहा है धान का कटोरा
_ लक्ष्मीकांत मुकुल 

बिहार का पश्चिमी अंचल, जिसे ऐतिहासिक रूप से ‘शाहाबाद’ कहा जाता रहा है—आरा, बक्सर, सासाराम और भभुआ (अब कैमूर)—यह गंगा-सोन की दोआब में फैला हुआ एक समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से सजग भूभाग है। सदियों से यहाँ की माटी, यहाँ का पानी, और यहाँ का मानस, तीनों ने मिलकर इस क्षेत्र को धान की खेती का पर्याय बना दिया है। ‘धान का कटोरा’ जैसा विशेषण केवल उपज की मात्रा से नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतना और जीवंत कृषक सभ्यता की पहचान से जुड़ी होती है। परंतु आज जब हम शाहाबाद की ओर देखते हैं, तो यह कटोरा धीरे-धीरे घिसता दिखाई देता है—इसके किनारे चिटकने लगे हैं, पैंदा दरक रहा है, और इसमें कभी छलकती थी जो हरियाली, वह अब स्याह सन्नाटे में तब्दील हो रही है।

कहने का उद्देश्य यह है कि हम शाहाबाद के ‘धान के कटोरे’ की ऐतिहासिकता को समझें, उसकी सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक जमीन की पड़ताल करें, और उस संकट को चिन्हित करें जो आज इस पहचान को मद्धिम कर रहा है। यह केवल कृषि का संकट नहीं, एक संपूर्ण जीवन-व्यवस्था का संकट है, जो गांवों को शहरों में विस्थापित कर रहा है, और खेतों को परती में।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: जब शाहाबाद सचमुच धान का कटोरा था

शाहाबाद की भौगोलिक स्थिति उसे एक अद्वितीय कृषि क्षेत्र बनाती रही है। पूर्वी गंगा मैदान की उपजाऊ काली-बलुई दोमट माटी, साल भर की मध्यम वर्षा, और प्राचीन नहर व्यवस्था—ये सब मिलकर धान की अद्भुत पैदावार का आधार बने। यहां के किसान केवल उत्पादक नहीं, एक सांस्कृतिक इकाई भी थे। हर धान की किस्म का एक गीत था, हर बुवाई और कटाई का एक त्यौहार। 'कटाई के दिन' हो या ' नयका के माड़ - भात', चूड़ा दही’ उत्सव हो या ‘अन्नकूट’, धान केवल अन्न नहीं, एक सांस्कृतिक प्रतीक था।

ब्रिटिश काल में जब स्थायी बंदोबस्त लागू हुआ, तब भी शाहाबाद अपने किसानों की उत्पादन क्षमता के कारण अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में था। आरा, डुमरांव और सासाराम के जमींदारों ने हालांकि भूमि के स्वामित्व पर अधिकार जमाया, परंतु गांवों में कृषकों की आत्मनिर्भरता बनी रही। 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हरित क्रांति के असर से यह क्षेत्र थोड़ा वंचित रह गया, परंपरागत सिंचाई प्रणाली और स्थानीय बीजों के कारण यहां की खेती अपेक्षाकृत जैविक और टिकाऊ बनी रही।

वर्तमान संकट: धान की खेती क्यों संकट में है?

आज जब शाहाबाद के गांवों में धान की बात होती है, तो चेहरे पर गर्व नहीं, चिंता की रेखाएं दिखती हैं। किसानों की संख्या में गिरावट आई है, युवा पीढ़ी खेती छोड़ चुकी है, और जो बचे हैं वे लागत, जल संकट, श्रमिक अभाव और मंडी-व्यवस्था की दुरवस्था से जूझ रहे हैं। इन संकटों को विस्तार से समझना जरूरी है।

1. जल संकट और सिंचाई की गिरती व्यवस्था
शाहाबाद की नहरें, जो कभी बंगाल इंजीनियरिंग के गर्व की बात थीं, आज गाद और भ्रष्टाचार की शिकार हैं। सोन नहर परियोजना, जो कैमूर और सासाराम की जीवनरेखा थी, अब समय पर पानी नहीं देती। बोरिंग पर निर्भरता ने भूजल को खतरनाक स्तर तक गिरा दिया है। धान की जल-आधारित प्रकृति, अब खुद उसके अस्तित्व की शत्रु बन गई है।

2. श्रमिक संकट और प्रवास
धान की खेती श्रमसाध्य है। रोपनी, कटनी, दौनी—हर चरण में श्रमिक चाहिए। लेकिन शाहाबाद से लगातार मजदूरों का पलायन हो रहा है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और महाराष्ट्र की ओर गया यह प्रवासी श्रमिक वर्ग अब स्थानीय खेती के लिए अनुपलब्ध है। जिन गांवों में कभी चौपाल पर गंभीर से रोपनी की योजना बनती थी, अब वहां श्रमिक की खोज में किसान दर-दर भटकता है।

3. लागत और लाभ का असंतुलन
बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, मशीन—इन सबकी लागत लगातार बढ़ी है। परंतु समर्थन मूल्य या खुले बाजार में धान का मूल्य किसानों को लाभ नहीं दे रहा। परिणामस्वरूप, एक किसान साल भर की मेहनत के बाद कर्ज और हताशा का शिकार हो रहा है। सरकारी योजनाएं केवल कागजों में फलती-फूलती हैं, जमीनी स्तर पर उनके क्रियान्वयन में लापरवाही और भ्रष्टाचार आम बात है।

4. किस्मों और परंपरा का नाश
कभी शाहाबाद की माटी से गूंजती थी—सोनाचुर, सितवा धान, बासमती, पंकज, मंसूरिया, कनकजिर  , और कई स्थानीय किस्मों के नाम। आज ये किस्में विलुप्तप्राय हो गई हैं। संकर बीज और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाइब्रिड बीजों ने परंपरागत किस्मों की जगह ले ली है, जिनसे स्वाद, पोषण और सांस्कृतिक स्मृति—तीनों का ह्रास हुआ है।

सांस्कृतिक संकट: धान से कटती स्मृति

धान केवल भोजन नहीं, यह भाषा, गीत, राग, उत्सव और स्त्री चेतना का प्रतीक भी था। शाहाबाद की लोककथाओं में धान की बालियां विवाह के प्रतीक के रूप में आती हैं। बक्सर से कैमूर तक की स्त्रियाँ आज भी 'धान रोपनी' के समय ‘कजरी’ और ‘झूमर’ गाती थीं—जो एक ओर कृषि चेतना थी, दूसरी ओर सामूहिकता और स्त्री-शक्ति की कविता। परंतु अब ये गीत केवल सांस्कृतिक आयोजनों में, मंच पर गाए जा रहे हैं, खेतों से उनका रिश्ता टूट गया है।

ग्रामीण जीवन की जो छवि कभी धान की हरियाली से जुड़ी थी—बूढ़ी दादी की धूप में धान सुखाने की क्रिया, किशोरों का दौनी में बैल दौड़ाना, माई का तवे पर चिउड़ा सेंकना—वे सब अब स्मृति और उदासीनता के कोने में धकेल दिए गए हैं।

नीतिगत विफलताएँ और राजनीतिक उदासीनता

शाहाबाद जैसे क्षेत्र के कृषि संकट के पीछे एक बड़ी वजह नीतिगत असंगति और राजनीतिक उदासीनता है। कृषि को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाएं अक्सर एक 'सामान्यीकृत' दृष्टिकोण से बनाई जाती हैं, जिसमें क्षेत्रीय विशिष्टताएं, पारंपरिक कृषि विधियाँ और स्थानीय समाज की जरूरतें नजरअंदाज की जाती हैं।

शाहाबाद के लिए न सिंचाई की विशेष योजना बनी, न स्थानीय बीजों के संरक्षण की। मंडी व्यवस्था पूरी तरह नष्टप्राय है। किसान अपने धान को या तो औने-पौने बेचते हैं, या घर में रखकर खुद खाते हैं। इससे उत्पादकता और उत्साह दोनों पर असर पड़ा है।

संभावनाएँ और पुनरुत्थान की राह

यह सच है कि धान का कटोरा घिस रहा है, परंतु यह पूरी तरह टूटा नहीं है। अभी भी इस क्षेत्र में ऐसा समाजशास्त्रीय आधार है, जो कृषि की पुनर्संभावना को जन्म दे सकता है। इसके लिए कुछ ठोस कदमों की आवश्यकता है—

1. स्थानीय बीजों और जैविक खेती का पुनरुत्थान की नवयुगीन अपेक्षाओं की पहलकदमी करते हुए 
सरकार और गैर-सरकारी संगठनों को मिलकर शाहाबाद की परंपरागत किस्मों को पुनर्जीवित करना होगा। स्थानीय बीज बैंक बनाए जा सकते हैं। जैविक कृषि को बढ़ावा देना इस प्रक्रिया को सहारा देगा।


2. नहरों का पुनरुद्धार और जल-संरक्षण की महत्ता को स्वीकारते हुए सोन नहर जैसी ऐतिहासिक योजनाओं का कायाकल्प जरूरी है। जल-संरक्षण और सिंचाई की विकेंद्रीकृत योजनाएं जैसे जल- संग्रहण  या खेत-तालाब जैसे नए तरीके अपनाने होंगे।


3. कृषक सहकारिता और विपणन सशक्तिकरण की दिशा में कारगर पहल करते हुए किसानों को संगठित कर सहकारी मंडी व्यवस्था फिर से शुरू की जा सकती है। मूल्य निर्धारण और बिक्री में पारदर्शिता से लाभ मिलेगा।


4. लोक-संस्कृति से कृषि का पुनर्संवाद स्थापित करते हुए खेतों को फिर से लोकगीतों, स्त्री-उत्सवों और सामूहिकता से जोड़ा जाए। इसके लिए सांस्कृतिक संस्थानों को ग्रामीण स्तर पर सक्रिय करना होगा।


5. शिक्षा और कृषि के बीच संबंध बनाते हुए गांवों के स्कूलों में कृषि को पढ़ाया जाए, जिससे युवा पीढ़ी खेती को ‘बैकवर्ड’ नहीं, एक आधुनिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक कर्म के रूप में देख सके।



निष्कर्षत:, शाहाबाद का धान का कटोरा यदि घिस रहा है, तो इसके पीछे एक बहुस्तरीय संकट है—प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक। यह केवल खेती का संकट नहीं, एक पहचान का संकट है। अगर हम इसे केवल तकनीकी समस्या समझकर सुलझाना चाहेंगे, तो समाधान अधूरा रहेगा। हमें शाहाबाद को एक ‘कृषि-संस्कृति क्षेत्र’ के रूप में देखना होगा—जिसकी माटी में गीत हैं, जहां के खेतों में इतिहास है, और वहीं मानस में भविष्य की संभावनाएं भी हैं।

यह आलेख एक चेतावनी भी है और एक प्रस्ताव भी। यदि हम आज नहीं चेते, तो कल धान का यह कटोरा केवल एक मुहावरा बनकर रह जाएगा—एक ऐसा मुहावरा, जिसमें स्वाद नहीं, केवल विडंबना होगी।

लक्ष्मीकांत मुकुल का आत्मीय पत्र

आदरणीय श्री विजय कुमार तिवारी जी,
(भुवनेश्वर, उड़ीसा)

सादर प्रणाम!

आपको यह पत्र लिखते हुए मेरे मन में कई भावनाएँ एक साथ उमड़ रही हैं। बहुत दिनों से मन में यह इच्छा थी कि आपको अपने जीवन, अपने अनुभवों और अपने रचनात्मक संघर्ष के बारे में विस्तार से बताऊँ। मैं जानता हूँ कि पत्र लेखन अब धीरे-धीरे लुप्त होती परंपरा है। आज लोग छोटे-छोटे संदेशों में अपनी बात कह देते हैं, परंतु मुझे लगता है कि जीवन और साहित्य जैसे गहरे विषयों को केवल लंबी चिट्ठियों में ही व्यक्त किया जा सकता है। यह पत्र उसी परंपरा का एक हिस्सा है। मैं इसे आत्मकथात्मक रूप में लिख रहा हूँ ताकि आप मेरे जीवन की परतों को, मेरे कवि मन की हलचलों को और मेरे संघर्षों की यात्रा को नज़दीक से देख सकें।

मेरे जीवन में कविता का प्रवेश किसी नियोजित कार्यक्रम की तरह नहीं हुआ। यह उतना ही स्वाभाविक था, जितना कि धान की पौध का खेतों में हरियाना। परंतु इस स्वाभाविकता को जाग्रत करने वाला क्षण अचानक आया। एक दिन रेडियो पर समाचार सुनाई दिया कि हिंदी के महान कवि अज्ञेय का निधन हो गया है। उस समय मैं हैरान हुआ कि यह अज्ञेय कौन थे। मैंने उनसे पहले यह नाम कभी नहीं सुना था। अज्ञेय जैसे कवि का नाम मेरे लिए उतना ही अपरिचित था, जितना किसी अजनबी शहर का।

मेरी जिज्ञासा बढ़ी तो मैंने अपने हाई स्कूल के हिंदी शिक्षक से पूछा। उनका उत्तर सुनकर मैं अवाक रह गया। वे बोले कि "कवि नामक जीव सूर, तुलसी और कबीर के समय में हुआ करते थे। छायावाद तक कुछ कवि हुए, लेकिन अब तो कवि प्रजाति विलुप्त हो चुकी है।" उनका यह कथन मेरे लिए बिजली की तरह गिरा। मुझे लगा कि जैसे किसी ने मेरे भीतर की जिज्ञासा को पत्थर से कुचल दिया हो। परंतु एक तरफ़ निराशा के साथ-साथ मेरे भीतर यह सवाल भी उठ रहा था कि क्या सचमुच कवि अब इस धरती पर नहीं रहे? क्या कविता अब केवल इतिहास की वस्तु बन गई है?

तभी मेरी मुलाक़ात बीबीसी हिंदी सेवा से हुई। वहाँ पंकज सिंह की कविताएँ सुनने का अवसर मिला। उनकी आवाज़, उनके शब्द और उनकी संवेदना ने मुझे भीतर तक हिला दिया। तभी मेरे भीतर यह विश्वास जागा कि कवि अब भी जीवित हैं। कविता अब भी हमारे समय की साँसों में मौजूद है। कविता अब भी इस दुनिया की ज़रूरत है। यही क्षण था जब मैंने भी कवि बनने की इच्छा की। मुझे लगा कि यदि कवि नामक जीव अब भी इस धरती पर है, तो मैं भी उसका हिस्सा क्यों न बनूँ?

इस छोटे से अंकुरित उत्साह को आकार देने में बक्सर के कवि-पत्रकार शिशिर संतोष, रत्नेश और कुमार नयन का बड़ा सहयोग रहा। उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया, मेरी कविताएँ पढ़ीं और उनमें सुधार के सुझाव दिए। उनकी संगति ने मुझे यह सिखाया कि कविता केवल भावुकता का खेल नहीं होती। कविता लिखने के लिए गहरे जीवनानुभव, संवेदनशीलता और सतत श्रम की आवश्यकता होती है।

 तिवारी जी, मैं आपको अपने जीवन के बारे में विस्तार से बताना चाहता हूँ। मेरा जन्म 8 जनवरी 1973 को बिहार में रोहतास जिले के कोचानो (कंचन) के तटवर्ती मैरा गाँव में हुआ। गाँव का वातावरण मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। खेत-खलिहान, पशु-पक्षी, नदियाँ, वृक्ष और मिट्टी की सोंधी गंध मेरे बचपन से ही मेरे भीतर समाई रही। आज भी जब मैं लिखता हूँ, तो वही गंध मेरी कविताओं में उतर आती है।

गाँव के जीवन की गति अलग होती है। वहाँ जीवन शांति और गंभीरता से भरा होता है। महानगरों की तरह भागमभाग नहीं होती। परंतु इसका मतलब यह नहीं कि गाँव दुनिया के बदलावों से अछूते हैं। बाजारीकरण और उदारीकरण के प्रभाव से गाँव भी बदल रहे हैं। किसान समाज धीरे-धीरे टूटता जा रहा है। शासन की उदासीनता ने उनकी रीढ़ कमज़ोर कर दी है। यही टूटन मेरी कविताओं में बार-बार मुखर होती है।

आप भलीभाँति जानते हैं कि शाहाबाद का इलाका अन्न उत्पादन में प्रसिद्ध रहा है। यह क्षेत्र भरकी के नाम से जाना जाता है और इसकी कृषि परंपरा जीवंत रही है। परंतु आज वही क्षेत्र संकटग्रस्त है। किसान बेहाल हैं। यह पीड़ा मैं प्रतिदिन अपने आसपास देखता हूँ। इसी पीड़ा को मैंने अपनी कविताओं में दर्ज किया है।

मेरी पहली कविताएँ जमालपुर, मुंगेर से निकलने वाली ‘शब्द कारख़ाना’ पत्रिका में प्रकाशित हुईं। वह क्षण मेरे लिए उतना ही महत्वपूर्ण था जितना कि किसी किसान के लिए पहली बार खेत में अंकुर फूटना। इसके बाद मेरी कविताएँ ‘संभवा’, ‘दस्तावेज़’, ‘कथ्यरूप’, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, ‘परिचय’ और ‘युद्धरत आम आदमी’ जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं।

प्रगतिशील लेखक संघ की गतिविधियों में भागीदारी ने मेरी सोच को और धार दी। वहाँ मैंने जाना कि कविता केवल निजी भावुकता का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज और समय के सवालों से गहरे जुड़ी प्रक्रिया है। वहाँ मैंने सीखा कि कवि का कर्तव्य केवल सौंदर्य का गान करना नहीं है, बल्कि जनता के संघर्षों को आवाज़ देना भी है।

मेरे दो कविता संग्रह—‘लाल चोंच वाले पंछी’ और ‘घिस रहा है धान का कटोरा’—अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। इन संग्रहों में मैंने अपने अनुभवों, संघर्षों और आसपास के जीवन को दर्ज करने का प्रयास किया है। मेरी कविताओं में खेत-खलिहान की गंध है, किसानों की पीड़ा है और श्रम का सौंदर्य है। मैं अपनी कविताओं में कठिन प्रतीकों का सहारा नहीं लेता। मेरी भाषा वही है, जो गाँव-घर में बोली जाती है।

तिवारी जी, मुझे लगता है कि कविता की असली ताक़त उसकी सादगी और उसकी ईमानदारी में है। मेरे लिए कविता वह है, जो जीवन के सबसे सच्चे अनुभवों को अभिव्यक्त करे। जब मैं धान के खेत में खड़ा होता हूँ और देखता हूँ कि पौधे हवा के साथ झूम रहे हैं, तो मुझे लगता है कि यही कविता है। जब मैं देखता हूँ कि एक किसान अपने श्रम के बावजूद कर्ज़ के बोझ तले दबा है, तो मुझे लगता है कि यही कविता का विषय है।

हाल में मेरी पुस्तक ‘यात्रियों के नजरिये में शाहाबाद’ प्रकाशित हुई है। यह पुस्तक मेरे लिए केवल इतिहास का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि ग्रामीण चेतना की अभिव्यक्ति है। इसमें मैंने यह समझने की कोशिश की है कि जब बाहरी यात्री हमारे इलाके में आए, तो उन्होंने क्या देखा और कैसे लिखा। इस किताब में आपको इतिहास का प्रमाणिक आधार मिलेगा और साथ ही साहित्यिक आनंद भी।

वर्ष 2023 में मुझे अरुणाचल प्रदेश के नामसाई जाने का अवसर मिला। यह मेरी पहली हवाई यात्रा थी। पटना से दिल्ली और फिर डिब्रूगढ़ तक की यात्रा मेरे लिए रोमांचक अनुभव थी। असम के चाय बागान, गोल्डन पैगोडा की चमक, टंग टाओ रिसॉर्ट में भोज और सांगपो-खामती जनजातियों से हुई मुलाक़ात मेरे जीवन की स्मृतियों में दर्ज हैं। वहाँ नदी किनारे संगीत की गूँज और जनजातीय लोकगीतों का स्वर मुझे आज भी भीतर तक छूता है।

तिवारी जी, आपसे यह सब साझा करते हुए मुझे लगता है कि कविता का जीवन से कितना गहरा रिश्ता है। कविता केवल पन्नों पर लिखे शब्द नहीं है, वह हमारे जीवन का हिस्सा है। वह हमारे संघर्षों, हमारे सपनों और हमारी आशाओं का प्रतिबिंब है।

कहते हैं कि कवि को केवल एक चीज़ चाहिए—सब कुछ चाहिए। उसकी प्यास केवल उपलब्ध तक सीमित नहीं होती, बल्कि अनुपलब्ध और असंभव तक भी जाती है। इसलिए कवि स्वप्नशील होता है, क्योंकि स्वप्न ही वे पुल हैं जो वास्तविकता से उस अधूरे को जोड़ते हैं, जिसकी अनुपस्थिति मनुष्य की पूर्णता में कमी बनकर रह जाती है।
मैं मानता हूँ कि यह बात मेरे जीवन और मेरी कविता दोनों पर समान रूप से लागू होती है। मैं हर उस तत्व की तलाश में हूँ, जो मनुष्य को और अधिक मनुष्य बना सके—चाहे वह प्रेम की ऊष्मा हो, श्रम का सौंदर्य हो या प्रतिरोध की ज्वाला। मेरे लिए कविता इन्हीं की सतत खोज है—एक ऐसी यात्रा, जिसमें जो नहीं है उसे संभव करना ही काव्य की सच्ची सार्थकता है।

मैं मानता हूँ कि मेरे भीतर गहरे अंतर्विरोध हैं। एक तरफ मैं किसान हूँ, जो रोज़ खेतों में श्रम करता है। दूसरी तरफ कवि हूँ, जो शब्दों के जरिए उसी श्रम की व्याख्या करता है। कभी-कभी यह द्वंद्व मुझे उलझाता है, लेकिन यही द्वंद्व मेरी रचनात्मकता का स्रोत भी है।

 तिवारी जी, यह पत्र मैं केवल अपने जीवन का परिचय देने के लिए नहीं लिख रहा हूँ। यह पत्र मेरे लिए आत्मीय संवाद का अवसर है। मैं चाहता हूँ कि आप मेरी कविताओं को केवल शब्दों में न देखें, बल्कि उन्हें उस मिट्टी की गंध के साथ महसूस करें, जहाँ से वे निकली हैं। वहाँ आपको धान की पौध की हरियाली मिलेगी, खेतिहर समाज की पीड़ा मिलेगी, श्रम का पसीना मिलेगा और जीवन का असली रंग मिलेगा।

मैं यह भी चाहता हूँ कि आप मुझे अपने सुझावों और मार्गदर्शन से समृद्ध करें। आपकी प्रेरणा मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं होगी।
आशा है कि आप सुखद और खुशहाल होंगे।

आपका ही_
लक्ष्मीकांत मुकुल
मैरा गाँव, रोहतास, बिहार
(किसान कवि / मौन प्रतिरोध का कवि)

दिनांक_  आश्विन मास,कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि ,विक्रम संवत 2082/तदनुसार_ 15 सितंबर,2025 ईस्वी.

भोजपुरी क्षेत्र के पशुचारणों का अनूठा उत्सव: पिड़िया पर्व


भोजपुरी क्षेत्र के पशुचारणों का अनूठा  उत्सव: पिड़िया पर्व
_ लक्ष्मीकांत मुकुल 

भोजपुरी लोक भूमि-कस्बा- गांव के उन लोकपर्वों में से एक  पर्व, शरद ऋतु के दौरान मनाया जाने वाला एक गंभीर और महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त महत्व नहीं मिला है, लेकिन ग्रामीण जीवन की जड़ों-अनुरूप, सामाजिक प्रतिबद्धताओं और प्रतीकात्मकतावाद से समृद्ध है, वह है “पिड़िया पर्व” (जिसे कभी-कभी रुद्रव्रत के नाम से भी जाना जाता है) – विशेषकर भोजपुरी-भाषी क्षेत्र में। इस आलेख में हम इस पर्व को पूरे गहराई से देखना चाहिए — इसके इतिहास, प्रतीक-चिह्न, सामाजिक-आर्थिक पक्ष, ग्रामीण जीवनकालीन अर्थ और समकालीन चुनौतियों सहित — क्योंकि यह सिर्फ एक लोक-व्रत नहीं, बल्कि ग्रामीण संस्कृति, भाई-बहन के सम्बन्ध, पशुचारण-परंपराओं और स्थानीयता की प्रतिबद्धता का संगम है। जैसा कि मैंने पूर्व में लिखा है, मेरी रूचि ग्रामीण एवं कृषि-संबंधी जीवन की पड़ताल में है, और पिड़िया पर्व इसी दिशा में एक विशेष खिड़की खोलता है।


---

१. पिड़िया पर्व: मूल स्वरूप एवं भौगोलिक प्रसार

भोजपुरी क्षेत्र अर्थात् बिहार-झारखंड-उत्तर प्रदेश के कुछ खण्डों में, पशुपालक-पशुचारक और धान-धान्य-मूल गाँव-कस्बाओं में इस पर्व का प्रचलन मिलता है। एक लोकप्रिय व्याख्या यह है कि यह पर्व मूलतः उन बहनों द्वारा आरंभ होता है जिनके भाई पशुचारण या कृषि-परिहार से जुड़े हों — उनकी सलामती व दीर्घायु के लिये बहन द्वारा विशेष व्रत-पूजा कर “पिड़िया” लगाई जाती है।
दीपावली के बाद एकम या दूज की सुबह को "गोधन कुटाई"  का पर्व, जिसे भाई दूज या गोधन के नाम से भी जाना जाता है, बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में मनाया जाने वाला एक अनोखा और पारंपरिक त्योहार है। यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम और त्याग का प्रतीक है। इस दौरान बहनें अपने भाइयों के दीर्घायु और मंगल की कामना के लिए उन्हें तरह-तरह की "बद्दुआ" देती हैं, जिसमें अपनी जीभ में कांटे चुभोना, गोबर से बने गोधन को कूटने से पहले भाइयों को कोसना आदि शामिल है। इसी के साथ इस व्रत की शुरुआत होती है गोवर्धन पूजा के दिन से, उस दिन पशुपालक-गाय, भैंस इत्यादि के परिहार-पूजा के बाद घर की दीवार पर गोबर से छोटे-छोटे गोल पिंड चिपकाये जाते हैं और गीत, जागरण चलती है। इस प्रकार यह पर्व पारंपरिक कृषि-पशु-मिलन, पशुचारण-सम्बन्धी जीवनशैली, बहन-भाई के सामाजिक सम्बन्ध और लोक-कलात्मक अभिव्यक्ति का संयोजन बन जाता है।
इसमें व्रत रखने वाली लड़की के जितने भाई होते हैं उसी संख्या के अनुसार प्रति भाई 16 धान से चावल निकलाकर वो सोरहिया निगलती है। व्रत के बाद पिड़िया को सुबह तालाब या नदी में पारम्परिक गीतों के साथ विसर्जित करती हैं।” 

इस प्रकार, पर्व का भौगोलिक प्रसार मुख्यतः भोजपुरी-भाषी ग्रामीण इलाकों तक सीमित दिखता है, और इसमें पशुचारण-जीवनशैली का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समावेश है — अर्थात् पशुओं की देखभाल, चारा-धान, पशुधन-संधारण, आदि। इसलिए इसे “पशुचारणों का अनूठा पर्व” कहना उचित है।


---

२. उद्देश्य, प्रतीक एवं सामाजिक अर्थ

पिड़िया पर्व का प्रमुख उद्देश्य है बहन द्वारा अपने भाइयों के प्रति प्रेम, सुरक्षा-कामना और सामाजिक कर्तव्य का निर्वहन। बहनें पारंपरिक रूप से अपने भाइयों के स्वास्थ्य, दीर्घायु और भलाई के लिए इस व्रत को ग्रहण करती हैं। इस प्रकार, यह पर्व भाई-बहन के रिश्ते को एक सामुदायिक-लोक-आधारित अर्थ देता है।

प्रतीकात्मकता की दृष्टि से देखे तो, यह पर्व निम्नलिखित रूपों में समृद्ध है:

गोबर-पिंड (पिड़िया): दीवार पर गोबर से छोटे-छोटे पिंड बनाना, यह न केवल एक लोक-कलात्मक अभ्यास है बल्कि यह प्रतीक है ग्रामीण जीवन-पृष्ठभूमि, गौ-पालन-पशु-चारा-प्रक्रिया का। गोबर यहाँ एक प्राकृतिक स्रोत है, पशु-चारा-उत्पादन-दृष्टि से महत्वपूर्ण तत्व।

  रात जग्गा (रात्रि जागरण-गीत): बहनें रात भर जागकर लोकगीत गाती हैं—यह सांस्कृतिक प्राणीकरण है, जहाँ सामाजिक संयोजन, जुड़ाव और सांगीतिक-स्थानीय स्मृति-स्थापन होता है।

भाई की संख्या के अनुसार धान-संख्या: व्रत रखने वाली बहन अपने भाइयों की संख्या के अनुसार प्रति भाई 16 धान से चावल निकालती है और “सोरहिया” में निगलती है। यह क्रिया न केवल संख्या-मापक प्रतीक है बल्कि धान-धान्य-धान-मूल्य के ग्रामीण अर्थों को भी उद्घाटित करती है। 

विसर्जन (नदी/तालाब में पिड़िया) : पर्व के समापन पर पिड़िया को जल में विसर्जित करना, यह ज्ञान-संबंधी प्रतीक है—जल बहाव, प्रकृति-प्रवाह, लोक-अनुष्ठान और जीवन-चक्र का स्मरण।

दीवार-चित्रकला (पिड़िया चित्रकला): गोबर-पिंडों पर चित्रण, प्राकृतिक रंगों से स्थानीय आकृतियों (सूर्य, चंद्र, पक्षी, मछली) को अंकित करना—यह लोक-कलात्मक परंपरा है जो ग्रामीण जीवन, प्रकृति-संवेदना और सांस्कृतिक-विरासत को समाहित करती है।


इस तरह, यह पर्व ग्रामीण-सामुदायिक जीवन की लोक-संस्कृति, सामाजिक-बंधुत्व, कृषि-पशुपालन-व्यवस्था, लोक-कलाओं और स्थानीय पर्यावरण-प्रकृति के बीच एक जाल बनाता है।


---

३. प्रक्रिया-वृत्तांत: आरंभ से समापन

पिड़िया पर्व की प्रक्रिया ग्रामीण लोकजीवन के चक्र को प्रतिबिंबित करती है। इसे मैं क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत कर रहा हूँ — ध्यान दें कि विविध जगहों में स्थानीय भिन्नताएँ होती हैं।

1. आरंभ – गोवर्धन पूजा के दिन
पर्व की शुरुआत होती है गोवर्धन पूजा के दिन — इस दिन गाय-भैंस-पशु आदि का परिहार-पूजा होती है। उसके बाद बहनें घर की दीवार को साफ करती हैं, गोबर का लेप लगाती हैं और गोबर से छोटे-छोटे गोल-पिंड (पिड़िया) तैयार करती हैं। घर की दीवार पर गोबर से छोटे-छोटे पिंडों का आकार बनाया जाता है।


2. रात जग्गा और लोकगीत
पिड़िया-पिंड बन जाने के बाद बहनें रातभर जागती हैं, लोकगीत गाती हैं, पूजा करती हैं। इस दौरान, लड़कियां रात भर जागकर पीड़िया के लोकगीत गाती हैं और पूजा करती हैं और गीत गाती हैं _

पुरब जइह भइया पछिम जइह, पछिम जइह, 
ले अइह ए भइया घिवही लडूइया। 
ले अइह ए भइया बाँस क चेंगोलिया, 
घिवही लहुई मँहग भइले बहिनी, 
छोड़ि द ना ए बहिनी पिंड़िया बरतिया। छोड़ि द.... 
बाँस क चैंगोलिया मंहग भइले बहिनी,
 छोड़ि द ना ए बहिनी पिंड़िया बरतिया। 
कइसे मों छोड़ि भइया पिंड़िया बरतिया, 
तोहरे बधइया भइया पिंड़िया बरतिया।


ये रात जग्गा गीत न सिर्फ धार्मिक आचरण है बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक मिलन-स्थल भी है — बहनें, उसी गाँव-परिवार की बुजुर्ग महिलाएँ, गीतकार तथा अन्य महिलाएँ मिलकर इस क्रिया को पूर्ण करती हैं। एक ऐसा ही गीत इस तरह है _

 लावे के लवलीं पिंड़ियवा राम, छोड़ावे का बेरिया 
ससुर पापी भेजे ले नियरवा हो राम, छोड़ावे का बेरिया 
बाबा मोरा धरेलनि नियरवा हो राम, छोड़ावे का बेरिया
 मोई मोरी साजेली झंपोलिया हो राम, छोड़ावे का बेरिया भउजी मोरी लावेली खोंइछवा हो राम, छोड़ावे का बेरिया सँइया लेके अइले डोली बँसवा हो राम, छोड़ावे का बेरिया भइया मोरा लवेलें ओहरवा हो राम, छोड़ावे का बेरिया


3. सुबह स्नान-कथा-भोजन
अगली सुबह व्रत-धारी बहन स्नान करती है, उसके बाद घर की बुजुर्ग महिला से पिड़िया की कथा सुनती है। व्रत के दौरान, सुबह उठकर स्नान के बाद घर की बुजुर्ग महिला से पीड़िया की कथा सुनी जाती है, और कथा सुने बिना भोजन नहीं किया जाता है। जिसको। छोटकी और बड़की कहनी कहा जाता है। इस कथा-पठन का अर्थ है लोक-स्मृति-संचालन — वह कथा जिसमें पिड़िया-व्रत की उत्पत्ति, लोककथाएँ, और सामाजिक-पात्रों (बहन-भाई-पशुचारक) का अनुभव समाहित रहता होगा।


4. रस्म — सोरहिया व रसियाव
अगले चरण में व्रत की अवधि रहती है — बहनें नए चावल और गुड़ से बनी खीर (जिसे ‘रसियाव’ कहा जाता है) बनाती हैं। इस दिन नए चावल और गुड़ से बनी खीर (जिसे रसियाव कहते हैं) खाई जाती है।
साथ ही, खास बात ये है कि धान की संख्या भाईयों की संख्या के अनुसार होती है... प्रति भाई 16 धान से चावल निकलाकर वो सोरहिया निगलती है। यह राशि-प्रदान-प्रतीक है जो भाई-बहन के पारस्परिक संबंध को दृढ़ करता है।


5. समापन – अगहन शुक्ल प्रतिपदा व विसर्जन
व्रत का समापन होता है अगहन शुक्ल प्रतिपदा को, और उस दिन बहनें पिड़िया को नदी/तालाब/पोखरे में पारम्परिक गीतों के साथ विसर्जित करती हैं। व्रत समाप्त होने के बाद, दीवारों पर बनी पिड़िया को नदी में बहा दिया जाता है। 
इस तरह, एक लोक-अनुष्ठान चक्र पूरा होता है — आरंभ में गोवर्धन पूजा, मध्य में जागरण-कथा-भोजन, अंत में विसर्जन-उत्सव।


४. पिड़िया चित्रकला: लोक-कला, प्रतीक और संकट

पिड़िया चित्रकला इस पर्व का एक अत्यंत रोचक आयाम है, क्योंकि यह ग्रामीण लोकशिल्प-परंपरा, स्थानीय रंग-प्रक्रिया, सामाजिक प्रतीक और संवेदनशील पर्यावरण-संकेत का एक संयुक्त रूप है।

प्रक्रिया एवं सामग्री

दीवार को पहले गोबर के लेप से साफ किया जाता है। गोबर से छोटे-छोटे गोल पिण्ड (पिड़िया) बनाकर दीवार पर चिपकाये जाते हैं।

  एक माह चलते हुए इस उत्सव पर्व के समापन की पूर्व संध्या पर  पिड़िया गीत गाते हुए "पिड़िया लेखन" चित्रकला में पृष्ठभूमि के लिये हरे रंग का उपयोग होता है—यह हरे रंग ­सेम की पत्ती से बना प्रतीत होता है। चित्रण के लिये सफेद रंग (चावल के पेस्ट से) या सिंदूर का रंग लिया जाता है।आकृतियों को बनाने में बांस की कूंची (ब्रश) का प्रयोग होता है।

आकृति-विषय के रूप में पाए जाते हैं: सूर्य, चंद्रमा, तारे, बिच्छू, साँप, झाड़ू, फूल, डोली, जांता, ढेका, मछली आदि। हरे रंग की पृष्ठभूमि पर सफेद या सिंदूर के रंग से चित्रण किया जाता है। चित्रण के चारों ओर बॉर्डर-रेखा खींची जाती है।


प्रतीकात्मक पठन

यह लोक-कलात्मक प्रक्रिया दर्शाती है कि कैसे ग्रामीण जीवन की बुनियाद—धान, पशु-चारा, प्राकृतिक रंग-संसाधन, लोक-सुरक्षा-प्रतीक—चित्रित होती है।

हरा पृष्ठभूमि = जीवंत कृषि-भूमि, चारा-घास, वन-पथ।

गोबर-पिंड = पशु-उत्पादन-चक्र, गौ-गौ-पालन, चारा-उपलब्धि।

सूर्य-चंद्र, तारे = समय-चक्र, प्रकृति-चक्र, कृषि-रहना।

साँप, बिच्छू आदि = ग्रामीण पर्यावरण-जरा, खेत-पड़ौस-वन-प्राणी।

बिच्छू-झाड़ू-मछली = लोक-जीवन के अनुभव, आर्थिक-उपजीविका-प्रतीक।


संरक्षण-चुनौतियाँ

आजकल इस चित्रकला की निरंतरता चुनौतियों के सामने है। पुरानी सामग्री (गोबर, प्राकृतिक रंग) की जगह प्लास्टिक-कलर या अशुद्ध सामग्री आ रही है। युवाओं में लोक-कलाओं के प्रति रुचि कम होती जा रही है, शहरीकरण-प्रवासन का प्रभाव। कथाएँ,  रात्रि जागरण गीत, व्रत-प्रक्रिया का मौखिक-परंपरागत हिस्सा लुप्त हो रहा है। कृषि-पशु-चारण-जीवनशैली में बदलाव का असर, जिससे इस तरह के पर्व-उत्सव का अर्थ बदल रहा है।
इसलिए, लोक-कला के इस रूप को सिर्फ एक साज-सज्जा नहीं बल्कि सामाजिक-स्मृति-भंडार के रूप में देखा जाना चाहिए — और इस पर शोध, संरक्षण-प्रयास जरूरी हैं।




५. सामाजिक-आर्थिक व पशुचारण-स्बन्धी आयाम

पिड़िया पर्व में पशुचारण-और-धान्य-संबंधी सामाजिक-आर्थिक संरचना भी झलकती है। ग्रामीण इलाकों में जहाँ कृषि-पशुचारा एक सहायक उपजीविका है, वहाँ इस पर्व की श्रृंखला निम्नलिखित तरह से अर्थवर्धक हो जाती है_

पशु-चारा-धारण एवं पशु-उत्पादन: गोबर-चारा, गोधन-पशु, गौ-पालन आदि भी इस पर्व द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से स्मरण किये जाते हैं। गोबर जहाँ पशु-उत्पादन का उपउत्पाद है, वहीं उससे दीवार-लेप और पिड़िया-निर्माण में प्रयोग होना सामाजिक-सहायता का संकेत है।

धान्य-प्रतीक एवं आर्थिक संबन्ध: धान की संख्या (प्रति भाई 16 धान) जैसी प्रथा यह दिखाती है कि धान-उत्पादन-मूल ग्रामीण अर्थ में यह पर्व समाहित है। भूख-अन्न-धान्य-बहन-भाई-संबंध का एक छंद-रूप ले लेता है।

बहन-भाई सामाजिक-भूमिका: बहन-व्रती की भूमिका घर-परिवार-समुदाय को सक्रिय करती है। भाई-बहन में सामाजिक कर्तव्य-भावना-प्रतिबद्धता का आदान-प्रदान होता है, जो ग्रामीण जीवन में सहयोग-सहभागिता का आधार है।

लोक-मिलन-सामूहिकता: रात-जागर, गीत-वाचन, कथाएँ, विसर्जन-समूह ये सब सामाजिक-मिलन के अवसर बनते हैं। ऐसा अवसर देता है कि बहन-बहन, भाई-भाई, बुजुर्ग-नवयुवक, गाँव-समुदाय मिलें, साझा-संवेदना उत्पन्न हो।

स्थानीय पर्यावरण-संकल्प: गोबर-पिंड बनाना, प्राकृतिक रंगों का प्रयोग, जल-विसर्जन आदि तत्व प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग-सावधानी की ओर संकेत देते हैं। इस प्रकार, यह पर्व स्थानीय पर्यावरण-स्मृति को जागृत करता है।


इस तरह, पिड़िया पर्व सिर्फ धार्मिक-सोशल उत्सव नहीं, बल्कि ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक जीवन-प्रवाह में अंतर्निहित प्रतीकात्मक “संकेत-तंत्र” है, जिसे समझना साहित्य, समाजविज्ञान और लोकवादी -आधारित आलोचना की दृष्टि से बेहद समृद्ध अनुभव देता है।


---

६. लोककायत दृष्टिकोण से विश्लेषण: प्रतिबद्धता, स्थानीयता एवं परिवर्तन

आपकी रुचि अनुरूप, मैं यहाँ इस पर्व को लोकवादी साहित्य-सामाजिक विश्लेषण की दृष्टि से देखना चाहूंगा — विशेषकर “स्थानीयता” की प्रतिबद्धता, ग्रामीण जीवन की शोषण-संरचनाएँ, उत्पादन-संबंध और सांस्कृतिक प्रतिरोध-संकेत के सन्दर्भ में।

उत्पादन-संबंध एवं सामाजिक प्रतिबद्धता

जन-गण-मन  की दृष्टि में, सामाजिक धर्म, व्रत-अनुष्ठान और लोक-उत्सव–ये विनष्ट नहीं होते, बल्कि उत्पादन-संबंध, परिहार-पशु-चारा-धान्य-प्लस सामाजिक साझेदारी का हिस्सा होते हैं। पिड़िया पर्व में देखा जा सकता है कि बहन-भाई, पशु-चारा-उत्पादन-धान्य-उपजीविका सभी एक स्थानीय उत्पादन-चक्र को दर्शाते हैं।

– भैंस-गौ-पालन, गोबर-उपज, चारा-प्रबंधन जैसी युवा-पशु-उत्पादन प्रक्रिया इस पर्व में प्रतीकात्मक रूप से शामिल है।
– बहन-व्रती अपनी भूमिका-कर्तव्य निभाती है जो पारंपरिक सामाजिक समेकन की प्रक्रिया है।
– धान-संख्याएँ (प्रति भाई 16 धान) इस बात का संकेत करती हैं कि किस प्रकार स्थानीय धान्य-उत्पादन-मॉडल के अंदर सामाजिक-रिश्ते भी स्थापित होते हैं।

ऐसे में, यह पर्व ग्रामीण “उपजीविका” और सामाजिक-संरचना के बीच एक प्रत्यक्ष संवाद प्रस्तुत करता है। आधुनिक दृष्टिकोण से इस पर्व की की महत्ता को समझने का अवसर मिलता है कि इस प्रक्रिया में कौन-कौन संबंध अनुकरणीय  हैं? उत्पादन-उपज और सामाजिक प्रतिपादन में किस प्रकार का विभाजन है? बहन-व्रती-प्रथा कितनी सार्थक है और इसमें कितनी “परम्परागत सामाजिक प्रबंधन” की अभिव्यक्ति होती है?

स्थानीयता की समझ और सांस्कृतिक प्रतिरोध

स्थानीयता इस अर्थ में कि यह पर्व अपने-अपने गाँव-परिसर, लोक-कलाओं, गाय-भैंस-चारा-जीवन, लोकगीतों और लोकश्रुतियों से गाँठ-बत्ध है। यह ग्लोबलाईजेशन-उद्योग-मानकीकरण की चुनौतियों के सामने एक सांस्कृतिक प्रतिरोध-स्थान का काम कर सकता है।

– पिड़िया चित्रकला, ग्रामीण दीवार-सजावट, गोबर-पिंड बनाना — ये तत्व आधुनिक प्लास्टिक-कलर-प्रिंट-साज-सज्जा की जगह एक लोक-सेंसिबिलिटी स्थापित करते हैं।
– जागरण-लोकगीत-कथा-व्रत-विसर्जन का क्रम सामूहिक-स्मृति-निर्माण है — यह सिर्फ उपभोक्तावादी-तैयारी नहीं, बल्कि सहयोग-साझेदारी-प्रकाशन प्रक्रिया है।
– इस तरह यह पर्व स्थानीय प्रतिरोध-रूप में—जहाँ बाहरी-मानकीकरण, उपभोक्तावाद और शहरीकरण का दबाव है—अपनी सांस्कृतिक-सततता और सामाजिक- जातीबद्धता का मापदंड हो सकता है।

परिवर्तन-दबाव एवं शोषण-संकेत

हालाँकि, किसी भी लोक-उत्सव में शोषण-रूपक संकेत भी छिपे होते हैं — उदाहरणस्वरूप:

बहन-व्रती की unpaid श्रम-भूमिका, जो सामाजिक-बंधुत्व को निभाती है लेकिन आर्थिक रूप से मापित नहीं होती।

पशु-चारा-उपजीविका बदलती जा रही है — बड़ी मोटरयुक्त फार्मिंग, पशु उत्पादन के औद्योगीकरण, चारा-उत्पादन-विभाजन में बदलाव। इस बदलती संरचना में पिड़िया-जैसे लोक-उत्सव अपनी जगह खो सकते हैं।

लोक-कलाओं का व्यावसायीकरण या अधूरा संरक्षण — चित्रकला-पिंड बनाना-गायन-गीत औद्योगिक लोक-उत्पादन में बदल सकते हैं, असली सामाजिक-सहभागिता कमजोर हो सकती है।


आधुनिक विश्लेषण की दृष्टि से यह पर्व हमें याद दिलाता है कि स्थानीय सामाजिक-संरचनाओं में केवल उत्सव या संस्कृति नहीं बल्कि प्रतिद्वंद्वित उत्पादन-संबंध, सामाजिक-बंधुत्व और सांस्कृतिक प्रतिरोध का मिश्रण मौजूद है। और यदि इस पर्व को सिर्फ “रुचि-विषय” के रूप में छोड़ दिया जाए, तो इस समाज-कलात्मक प्रकरण की गहराई खो सकती है।


---

७. विशेष अध्ययन: पशुचारण-परंपरा, बहन-भाई और स्थानीय समय-चक्र

इस खंड में मैं विशेष रूप से उस पक्ष पर गौर करूँगा जहाँ पिड़िया पर्व पशुचारण-परंपरा तथा स्थानीय समय-चक्र के साथ जुड़ता है — इसे “पशुचारणों का अनूठा पर्व” कहने का कारण यही है।

ग्रामीण भोजपुरी क्षेत्र में पशुपालन-पशुचारण (गाय, भैंस, भेड़-बकरी, और अन्य चारागाह-पशु) एक बहुत पुरानी उपजीविका रही है। इसके विभिन्न आयाम हैं:

पशुओं को चराने, चारा जुटाने, गोबर-उपज सुनिश्चित करने, पशु-स्वास्थ्य बनाए रखने जैसे काम।

गोबर का उपयोग — खेत में उर्वरक के रूप में, मटियार में, घर की दीवार-लेप में, आदि।

पशुओं के आर्थिक मूल्य (दूध-दही, गोबर-उर्वरक, पशु-प्रजनन) तथा सामाजिक-संस्कृति में उनकी भूमिका (गौ-पूजा, गोशाला-परंपरा, आदि)।


पिड़िया पर्व इस क्षितिज पर निम्नलिखित रूप से खड़ा होता है:

– यह पर्व गोवर्धन पूजा से शुरू होता है — अर्थात् पशु-पालन-व्यवस्था के प्रति श्रद्धा, संरक्षण की भावना के साथ।
– दीवार-पर गोबर-पिंड चिपकाना सीधे उस पर्यावरण-चक्र की ओर संकेत करता है जिसमें पशु-उत्पादन-उपज-चारा-प्रबंधन शामिल है।
– बहन-भाई की संख्या-अनुसार धान-सोरहिया-प्रथा एक कृषि-धान्य-सम्बन्धित मूल्यांकन-प्रक्रिया है — पशु-चारा-उपजीविका के सहायक-भूत कृषि-व्यवस्था का संकेत।
– विसर्जन-क्रिया (जल में पिड़िया बहाना) पशु-चारण-भूमि-पास के जल-प्रवाह, तालाब-नदी-चराई-क्षेत्र जैसे स्थानीय पारिस्थितिकी-चक्र को स्मरित करती है।
– तथा लोकगीत-जागर, व्रत-अनुष्ठान, चित्रकला — ये सामाजिक रूप से मिलन-कार्य हैं, जो कि पशु-चारण-समुदाय की सामूहिक-स्मृति को पुष्ट करते हैं।

इन सबकी वजह से, इस पर्व को “पशुचारणों का अनूठा पर्व” कहना व्यर्थ नहीं है: यह ग्रामीण पशु-चारा-उपजीविका, बहन-भाई सामाजिक अनुबंध, लोक-कलात्मक प्रतीक और स्थानीय-समय-चक्र का समन्वय है।


---

८. समकालीन चुनौतियाँ, संरक्षण-संभावनाएँ और निरंतरता

जब हम आज-कल के समय में पिड़िया पर्व की बात करते हैं, तब हमें यह समझना होगा कि बदलती ग्रामीण-परिस्थितियों, कृषि-पशु-उत्पादन-मॉडल, शहरीकरण, प्रवासन-प्रभाव, और लोक-संस्कृति-उपभोग की प्रवृत्तियों ने इस लोक-पर्व की निरंतरता पर असर डाला है।

चुनौतियाँ

ग्रामीण-युवाओं का शहरीकरण, कृषि-पशु-उपजीविका से हटना। जब पशु-चारा-प्रक्रिया कमजोर होगी, गोबर-उपज कम होगी, तो पिड़िया-प्रथा की सामर्थ्य घटेगी।

लोक-कला-चित्रकला-गीत-जागर का उपभोग-उन्मुख हो जाना। जब लोक-गीत सिर्फ वीडियो-उत्पादन या मनोरंजन-उद्देश्य बन जाएँ, सामुदायिक-सहभागिता टूटती है।

पर्यावरण-परिस्थितियों में बदलाव — चराई-भूमि-संकीर्णता, जल-स्रोत-सूखापन, आदि। ये पिड़िया-विसर्जन-क्रिया और पशु-चारा-परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं।

पारंपरिक सामग्री (गोबर, प्राकृतिक रंग) की जगह आधुनिक-समग्री का आगमन — जिससे लोक-शिल्प-तत्व अपनी अर्थ-सूचना खो सकते हैं।

आर्थिक-प्रेरणा की कमी — यदि यह पर्व सामाजिक-अनुष्ठान-भूमिका से सामाजिक-उत्सव-परिवर्तन में चला जाए, तो मूल-उद्देश्य कम हो सकता है।


संरक्षण-संभावनाएँ

इस पर्व को स्थानीय-संगठन, सांस्कृतिक संस्थानों द्वारा दस्तावेजित करना; लोक-गीत-कथा-चित्रकला की रिकॉर्डिंग।

ग्रामीण महिलाओं-बहनों को प्रशिक्षण-कार्यशाला देना कि वे पिड़िया-चित्रकला, व्रत-प्रथा को आगे बढ़ाएँ।

इस पर्व को स्कूल-गाँव-समुदाय के पाठ-चर्या में सम्मिलित करना; स्थानीय-इतिहास-स्मृति-परिप्रेक्ष्य से पाठ्य-सामग्री बनाना।

पर्यटन-सहायता-उद्यम के रूप में इस लोक-उत्सव को ग्रामीण-पर्यटन-मॉडल में शामिल करना — लेकिन इस तरह कि इसके धार्मिक-सामाजिक अर्थ विकृत न हों।

हस्तशिल्प-उत्पादन (पिड़िया-चित्रकला वाली दीवार-सजावट) को स्थानीय आर्थिक-उत्पादन-मॉडल में बदलना — जैसे वृत्तिशुल्क-उद्योग-मॉडल के रूप में।

मीडिया-सहायता से स्थानीय-उत्सव को डिजिटल-आधार पर प्रसारित करना, लोक-गीत-व्रत-कथा का संग्रह तैयार करना।


निरंतरता का चिन्ह

यदि इस लोक-उत्सव को सिर्फ “पुरानी प्रथा” मानकर छोड़ दिया जाए, तो यह लुप्त हो सकती है। इसीलिए जरूरत है इसको समय-अनुकूल बनाकर, लेकिन मूल प्रवाह को न खोते हुए। बहन-भाई की सामाजिक-भावना, लोक-संगीत, चित्रकला, पशु-चारा-उपजीविका से जुड़ाव — इन सभी का निरंतर होना आवश्यक है।


---

९. निष्कर्ष

जब हम इस पूरे विषय पर पुनर्विचार करते हैं, तो यह स्पष्ट है कि पिड़िया पर्व केवल एक व्रत-उत्सव नहीं बल्कि भोजपुरी-ग्रामीण जीवन की स्थानीयता, प्रतिबद्धता और सामाजिक-स्मृति का एक अद्भुत पैकेज है। इसमें शामिल हैं — खेती-धान्य-पशु-चारा-संरचना, बहन-भाई का पारस्परिक सामाजिक अनुबंध, लोक-गीत-जागर-कथा-चित्रकला जैसे सांस्कृतिक-उपक्रम, और अंततः प्रकृति-साहित्य-लोक-जीवन का समन्वय।

समकाल की दृष्टि से देखें तो यह पर्व ग्रामीण उत्पादन-संबंधों, सामाजिक साझेदारी-संरचनाओं और सांस्कृतिक प्रतिरोध-संकेत का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है। वहीं स्थानीयता के संदर्भ में यह पर्व उन हिस्सों को उजागर करता है जहाँ जल-चराई-पशु-चारा-धान्य-लोक-शिल्प एक दूसरे से जड़े हैं।

हाल में आज की चुनौतियाँ — शहरीकरण, उपभोग-प्रवृत्ति, कृषि-पशु-व्यवसाय-मॉडल में बदलाव — इस पर्व की निरंतरता के लिए खतरा हैं। लेकिन यदि हमारी प्राथमिकता यही हो कि हम “स्थानीयता का इतिहास लेखन में प्रतिबद्धता” की बात करें, तो पिड़िया पर्व एक अमूल्य स्रोत है। इसे सिर्फ यादगार-उत्सव के रूप में नहीं समझना चाहिए, बल्कि सामाजिक-सहभागिता, लोक-जीवन-अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक-विरासत के दृष्टिकोण से गंभीरता से अध्ययन-संरक्षित करना चाहिए।



संदर्भ सूची_

1. भोजपुरी लोक संस्कृति और परंपराएं, भुनेश्वर भास्कर
2. जोहार भोजपुरिया माटी, व्रत कथा विशेषांक, कनक किशोर
3. भोजपुरी लोक संस्कृति, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय
4. भोजपुरी बाल गीत: एक सांस्कृतिक मूल्यांकन, डॉ. स्वर्ण लता 
5. विनीता भास्कर के रेखांकित पिड़िया चित्रकला का नमूना।

महेंद्र मिश्र के गीतों में प्रेम - बोध


महेंद्र मिश्र के गीतों में प्रेम - बोध

_लक्ष्मीकांत मुकुल

महेंद्र मिश्र भोजपुरी के एक महान कवि, धाकड़ संगीतकार और देश प्रेमी थे। भोजपुरी साहित्य की अनमोल धरोहर के रूप में जहां उनके रचना- संसार को रखा जाता है, वहीं लोग उनको लोक कर्मी, लोक कलाकार और पूर्वी सम्राट के रूप में भी जानते हैं। वे जिंदगी भर दरबारी समाज से जुड़े रहने के बावजूद सामंती विचारों और दरबारीपना से अपने को अलग रखे। वे मूलत: लोक संस्कृति और लोक राग से संप्रिक्त एक संस्कारी भक्ति कवि थे, जो राम भक्ति परंपरा और कृष्ण भक्ति परंपरा के साथ-साथ प्रकृति प्रेम, सामाजिक लगाव और श्रृंगारिक विषयों से जुड़े विषयों को अपने गीतों में संजोने - संवारने का काम किया। अगर भक्ति काव्य धारा और रीतिकाव्य धारा की कसौटी पर उनकी पूरी रचनाधर्मिता को परखा जाए, तो यह देखने को मिलता है कि भक्ति रस में डूबे और रीतिमुक्त कविता की धारा के एक सफल कवि के रूप में वे सामने आते हैं । प्रेम- बोध महेंद्र मिश्र की कविताओं का केंद्र बिंदु रहा है, जिसके चतुर्दिक उनकी पूरी रचनाधर्मिता की चौहद्दी  दिखाई देती है। महेंद्र मिश्र सात्विक प्रेम के अनुरागी थे। दैहिक प्रेम, आर्थिक प्रेम और लोभालाभ के प्रेम की झलक उनकी कविताओं में नहीं मिलती। वे हृदय से भक्ति के रस में डूबे एक रस प्रेमी कवि थे। उनका रचना-जगत सतरंगा है। वह प्रेम बोध की दिल की गहराई में उतरकर अपने गीतों में अनेक अर्थ छटा और भाव भूमियों के तरल छूवन से गुड़ की रसधार में डूबे लोकमन को रस विभोर करते रसराग से संचित अपनी पूरबीतान के गीतों के बगीचे को खड़ा किए हैं। उनका प्रेम स्वर का विस्तार मनुष्यता की पक्ष में रहा है। उन्होंने प्रकृति, जीवन जगत, समाज और राष्ट्र आदि सबके साथ प्रेम करने के अपने संदेशों को गीतों के माध्यम से व्यक्त किया है।

 छपरा, बिहार के मिश्रवालिया गांव में जन्में महेंद्र मिश्र की जीवन लीला पर आधारित भोजपुरी में दो उपन्यास प्रकाशित हैं_ पांडेय कपिल द्वारा लिखित "फुलसुंघी" और रामनाथ पांडेय द्वारा रचित "महेंदर मिसिर", जिसमें उनका छपरा की नर्तकी ढेला बाई के साथ प्रेम प्रसंग की चर्चा खूब हुई है। ढेलाबाई वैसे तो एक वैश्या थी,  जिसके कारण लोक समाज उसे अच्छी निगाहों से नहीं देखते थे। परंतु ढेलाबाई हों या कुंवर सिंह के जमाने में आरा की धर्मन बीवी हों, इन लोगों का पेशा नाच- गान और मनोरंजन ही था, लेकिन सही मायने में वे अदब और तमीज़ सिखाने वाली सामाजिक शिक्षिका थीं। हमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह महेंद्र मिश्र की प्रेमिका भी थी। लेकिन उन दोनों में शारीरिक लगाव न होकर आत्मिक लगाव - खिंचाव था_ प्लूटोनिक लव। इस प्रेम संबंध का उनकी रचनाओं और जीवन गतिविधियों पर भरपूर असर पड़ा, जिसका प्रभाव उनकी उनके गीतों में बखूबी झलकता है।

महेंद्र मिश्र का रचना संसार वैसे गीत और कवितायें विविध शैलियों से भरी पड़ा है, परंतु उनकी मुख्य पहचान बनी पूर्वी तान से। पूर्वी बिरह गीतों को कहा जाता है, जिसमें वियोग पक्ष की प्रधानता होती है। भोजपुरी क्षेत्र में पलायन की संस्कृति के गर्भ से उपजे दुख- संताप, राज विराग से लबरेज़ भोजपुरी माटी के लोकमन के सहज भावात्मक अभिव्यक्ति के रूप में पूर्वी राग को गाने वाले गवैया और सुनने वाले श्रोताओं की आत्मा को झकझोर देता है। कवि अपनी स्व पीड़ा को जन पीड़ा के साथ जोड़ता हुआ मिथकों का भी सहारा लेता है, जैसे पुराण कथा में कृष्ण नंदगांव से मथुरा चले गए हैं। अब तक वे नहीं लौटे। कोई लौटने की कोई उम्मीद भी नहीं है। उनके संदेश को लेकर उद्धव जी गोपियों के गांव आए हुए हैं। बुद्धि ज्ञान और तर्क के बल पर समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि जिंदगी चलायमान है। जो जाता है, वह लौटकर नहीं आता। उनकी बातों को सुनकर गोपियों उनसे झगड़ पड़ती है। ज्ञान पक्ष का पंखा प्रेम की आंधी के सामने कहां तक टिक सकता है। प्रेम- बोध की अविरल रसधार इस तरह उनकी गीत में फूटती है_

मधुबनवाँ से मोर कान्हा अइहे कि दू ना।
साँवली सुरतिया फेर देखइहे कि दू ना।
हँसी-अँसी कान्हा मोरा जिया के लोभवलें,
मोरा अंगना में बंसिया बजइहें कि दू ना।
ऊधो जी सनेश लाए बूढ़ा बाभना,
ई त जरिए के खेलारी हउएँ दाढ़ीजार ना।
कूबरी के जोग, भोग हमनी के बतावे,
इ त पोथी ले के आइल बारें उफर परना।
हमनी जो जनितीं मोहन कूबरी से राजी,
हमहूँ कूबर बनइतीं फँसइती मोहना।
कहत महेन्द्र सुनी ल ऊधो बाभना,
इहाँ रोम-रोम बसल बारें कृष्ण सजनाँ।



मां का प्रेम दुनिया का सबसे गंभीर प्रेम कहा जाता है। अपनी संतान की देह पर धूल न लगे, कोई कांट कुश न चुभे, इसकी सबसे ज्यादा चिंता मां को ही होती है। लड़का  कितना ही बड़ा हो जाए, लेकिन मां की नजर में अभी वह बच्चा ही बना रहता है। राम वन को जा रहे हैं पत्नी और भाई के साथ। कौशल्या मां की जिंदगी में वज्र का पहाड़ टूट गिरा है। जो कुछ नहीं सोची थी, वह सब कुछ हो रहा है। जंगल- झाड़- पहाड़ - खाई को पार करते हुए राम कैसे होंगे? कौशल्या मां की दुख भरी कहानी को महेंद्र मिश्र ने अपने  गीत के धागे में पिरोकर  मां के पुत्र वियोग वर्णन में प्रेम के आत्मिक रूप को उभरा है_

भोरहीं के भूखे होइहें चलत पग दूखे होइहें
प्यासे मुख सूखे होइहें जागे मगु रात के।
सूर्य के किरिन लागी लाल कुम्हिलाये होइहें
कंठै लपटाय झंगा फाटे होइहें रात के।
आली अब भई साँझ होइहें कवनो बन माँझ
 सोये होइहें छवना बेबिछवना बिनु पात के।
महेन्द्र पुकारे बार-बार कौशल्या जी कहे
ऐसे सुत त्यागी काहे ना फाटे करेजा मात के।

नायक- नायिका के प्रेम संबंध पर महेंद्र मिश्र के गीत  बहुत ही अद्भुत, मनभावन और प्रेम की गुडही जलेबी की तरह रसदार हैं। उनके गीतों की गठरी में संयोग सुख के हास - विलास, केलि - कलाप और सम्मोहन- उद्दीपन के भाव तो हैं ही, परंतु छिछोरापन की भनक तक नहीं है। उनके गीतों में वसंत ऋतु के आम की मोजर और महुआ के कोचियाए कली की महक है। वहीं उनके गीत की हरेक पंक्ति,हरेक शब्दों, हरेक भाव, हरेक बोध, हरेक क्रियापदों में रसकत्ता भीनी हुई है। कहा जा सकता है कि महेंद्र मिश्र की गीत- माला खिलखिलाते फूलों, मधु छत्ता की झोंझ, महकती गंध, सरसरती हवा और छरछराते मेघ बूंदों के सहमेल ध्वनिरागों के धागे से गूंथी हैं। वे प्रेमिका के रूप में मुग्धा, मध्या, परकीया, गणिका के रूप में नहीं स्वीकारते थे और न तो अपनी को प्रोषित नायक, वचन चतुर नायक या क्रिया चतुर नायक के रूप में  मानते थे। वह अपने साथी से हृदय के स्तर पर प्रेम के आकांक्षी थे। वैसा प्रेम जो मर्यादा की सीमा में रहे और हृदय की गहराई से किया जाए। उनके एक पूर्वी गीत में इसका अनूठा उदाहरण मिलता है_

चढली जवनिया के विरहिनिया ए हरी।
हरि हो केकरा से कहीं दिल के बतिया ए रही।
जाए के त गइलें पतियों ना भेजे ए रही।
हरि हो तोहरा बिनु लागे नाहीं जियरा ए रही।
साँवरी सुरतिया जियरा साले ए हरी।
हरि हो अदो-बदो बथेला कपारवा ए रही।
होत मिनुसाहारा बोले चुहचुहिया ए हरी।
हरि हो हनी-हनी मारेली कटरिया ए हरी।
द्विज महेन्द्र गावे ई कजरिया ए हरी।
हरि हो रोजे-रोजे जोहीं तोरी बटिया ए रही।


पलायन संस्कृति भोजपुरी समाज का एक पुराना क्रियाकलाप है, जो सदियों से चला रहा है। रोजी- रोजगार की तलाश में पहले लोग कोलकाता या रंगून कमाने जाते थे। फिरंगियों की जाल में फंसकर गिरमिटिया मजदूर बनकर मॉरीशस - फिजी सरीखे टापुओं में भी गए। यह सिलसिला आज भी चलता रहता है। पुरुष बाहर की दुनिया में कमाने के लिए जाता है और उसकी औरत घर ही में रह जाती है, जिसकी जिंदगी में बस पति के वापस लौट आने का इंतजार ही होता है। हर आहट पर इंतजार, हर झांकी में आने का इंतजार और मिलने का सपना_

पिया मोरा गइलें रामा पूरबी बनिजिया से दे के गइलें ना।
एगो सुगना खेलवना रामा से दे के गइलें ना।
उड़ल-उड़ल सुगना गइलें कलकतवा कि जाई के बइठे ना।
ओही सामी जी के पगिया रामा से जाई के बइठे ना।
पगड़ी उतारी सामी जांघे बइठवलें से कहऽ सुगना ना।
मोरा धनी के कुसलिया से कहऽ सुगना ना।
माई कइली कूटनी बहिनिया कइली पीसनी कि जइया कइली ना।
तोहरो दउरी-दोकनिया से जइया कइली ना।
कहत महेन्दर पिया भइलऽ कलकतिया से भूलिए गइलेऽ ना।
आपना जइया के सुरतिया रामा भूलिए गइले ना।



महेंद्र मिश्र की कविता और गीत में प्रेम बोध केवल मनुष्य भर के लिए नहीं है, बल्कि उनके प्रेम- विस्तार का माया मोह जल- जंगल- जमीन, पेड़- पौधे और पशु - पक्षी तक फैला हुआ है-- चर से लेकर अचर तक! प्रेम भाव का यही उनका लगाव उन्हें लोक से जोड़ता है। लोक से जुड़ने के चलते लोकगीतों की तरह आम जनता में उनका पूर्वी तान मशहूर हुआ। जिसमें भोजपुरी क्षेत्र की मिट्टी की महक के साथ-साथ मिट्टी की मूरतों के मिलन- बिछड़न की टीस लोककंठ में टांसी की तरह फूटते हैं। वृक्ष- प्रेम से जुड़ा उनका यह गीत प्रेम की छुअन अनुभूति को हृदय स्पर्शी रूप में व्यक्त किया है, जिसे अंतर्तम से महसूस किया जा सकता है_

हे कचनार कदंब अनार रसाल तमाल गुलाल सुपारी।
अमला अमरूध के चूत सभे ओलतान वितान झुके सभ डारी।
जामुन कईत करील तुहूँ कदलीफल श्रीफल ऊँच निहारी।
द्विज दास महेन्द्र से साँची कहऽ कहीं देखे हो तू मिथिलेश कुमारी।


महेंद्र मिश्र के जीवन का  सबल पक्ष उनका देश प्रेमी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी होना है। अंग्रेजी सत्ता के आर्थिक पक्ष को कमजोर करने के लिए उन्होंने नोट छापने का भी काम किया, जिसके माध्यम से वे देशभक्तों की मदद किया करते थे। काफी मात्रा में नोट छापने के कारण तत्कालीन सरकार ने सीआईडी इस्पेक्टर गोपीचंद को इसके जांच के काम में लगाया गया। गोपीचंद उनके यहां नौकर बनकर रहने लगा और अंत में बहुत बड़ी छापेमारी कराई। पुलिस ने महेंद्र मिश्र को गिरफ्तार कर लिया। जेल से उनको छुड़वाने के लिए कहा जाता है कि कोलकाता, बनारस की नर्तकियों ने बहुत ही आर्थिक मदद की थी और और छपरा की ढेला बाई ने तो अपने सारे गहने बेंच डाले थे। बक्सर सेंट्रल जेल का जेलर भी उनसे बहुत प्रभावित हुआ था। वह उसकी बेटी को संगीत सीखने लगे थे, जिसके कारण सरकार से अनुरोध करके, उनके कुशल आचरण को दिखाते हुए कुछ साल की सजा कम कराई थी।
   गोपीचंद उनके यहां नौकर बनकर जब रह रहा था, तो वह भी उनकी कविताओं से प्रभावित होकर तुकबंदियां करने लगा था।  पुलिस ने महेंद्र मिश्र को हथकड़ी पहनाई, तो तब कहते है कि उलाहना देते हुए महेंद्र मिश्र और गोपीचंद के बीच काव्यात्मक संवाद भी हुआ था_

पाकल पाकल पानवा खिअवले गोपीचनवा पिरितिया लगा के ना, हंसी हंसी पानवा खिअवले गोपीचानवा पिरितिया लगा के ना… मोहे भेजले जेहलखानवा रे पिरितिया लगा के ना…
=====================
नोटवा जे छापि छपि गिनिया भजवलs ए महेन्दर मिसिर ब्रिटिस के कईलs हलकान ए महेन्दर मिसिर सगरे जहानवा मे कईले बाडs नाम ए महेन्दर मिसिर पड़ल बा पुलिसिया से काम ए महेन्दर मिसिर



पूर्वी गायन परंपरा की शुरुआत करने वाले महेंद्र मिश्र प्रेम की पीड़ा और प्रेम में मुक्ति पाने की ख्यालों के अनमोल गीतकार थे।  वे हारमोनियम, तबला, झाल, पखाऊज, मृदंग और बांसुरी बजाने की कला में माहिर थे। उनका ठुमरी, टप्पा, ग़ज़ल, कजरी खेमटा जैसी गायन शैली और शास्त्रीय संगीत की विभिन्न विधियों पर मुकम्मल अधिकार प्राप्त था। उनके गीतों में वियोग के भाव जहां सशक्तता के साथ उभरे हैं, वहीं रूमानियत का गहरा असर भी उनकी रचनाओं में सर्वत्र फैला दिखाई देता है। वे कई ग्रंथों के रचयिता भी थे।  अपूर्व रामायण के अलावे महेंद्र मंजरी, महेंद्र प्रभाकर, महेंद्र विनोद, महेंद्र मयंक, महेंद्र रत्नावली, महेंद्र कवितावली, कृष्ण गीतावली, भीष्म प्रतिज्ञा,  महेंद्र चंद्रिका नाम से लिखित और गीतों को  संयोजित किए गए उनके गौरव ग्रंथ भोजपुरी साहित्य की नींव की पत्थर की तरह मजबूत हैं।
ढेला बाई से उनका प्रेम सत्विक था। लोकमत के अनुसार ढेला बाई मुजफ्फरपुर की एक नृत्यांगना की कमसिन बेटी थी, जिसका महेंद्र मिश्र ने अपने दोस्त रॉबर्ट्सगंज के जमींदार हनुमंत सहाय के लिए अपहरण किया था। परंतु इस घटना की टीस और पश्चाताप उन्हें जीवन भर रहा और कठिन समय में भी वे  बाई को मदद करते रहे। लोग तो यह भी कहते हैं कि ढेला बाई की गोद में ही उन्होंने बयासी वर्ष की अवस्था में सन 1946  में अपनी अंतिम सांस ली।

अंत में, महेंद्र मिश्र के गीतों में प्रेम- बोध की ऊंचाई को उनके इस गीत के माध्यम से समझा जा सकता है_

पानी भरे जात रहीं पकवा इनारवा
बनवारी हो लागि गइलें ठग बटवार।
बहियाँ ममोरे मोरा अंगिया निहारे
बनवारी हो तूड़ देलें मोतियन के हार।
गोर लागी पइयाँ परी नटवर कन्हइया
बनवारी हो बिसरल सुधिया हमार
कहत महेन्दर हम रहब एही ठइयाँ
बनवारी हो अब ना जाएब पकवा इनार।

बक्सर जिले की सांस्कृतिक परंपरा


बक्सर जिले की सांस्कृतिक परंपरा 
_ लक्ष्मीकांत मुकुल 
(कवि, लेखक, लोक इतिहास और ग्रामीण संस्कृति के अध्येता)


बक्सर जिला बिहार राज्य के पश्चिमी छोर पर स्थित एक ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध भू-खंड है। यह जिला जहाँ एक ओर गंगा और कर्मनाशा नदियों की उपजाऊ घाटी में बसा है, वहीं दूसरी ओर यह वैदिक, रामायणीय, सूफी-भक्ति और स्वतंत्रता संग्राम के विविध रंगों से रंजित है। बक्सर की सांस्कृतिक परंपरा न तो केवल मंदिरों, मेले-ठेलों और त्योहारों तक सीमित है, और न ही यह एकसांगी धार्मिक प्रतीकों की सीमाओं में बंधी है। यहाँ का लोक जीवन, बोल-चाल, परिधान, खान-पान, पारंपरिक खेती, रहन-सहन, आस्था और साझी सांझ में सहेजी गई हिन्दू-मुस्लिम विरासत – सब मिलकर इसे एक विशेष सांस्कृतिक भूगोल प्रदान करते हैं। आधुनिकता, पलायन और शहरीकरण की लहर ने इस सांस्कृतिक संरचना को चुनौती दी है, लेकिन उसके भीतर भी एक स्थायित्व की चेतना जीवित है।

1. परंपरागत जीवनशैली और स्थानीय भाषिक-सांस्कृतिक ढांचा

बक्सर की ग्रामीण बसावट आज भी पारंपरिक संरचना में ढली हुई है। हाल तक मिट्टी के घर, खपड़ैल की छतें, आँगन में तुलसी का चौरा, मवेशियों के लिए गोशाला, खलिहान, और खेतों से लगे हुए जलाशय – यह सब मिलकर गाँव की जीवन रेखा बनाते रहे हैं। समाज जातीय संरचना पर आधारित अवश्य है, किंतु कृषक, दस्तकार, चरवाहे, बुनकर, ब्राह्मण, पटेल, फकीर और नाई – सब अपने-अपने सांस्कृतिक कार्य-व्यापार में संलग्न रहते हुए पारस्परिक निर्भरता का हिस्सा बने रहते हैं।

भाषा के स्तर पर यहाँ भोजपुरी बोली की प्रमुखता है, जिसका स्वरूप बक्सर में अपेक्षाकृत कोमल, परिमार्जित और संस्कृतनिष्ठ माना जाता है। यह भोजपुरी न केवल संवाद का माध्यम है, बल्कि लोक साहित्य, कहावत, गीत और किस्सों की जीवंत भूमि भी है। यही भाषा शादी-ब्याह, त्योहारों और मृत्यु-क्रियाओं तक में एक सामाजिक अनुशासन के रूप में जीवित रहती है।

2. आस्था, विश्वास और धार्मिक परंपराएँ

बक्सर की धार्मिक चेतना में दो समानांतर धाराएँ प्रवाहित होती हैं – एक पौराणिक-धार्मिक और दूसरी लोक-धार्मिक। धार्मिकता यहाँ किसी औपचारिक पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है; यह जीवन का एक सहज रूप है।

पौराणिक दृष्टि से बक्सर वह भूमि है जहाँ विश्वामित्र का यज्ञ हुआ, जहाँ राम ने ताड़का वध किया, जहाँ अहिल्या का उद्धार हुआ और जहाँ शिशुपाल का जन्म हुआ। रामायण और महाभारत की घटनाओं से जुड़ा हुआ यह भूगोल आस्थावान हिन्दुओं के लिए अत्यंत पवित्र है। पंचकोशी यात्रा इसका मूर्त रूप है, जिसमें हजारों लोग प्रतिवर्ष एक निश्चित परिक्रमा करते हैं। यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था है, बल्कि सामाजिक समागम, लोक सांस्कृतिक आदान-प्रदान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का उत्सव भी है।

बक्सर में रामेश्वरनाथ, सोमेश्वरनाथ, अहिल्या स्थान, विश्वामित्र आश्रम, ब्रह्मेश्वर स्थान जैसे अनेक स्थल धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित हैं, जहाँ न केवल बिहार बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड से भी लोग दर्शन-पूजन के लिए आते हैं।

लोक-धार्मिक आस्था में देवी-देवताओं से अधिक महत्त्व पीपल, नीम, नागदेवता, जल, अग्नि और तुलसी को प्राप्त है। 'नाग पंचमी', 'जिउतिया', 'पीड़िया', 'करमा', 'छठ' आदि व्रत-पर्वों में स्त्रियाँ और पुरुष पारंपरिक विधियों से प्रकृति और पूर्वजों की आराधना करते हैं। इन आयोजनों में सामूहिकता, कर्तव्य और श्रद्धा की त्रयी जीवंत रहती है।

3. मुस्लिम सांस्कृतिक संदर्भ और साझी विरासत

बक्सर की सांस्कृतिक विरासत का एक अद्भुत और दुर्लभ पक्ष इसका मुस्लिम सामाजिक संदर्भ है, जो परंपरागत हिन्दू रीति-रिवाजों के साथ अंतर्ग्रथित है। बक्सर जिले में कुछ ऐसी मुस्लिम जातियाँ और समुदाय आज भी मौजूद हैं, जिनका जीवन व्यवहार हिन्दू सामाजिक जीवन से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है।

विशेष रूप से निम्नवर्गीय मुस्लिम समुदायों में विवाह, मृत्यु, पर्व-त्योहार, लोकगीत, भोजन और पहनावे में हिन्दू संस्कृति की स्पष्ट छाया देखी जाती है। शादी में कन्या पक्ष द्वारा ‘सिंदूरदान’ की परंपरा, चावल से 'पग-धुलाई', हल्दी-कुंवारी रस्म, और मरणोपरांत तेरहवीं जैसे रीति-रिवाज उन मुस्लिम परिवारों में भी निभाए जाते हैं जो स्थानीयता से गहरे जुड़े हुए हैं, तो वहीं  कुछ श्रमिक हिंदू जातियां अपने कुल देवता के रूप में "पांचों पीर" की वार्षिक पूजा करती हैं।

साथ ही, मुस्लिम समुदायों ने अपनी सूफी परंपराओं, कव्वालियों, उर्दू-अदब और मस्जिदों के माध्यम से बक्सर की सांस्कृतिक पहचान को विविधतापूर्ण बनाया है। फकीरी परंपराओं, पीर-बाबाओं की मजारों और उर्स आयोजनों जैसे बक्सर में दरिया शाह पीर और चौसा पूर्वी रेलवे फाटक के पास अला शहीद बाबा के मजारों पर हिन्दू और मुस्लिम अनुयायी समान रूप से भाग लेते हैं।

इस सांझी संस्कृति का सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि सामाजिक आयोजनों – चाहे वह होली हो या ईद, मुहर्रम का जुलूस हो या चैती – दोनों समुदाय आपसी सद्भाव से एक-दूसरे की खुशियों में शामिल होते हैं।

4. खेती-बाड़ी और कृषि संस्कृति

बक्सर की सांस्कृतिक संरचना खेती-बाड़ी की रीढ़ पर टिकी हुई है। यहाँ की भूमि गंगा और कर्मनाशा के उर्वर कछार में स्थित है। धान, गेहूँ, चना, मटर, अरहर, मूंग, मसूर, गन्ना, मक्का और सब्जियाँ यहाँ की प्रमुख फसलें हैं। कृषि कार्यों में 'हलवाही', 'रोपनी', 'कटनी' और 'कटाई' के समय गाए जाने वाले लोकगीत यहाँ के जीवन में संगीत की तरह गूँजते हैं।

‘धान रोपनी’ में गाए जाने वाले गीतों में स्त्रियों की भावनाएँ, श्रम, प्रेम और विरह झलकते हैं। इसके साथ ही बैलों की पूजा, हल-बैल की सजावट और खेत में काम करने की पारंपरिक विधियाँ इस संस्कृति की धुरी हुआ करती थीं।

आज भी बक्सर के कुछ क्षेत्र जैसे इटाढ़ी, ब्रह्मपुर, धनसोइं और डुमराँव में पारंपरिक 'बाड़ी खेती' (बग़ीचे में मिश्रित सब्जी उत्पादन) प्रचलन में है, जहाँ महिलाएँ सब्जियाँ उगाती हैं, बाजार जाती हैं और घरेलू अर्थव्यवस्था में योगदान करती हैं।

5. खान-पान : भोज्य सांस्कृतिक पहचान

बक्सर का खान-पान इसकी सांस्कृतिक अस्मिता का एक मजबूत स्तंभ है। यहाँ का परंपरागत आहार न केवल पोषण से भरपूर होता है, बल्कि उसका सामाजिक, धार्मिक और उत्सवजन्य महत्त्व भी होता है।

सबसे प्रमुख व्यंजन ‘लिट्टी-चोखा’ है – जिसमें सत्तू से भरी हुई लिट्टी और बैगन-आलू-टमाटर का चोखा परोसा जाता है। यह न केवल एक व्यंजन है, बल्कि एक पहचान है – वह भी खासतौर पर पंचकोशी यात्रा के अवसर पर।

इसके अतिरिक्त दाल-भात , सब्ज़ी, कद्दू-घीया की सब्ज़ी, चने का साग, बेसन की सब्ज़ी, खेसारी की दाल, और सोनाचुर चावल से बनी खीर जैसे व्यंजन घर-घर में प्रचलित हैं।

मिठाइयों में अनरसा, खाजा, ठेकुआ, तिलकुट, गुड़ही जिलेबी, मजिस्ट्रेट (सरेंजा की), पेड़ा (इटाढ़ी ठोरा पुल के पास) , लड्डू और रसियाव जैसे प्रसाद या उत्सव-भोज्य पदार्थ संस्कृति का हिस्सा हैं। विशेष रूप से छठ में बनने वाले ‘ठेकुआ’ का धार्मिक और पारिवारिक महत्त्व अत्यंत गहरा होता है।

गंगा और उसकी सहायक नदियों यथा,कर्मनाशा, ठोरा, कोचानो, मीरकिरी, छेर, धर्मावती आदि में देशी मछलियां खूब मिलती हैं, जिसका भोज्य व्यंजन अनूठे स्वाद से रसीला होता है।

6. परिधान और शृंगार

बक्सर की पारंपरिक वेशभूषा शालीनता, साधारणता और मौसमानुकूलता का परिचायक है। पुरुषों में धोती-कुर्ता, पगड़ी और अंगोछा का चलन था। अब कुर्ता-पायजामा और जैकेट ने स्थान लिया है, किंतु गांवों में आज भी धोती एक सम्मानजनक वस्त्र माना जाता है।

स्त्रियाँ प्रायः साड़ी पहनती हैं, विशेष रूप से लाल, पीला, हरा जैसे रंग धार्मिक अवसरों पर शुभ माने जाते हैं। विवाहित स्त्रियाँ सिंदूर, बिंदी, पायल, झुमका, मंगलसूत्र जैसे शृंगारों को आवश्यक मानती हैं। शादी-ब्याह या पर्व-त्योहार में महावर, महंदी, चुनरी आदि का अत्यंत सांस्कृतिक महत्त्व होता है।

7. पलायन, शहरीकरण और सांस्कृतिक संकट

पिछले चार दशकों में बक्सर की सामाजिक संरचना में बड़ा बदलाव पलायन के कारण आया है। रोजगार, शिक्षा और चिकित्सा के लिए युवा पीढ़ी बाहर – दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात – जाने लगी है। गाँवों में बुजुर्ग, महिलाएँ और बच्चे अधिक बचे हैं, जिससे पारंपरिक कृषिपरक जीवन पद्धति में व्यवधान आया है।

शहरीकरण की लहर ने न केवल आर्थिक जीवन को प्रभावित किया है, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों को भी हिला दिया है। अब पंचायती चौपालें कम हो गई हैं, लोकगीत कम सुनाई देते हैं, पारंपरिक शिल्प लुप्त हो रहे हैं, और स्थानीय नाट्य-परंपराएँ, जैसे रामलीला और नौटंकी, सिमटती जा रही हैं।

इसके साथ ही मोबाइल, टीवी, सोशल मीडिया, शहरी फैशन और उपभोक्तावादी संस्कृति ने ग्रामीण युवाओं की रुचियों में बदलाव ला दिया है। अब भोजपुरिया गौरव, लोक-कला, और ग्राम्य गौरव की समझ क्षीण होती जा रही है। इस स्थिति में संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन एक चुनौती बन गया है।

8. आधुनिकता के प्रभाव और संरक्षण की संभावनाएँ

हालांकि आधुनिकता ने कुछ संकट पैदा किए हैं, किंतु उसके भीतर अवसर भी छिपे हैं। जैसे ही स्थानीय शिक्षण संस्थानों में लोक परंपराओं पर शोध होने लगे हैं, वैसे ही कई लोग बक्सर की कैथी लिपि, लोकगीत, आम और बेर के किस्मों, या ऐतिहासिक स्थलों के दस्तावेजीकरण में जुटे हैं।

डुमराँव के आमों की विविधता, कैथी लिपि की कार्यशालाएँ, पंचकोशी यात्रा का व्यवस्थित आयोजन, रामेश्वरनाथ जैसे स्थलों के पर्यटक केंद्रों में रूपांतरण – यह सब सांस्कृतिक जागरूकता के सकारात्मक संकेत हैं।

सरकारी योजनाओं और स्थानीय प्रयासों से यदि पारंपरिक शिल्प, नाट्य, गीत, दस्तावेजीकरण, संग्रहालय, सांस्कृतिक केंद्र आदि बनाए जाएँ, तो बक्सर की सांस्कृतिक आत्मा को सुरक्षित रखा जा सकता है।

निष्कर्ष

बक्सर की सांस्कृतिक परंपरा एक जीवंत नदी की तरह है – जो समय, समाज और इतिहास की विभिन्न धाराओं को अपने भीतर समाहित करती हुई आगे बहती है। रामायण की स्मृतियों से लेकर लिट्टी-चोखा की खुशबू तक, पंचकोशी यात्रा से लेकर मुस्लिम समुदाय की परंपराओं तक, यह संस्कृति न तो संकुचित है, न विभाजित; यह समावेशी है, जीवंत है, और निरंतर बदलती हुई भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है।

आज जब पलायन, शहरीकरण और तकनीकी आधुनिकता से इस सांस्कृतिक बुनावट को खतरा है, तब आवश्यक है कि हम इसकी विविधता, परंपरा और साझी विरासत को समझें, सहेजें और भविष्य के लिए प्रासंगिक बनाएँ।

छठ पूजा: शाहाबाद, बिहार में लोक आस्था का महापर्व


छठ पूजा: शाहाबाद, बिहार में लोक आस्था का महापर्व
_ लक्ष्मीकांत मुकुल 

प्रस्तावना

छठ पूजा — केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं; यह बिहार के सामाजिक, सांस्कृतिक और लोकमानस की एक जीवंत अभिव्यक्ति है। शाहाबाद के ग्रामीण और शहरी परिवेश में छठ न केवल सूर्य और छठी मैया की आराधना का नाम है, बल्कि यह सामूहिक स्मृति, पश्चात्-परंपरागत नैतिकता, लोकसंगीत, कथा-कहानी और सामाजिक अवयवों का एक समेकित ताना-बाना भी है। इस आलेख में  छठ के ऐतिहासिक मूल, उसका सांस्कृतिक महत्व, पूजन-विधि (परमेसरी/छठी मां के संदर्भ में), छठ गीतों का स्वरूप, भोजपुरी लोककथा, लोक-मान्यताएँ और शाहाबाद की विशिष्ट परम्पराओं का वृहद् विवेचन प्रस्तुत है।

१। छठ का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

छठ पर्व का इतिहास प्राचीन है। कई विद्वान इसे वैदिक सूर्योपासना की लोक-आवृत्तियों से जोड़ते हैं—ऋग्वेद और अन्य वेदों में सूर्य और उषा के स्तुति-संदर्भ मिलते हैं, जिनसे सूर्योपासना की परंपरा जुड़ी रही।
छठ पर्व की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की खोजबीन करने पर इसके पुरातन साक्ष्य धुंधले रूप में प्राप्त होते हैं। सातवीं सदी में सोनतटीय ग्राम प्रीतकूट निवासी संस्कृत के महान लेखक बाणभट्ट की प्रसिद्ध कृति  " हर्षचरित्र" में सूर्य पूजा का जिक्र तो मिलता है, परंतु तिथि विशेष को छठ पूजा करने उल्लेख नहीं मिलता। 11 वीं शताब्दी में अरब आक्रमण के समय में भारत भ्रमण पर आए अलबरूनी ने अपने विवरण में हिंदू समाज के तत्कालीन त्यौहार, व्रत, उपासना, व्रत के दिनों के निर्धारण- क्रम में एकदिवसीय व्रतों की चर्चा की है, उसमें सूर्य उपासना व्रत के संदर्भ में उसने "चैत्र का छठा दिन सूर्य के लिए पुण्य व्रत दिवस है और भाद्रपद के पांचवें दिन सूर्य पूजा के लिए पुण्य व्रत है जो षट् कहलाता है" का उल्लेख किया है, लेकिन आज जैसे मशहूर पर्व छठ मनाए जाने की जानकारी नहीं प्राप्त होती। 

परंतु 18 सदी के अंत में पटना कलम के कलाकारों के बनाए कुछ चित्रों में गंगा तट पर इस पर्व को मनाए जाने वाले विहंगम दृश्यों का अवलोकन का होता है। एक चित्र में नदी तट पर स्त्री - पुरुषों की अपार भीड़ ओर छोर तक फैली है  और व्रत धारियां जल में खड़ी हुई हैं हाथी व ऊंट शोभा बढ़ाने के लिए  तट पर उपस्थित हैं ।  नाविक अपनी नावों को लेकर जल सुरक्षा हेतु मुस्तैद हैं। यह दृश्य अभिजात कुलों द्वारा मनाई जा रहे छठ व्रत को दर्शाता है। तट की स्वच्छता और नदी का जल प्रवाह बहुत ही मनोरम दृश्य उत्पन्न कर रहा है। दूसरे एक चित्र में छठ घाट पर सघन भीड़ है, मंदिर, मस्जिद, हवेली और उसके बड़ा दरवाजा, खपड़ैल के घर, पेड़ पौधे नदी के कगार पर दिख रहे हैं। नदी में स्नान पूजा करती औरतों और नदी में नौका विहार का आनंद लेते नाव सवारियों के दृश्य बहुत ही सजीव, जीवंत और अनूठा दृश्य उत्पन्न कर रहे हैं। यहां पर एक अन्य दुर्लभ तस्वीर की चर्चा आवश्यक है, जिसमें साधारण परिवार की महिलाओं की घाट पर सघन भीड़ लगी है। कुछ दौरा उठाए आ रही हैं, कुछ पूजा देखती गीत गा रही हैं और जल में खड़ी हुई सुपली थामी एक औरत को एक को एक पुजारी पीतल के लोटा ले दूध गिराता अर्घ्य दिला रहा है। इन चित्रों से स्पष्ट है कि उस समय में भी छठ पूजा का महत्व आम जनता की नजर में कितना महत्वपूर्ण था।
अंग्रेज सर्वेयर फ्रांसिस बुकानन के सन 1812_13 शाहाबाद रिकॉर्ड में छठ पूजा को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाए जाने का भरपूर विवरण प्राप्त होता है_
"कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को, यहाँ कई महिलाएँ पूरे दिन उपवास रखती हैं, शाम को वे गाजे-बाजे के साथ जुलूस निकालती हैं और सूर्यास्त के समय किसी तालाब या नदी के किनारे बैठकर उस महान ज्योतिर्लिंग को भोग लगाती हैं। वे पूरी रात वहीं बैठी रहती हैं और 24 घंटे उपवास रखने के बाद सूर्योदय तक कुछ नहीं खातीं। इस पवित्र दिन को छठ का व्रत कहते हैं और यह बिहार में भी मनाया जाता है, लेकिन यह मेरे आने से पहले ही बीत चुका था, इसलिए मुझे इसकी जानकारी नहीं थी। बंगाल में यह ज्ञात नहीं है।"
बुकानन के इस विवरण से स्पष्ट है कि यह पर्व केवल बिहार में मनाया जाता है, उसके यात्रा के समय से यह उत्सव पहले ही बीत गया था। छठ की वेदी पिण्ड को उसने महान ज्योतिर्लिंग भ्रमवश समझा था।

शाहाबाद क्षेत्र में छठ नाम से दो प्रकार के त्योहार मनाए जाते हैं। पहला हर छठ और दूसरा छठ पूजा। हर छठ भाद्र मास की कृष्ण पक्ष की छठवीं तिथि को मनाया जाता है, जिसमें पति-पत्नी दोनों व्रत रखते हैं। इस दिन जीव हत्या नहीं होती। यह छठ कृष्ण के भाई बलराम की स्मृति में मनाई जाती है क्योंकि लोगों का मानना है कि हर (हल) उनका प्रियता का प्रतीक है। इसमें शिव परिवार की पूजा होती है। गायन - वादन के अलावे इस पूजा में सांवा का चावल, महुआ के फूल के साथ भैंस का दही मट्ठा चढ़ने और प्रसाद में इसे लेने की प्रथा है, परंतु यह व्रत आज के समय में सीमित रूप से होता है। दूसरा छठ पूजा, जो सूर्य उपासना का मशहूर पर्व है; यह पर्व वर्ष में दो अवसरों पर मनाया जाता है, पहला चैती छठ और दूसरा कार्तिकी छठ। चैत्र मास की शुक्ल पक्ष पष्टी को और दूसरा कार्तिक मास शुक्ल पक्ष पष्ठी तिथि को। चैत्र मास का छठ पर्व बहुत ही सीमित होता है, मनौतियों के आधार पर लोग सूर्य मंदिरों के स्थान पर जाकर इस व्रत को करते हैं; विशेषकर औरंगाबाद के देव नामक स्थान पर। कार्तिक मास शुक्ल पक्ष पष्ठी  वाला पर्व बहुत ही लोकप्रिय है, जो हर गांव, टोला, परिवार में नदी, पोखर, आहर के किनारे समूह में मनाया जाता है, जिसे आज के बाजार, मीडिया और प्रवासी बिहारी की अस्मिता बोध ने और भी लोकप्रिय और अनूठा बना दिया है।

  छठ पर्व समेकित चार दिवसीय लोक-उत्सव विशेषतः बिहार-झारखण्ड-पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में फला-फूला। इस भू-भाग की कृषि-जीवन, नदी-घाटों का महत्व तथा सूर्य के चक्र से जुड़ी मान्यताओं ने छठ को एक सार्वजनिक, सामुदायिक और मौसम-आधारित अनुष्ठान बना दिया।

शाहाबाद (वर्तमान में ऐतिहासिक शाहाबाद जो भूगोल और प्रशासनिक रूप से बदल चुका है, भोजपुर, रोहतास, बक्सर और कैमूर जिलों में) का क्षेत्र सामुदायिक कृषि-जीवन और नदी-घाट संस्कृतियों के कारण छठ के उत्सवों के लिए सदैव विशेष रहा है। यहाँ छठ का आयोजन बड़े सार्वजनिक घाटों, तालाबों और नदी तटों पर होता है—जहाँ परिवार समूहों के साथ मोहल्ले और गाँव वाले जमा होते हैं। छठ, सामाजिक समरसता का पर्व भी है—धर्म, जाति और उम्र की बाधाएँ कुछ हद तक पृष्ठभूमि में छूट जाती हैं क्योंकि घाट पर सब एक ही भक्ति में जुटते हैं।

२। छठ के प्रमुख ऐतिहासिक-कथा-स्रोत

लोककथाओं और पुराणिक आख्यानों में छठ के आरम्भ से जुड़े अनेक कथानक मिलते हैं। लोकप्रिय कथाओं में श्रुति और स्मृति, महाकाव्य तथा स्थानीय कथाएँ मिश्रित हैं—जैसे राजा प्रियव्रत की कथा, द्रौपदी का छठ व्रत और माता सीता का छठी मैया के प्रति समर्पण। इन कथाओं का धाराप्रवाह स्वर लोक-मन में छठ की महिमा का निर्माण करते हैं और व्रतीों के लिये एक नैतिक-आध्यात्मिक अनुकरणीयता का आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

यद्यपि विद्वान इन कथाओं को ऐतिहासिक रूप से सत्यापित करने में सतर्क रहते हैं, परन्तु सांस्कृतिक इतिहास के दृष्टिकोण से यह महत्वपूर्ण है कि किस तरह मुँहजबानी लोककथाएँ और स्थानीय स्मृतियाँ छठ के उत्सव को चरणबद्ध और अर्थपूर्ण बनाती हैं। बहुस्तरीय लोकमान्यताएँ—सूर्य-भक्ति, कन्या-सम्मान, निस्वार्थ समर्पण—छठ को एक समकालीन लोक-धर्म का रूप देती हैं।

३। छठ व्रत की रीति - परम्परा और विधि (शाहाबाद की मान्य प्रथाएँ)

छठ एक चार दिवसीय लोक समाज का त्योहार है, जिसके मुख्य चरण व्यापक रूप से निम्न हैं (स्थानीय विविधताओं के साथ):

(क) नहाय-खाय (पहला दिन): व्रत की शुद्धि-प्रक्रिया—नहाना और शुद्ध भोजन। शाहाबाद के घरों में नहाय-खाय में विशेष रूप से गहुँ की दाल-बाटी, ताजा सब्जी और शुद्ध जल का प्रयोग देखा जाता है। यह दिन व्रती (प्रायः महिलाएँ, परंतु पुरुष भी) व्रत की शुद्धता की शुरुआत करते हैं।

(ख) खरना (दूसरा दिन): इस दिन व्रती दिनभर उपवास रखते हैं और शाम को गुड़, चावल और दही से बनी खीर और रोटी ग्रहण करते हैं—इसे खरना कहा जाता है। शाहाबाद के अनेक गाँवों में यह सामूहिक रूप से होता है; गाँव के बुजुर्ग व्रती परिवारों में रेशमी प्रसाद बाँटते हैं।

(ग) संध्या अर्घ्य (तीसरा दिन/संध्या): यह वह दिन है जब व्रती शाम के समय नदी या तालाब के किनारे डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। घाट बनाए जाते हैं, दीप जलते हैं और विशेष प्रसाद (फल, ठेकुआ, अरवा, केसरिया चावल) नदी के किनारे रखे जाते हैं। नदी की धार में ईख के बंधे समूह को खड़ा किया जाता है। मिट्टी के दीपों को पानी में प्रवाहित किया जाता है, जो जगमग करते अद्भुत दृश्य उत्पन्न करते हैं।
शाहाबाद के घाटों की विशिष्टता यह है कि यहाँ घाट पर स्थानीय समुदाय के गीत और लोककथाएँ मंचित हो जाती हैं—घाट पर छठी मैया के गीत और लोकनृत्य प्रचुर मात्रा में सुनने को मिलते हैं।

(घ) प्रातः उदय अर्घ्य (चौथा दिन): अंतिम चरण में व्रती प्रातः काल में उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और व्रत का पारण करते हैं। इस दिन घाट पर सामूहिक उत्सव का स्वरूप प्रबल होता है—मिथकीय कथा-वाचन, छठ गीत और प्रसाद-वितरण होता है।

शाहाबाद की एक अनूठी प्रथा यह है कि कभी-कभार चतुर्दिक (व्रत-धारक का घर) से घाट तक चलने वाली भजन-यात्राएँ निकलती हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा-शैली (भोजपुरी) में गीतों द्वारा संचालित किया जाता है।

४। छठ परमेसरी (छठी मैया) की पूजा-विधि (विस्तार)

छठी मैया या ‘परमेसरी’ स्थानीय बोली में अति श्रद्धेय देवी हैं। पारंपरिक पूजा-विधि निम्नानुसार है, जिसमें स्थानीय भिन्नताएँ सम्मिलित होती हैं।

• शुद्धता का नियम: व्रत के दौरान पवित्रता का विशेष निर्देश रहता है—शारीरिक स्वच्छता, शुद्ध वस्त्र, और आवास की शुद्धता।

• अर्घ्य सामग्री: अर्घ्य में प्रयोग होने वाली सामग्रियाँ—नारियल, केला, कच्चा चावल, ठेकुआ, गुलौरा, गुड़, पानी (नदी/स्रोत का), पारम्परिक दीपक आदि। शाहाबाद में लोग घाट से सीधे जल लाकर अर्घ्य में प्रयोग करते हैं, जिससे  सोन,गंगा,कर्मनाशा, कोचानो, मिर्कीरी, काव, दुर्गावती, कुदारा, बनास, छेर आदि स्थानीय नदी- घाटों का महत्व और भी बढ़ जाता है।

• कन्या/नवविवाहित की भागीदारी: छठी मैया को कन्या या नवविवाहित स्त्री का रूप में पूजा की प्रथा कही जाती है। कई जगहों पर विशेष कार्यक्रमों में कन्याएँ/कन्याशिशु को प्रसाद चढ़ाया जाता है और उन्हें सम्मानित किया जाता है—यह परंपरा लोक-स्तरीय मातृत्व और देह-पूजन की निशानी मानी जाती है।

• मौन व्रत: व्रती प्रायः नहाय-खाय के बाद खरना तक आहार ग्रहण करते हैं, उसके बाद संध्या से लेकर उदय तक निर्जल व्रत रखते हैं। व्रत के दौरान व्रती को शारीरिक और मानसिक संयम का पालन करना अनिवार्य माना जाता है।

• सामुदायिक पूजा और प्रसाद-वितरण: छठ पूजा स्थानीय समुदाय के बीच प्रेम और भंडारे के रूप में प्रकट होती है—प्रसाद बाँटा जाता है, और गाँव के बुजुर्ग/पंडित सामूहिक रूप से मंत्रोच्चारण करते हैं।

५। छठ के गीत—भोजपुरी लोक-संगीत का स्वरूप

छठ गीत (Chhath Geet) भोजपुरी जनमानस के भावों का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। छठ गीतों में भाव, भक्ति और ग्रामीण जीवन के चित्रकण का अद्भुत मेल मिलता है। इन गीतों के मुख्य लक्षण हैं:

• भाषा और रूप: सरल भोजपुरी व  स्थानीय शब्दावली, बार-बार दोहराए जाने वाले राग-छंद, लयात्मकता।

• विषयवस्तु: माता की स्तुति, सूर्य के प्रति आभार, व्रतधारियों की मनोकामनाएँ, सामाजिक सहानुभूति, और प्रकृति के साथ मानवीय संबंध।

• भूमिका: गीतों का प्रयोग घाट तक चलने, प्रसाद चढ़ाने, और व्रती की दृढ़ता को प्रबंधित करने के लिए होता है। गीत अक्सर महिलाएँ गाती हैं, परंतु समूह-गीतों में पुरुष भी शामिल होते हैं। यथा कुछ गीतों के अंश प्रस्तुत हैं, जिसमें छठ परमेसरी को स्वच्छता की देवी माना गया है, बेहद क्रोध होने वाली है_

कोपि कोपि बोलेली छठिय मइया, सुन ए सेवक लोग
 मोरा घाटे दुबिया जनम गइली, मकड़ी बसेर लेली
 हंसि-हंसि बोलेले कवन देव, सुन ए छठिय मइया
 रउआ घाटे दुबिया छिलाई देबो, मकड़ी उजारि देबो
 चंदन पड़ोरि देबो, दुधवे अरघ देबो...।

एक भोजपुरी छठ गीत यहां प्रस्तुत है, जो अक्सर सुनाई देते हैं_


कांचहि बांस के बहंगिया, बहंगी लचकती जाय 
पेन्ह मा कवन बाबा पियरिया, दउरा घाटे पहुंचाय 
पेन्ह ना कवन देई चुनरिया, चल अरघ दिआय 
बाट जे पुछेले बटोहिया, इ दल केकरा के जाय 
आन्हर हवे रे बटोहिया, इ दल सूरूज बाबा के जाय
 केलावा जे फरेली पंवध से, ओह पर सुगा मेड़ाय 
सुगावा जे मरबो धेनुक से, सुगा गिरिहे मुरुछाय
 सुगिया जे रोवेले बियोग से, सूरूज महिमा तोहार।



आधुनिक समय में छठ गीतों का माध्यम मल्टीमीडिया भी बन गया है—लोक गायक (जैसे पवन सिंह, खेसारी लाल यादव आदि) के छठ-थीम के रिकॉर्ड किए गए गीत लोकप्रिय हुए हैं, पर पारंपरिक गाँव-घाट के गीतों का स्थानीय स्वाद कुछ और ही होता है—धीरे, आरती-जैसे स्वर, और कहानियों के छोटे-छोटे उद्धरण।

६। शाहाबाद की भोजपुरी लोककथा और छठ

शाहाबाद क्षेत्र में छठ से जुड़ी कई लोककथाएँ प्रचलित हैं—ये कथाएं व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामूहिक अनुभवों के माध्यम से पीढ़ी से पीढ़ी तक पहुँची हैं। कुछ लोककथाएँ इस प्रकार हैं:

(1) द्रौपदी व्रत की कथा (स्थानीय रूप): शाहाबाद की एक लोककथा में कहा जाता है कि महाभारत के समय द्रौपदी ने अपने परिवार की रक्षा के लिये छठ व्रत किया था—यह कथा व्रत की नैतिक शक्ति और स्त्री-धैर्य को दर्शाती है।

(2) राजा प्रियव्रत कथा (लोक संस्करण): इस कथा के अनुसार एक राजा ने छठ व्रत कर पुत्र-प्राप्ति या मृतक की वापसी की कामना से पूजा की, जिससे उसका पश्चात्री पुत्र वापस आ गया—यह कथानक छठ की चमत्कारिक शक्ति को रेखांकित करता है।


(3)छठी मइया से जुड़ी एक भोजपुरी लोककथा:

"छठ के दिन रहे। तिवई सभे घाट अगोरले रहे। छठी मइया के कथा होत रहे। रानी गइली कुइयां पर पानी भरे। छठी मइया पहिलहीं से उहाँ बूढ़ मेहरारू के भेस ध के बइठल रहली। कहली जे हे रानी, तू घरहीं का काम-काज में लपटाइल रह गईलू आ घाट के कथा ना सुनलू? तनीएसा बइठ जा आ घाट के कथा सुनले जा।

रानी कहली-ना ए बुढ़िया माई हमरा संवंठ नइखे, घरे चुल्हा पर कड़ाही में दूध, सिकहर पर कटिया में घीव, आ पलंग पर आपन पूत छोड के आइल बानीं ।

रानी जब घरे अइली त ना कड़ाही में दूध रहे, ना कँटिया में घीव रहे, ना पलंग पर पूत रहे लगली रोए। आहि बाप, ई का भइल ए दादा। छने भर में सब बिला गइल।

रानी सोचली, जे हो ना होय, बुढ़िया के बात हम ना मनलीं ह, ओही से अइसन भइल ह। ऊ दउरल गइली कुइयों पर आ ध ले ली बुढ़िया के गो, करे लगली निहोरा; हे बढ़िया माई, तू कवन चर कइलू, जे छने भर में हमार सब लूट लिहलू ।

बुढ़िया माई कहली, जे तूं छठ का कथा के अपमान कइलू ह। जले फेर से कथा ना सुनबू तले तहार दुख दूर ना होई। रानी कहली, जे हम सुनेब, रउरा सुनाई।
बुढ़िया माई कथा कहे लगली आ रानी प्रेम से सुने लगली। जब कथा सपर गइल त बुढ़िया माई कहली जे अब तूं घरे जा रानी घरे अइली। उनकर सबकुछ लवट आइल रहे कड़ाही में दूध रहे, मेंटा में घीव रहे, आ पलंग पर पूत रहे। गाँव भर के लोग छठी मइया के महिमा के बखान करे लागल लोग।
बोलीं सभे, छठ परमेश्वरी की जै!"


(4) स्थानीय नदियों/तालाबों की देवी-आस्थाएँ: शाहाबाद के कई गांवों में कही जाती लोककथाएँ बताती हैं कि किसी विशेष तालाब या नदी का अपना स्वघोषित देवी-स्वरूप है जिसने छठ व्रतों से गाँव की रक्षा की—ऐसी कथाएँ लोक-नैतिकता और पर्यावरणीय संरक्षण की लोक-एकीकृत समझ देती हैं।

ये कथाएँ केवल धार्मिक नहीं हैं; वे सामाजिक सद्भाव, नैतिक आदर्श और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की लोक-शिक्षा भी देती हैं।

७। लोक-मान्यताएँ और प्रतीकात्मक अर्थ

छठ से जुड़ी कई लोक-मान्यताएँ हैं—जो आकार में स्थानीय भिन्नता लिए हुए हैं पर भावनात्मक स्तर पर एक समानता दर्शाती हैं:

• सूर्य का आरोग्य-प्रतीक होना: सूर्य जीवन-दाता और ऊर्जा का प्रतीक है। छठ पर सूर्य को अर्घ्य देने का मूल अर्थ—जीवन-ऊर्जा के प्रति आभार और समृद्धि की कामना है।

• कन्या-पूजन: कन्या या नन्ही बालिका को देवी का प्रतिनिधि मानकर पूजन करना—यह मातृत्व-सम्बन्ध, निस्वार्थता और नए जीवन का सम्मान है।

• पानी और घाटों का पवित्रिकरण: नदी/तालाब का पानी पवित्र माना जाता है—घाटों का स्वच्छिक तथा आस्था-आधारित प्रबंधन स्थानीय पारिस्थितिकी और सामाजिक-सांस्कृतिक सह-निर्भरता को दर्शाता है।

• कड़ी शुद्धता: व्रत और शुद्धता के नियम सामाजिक अनुशासन और आस्था के पालन की शिक्षा देते हैं—यह लोक-जीवन में आत्म-नियमन का प्रतीक भी है।

८। शाहाबाद की अनूठी परम्पराएँ

शाहाबाद में कुछ विशिष्ट प्रथाएँ छठ को स्थानीय रूप से विशिष्ट बनाती हैं:

(क) सामूहिक घाट संचालन: शाहाबाद के छोटे कस्बों में कुछ घाट सामुदायिक स्वामित्व में होते हैं—जहाँ स्थानीय समिति घाट की साफ-सफाई, दीप-प्रबंध और रुकने-सामग्री की व्यवस्था करती है।

(ख) पारिवारिक प्रसाद के स्थानीय व्यंजन: शाहाबाद के छठ प्रसाद में स्थानीय पकवान जैसे खास ठेकुआ, अरवा, केला-भाजी का समावेश और कुछ गाँवों में स्थानीय मकई-आधारित व्यंजन भी जोड़े जाते हैं।

(ग) कथा-वाचन और सामूहिक गीत-संगीत: घाट पर शाम के समय स्थानीय कथा-वाचक/बुजुर्ग छठ की कथाएँ सुनाते हैं, और ग्रामीण वर्तनी-भाषा में गीत गाए जाते हैं—यह परंपरा सामाजिक स्मृति और आदर्शों का संचार करती है।

(घ) युवा-भागीदारी: शाहाबाद में युवा स्वयंसेवक व सामाजिक कार्यकर्ता घाटों पर साफ-सफाई, पानी के प्रबन्ध तथा वृद्धों की सहायता करते हैं—यह नवयुवक-भागीदारी छठ को केवल पारंपरिक नहीं रहने देती बल्कि उसे सामाजिक कार्य और पर्यावरण चेतना से जोड़ देती है।

(ङ) नारी-शक्ति का उत्सव: पारंपरिक रूप से महिलाएँ व्रत में अग्रणी होती आयी हैं—यहाँ महिलाएँ न केवल पूजा करती हैं बल्कि गीत-बंधन और प्रसाद के प्रबन्ध की भी पालना करती हैं। इससे महिलाओं की सामूहिक सामाजिक भूमिका और नेतृत्व का प्रदर्शन होता है।

९। छठ और समकालीन चुनौतियाँ

छठ के पारंपरिक आयोजन के साथ कुछ समकालीन चुनौतियाँ भी जुड़ी हुई हैं:

• पर्यावरण और घाट प्रदूषण: बढ़ते जनसमूहों और असंगठित वेस्ट-मैनेजमेंट के कारण कुछ घाटों में प्रदूषण की समस्याएँ देखने को मिलती हैं। शाहाबाद में भी कुछ स्थानों पर इस चुनौती पर स्थानीय समितियाँ काम कर रही हैं—घाटों की सफाई, प्लास्टिक प्रतिबंध और कम-प्रदूषक प्रसाद-व्यवस्था पर बल दिया जा रहा है।

• नगरीकरण और परंपरा का संकुचन: शहरीकरण के कारण कुछ पारंपरिक घाट और सामुदायिक आयोजन प्रभावित हो रहे हैं। हालाँकि शाहाबाद के कुछ हिस्सों में शहरी और ग्रामीण जीवन की संगम-घटनाएँ छठ को नए रूप देती हैं—नवप्रवर्तित कम्युनिटी-घाट और सामूहिक आयोजन उभर रहे हैं।

• वाणिज्यिकरण: आधुनिक मीडिया और संगीत-उद्योग ने छठ गीतों और प्रसाद-व्यापार को व्यावसायिक रूप दिया है—इससे पारंपरिक स्वर और लोक-विरासत पर प्रभाव पड़ा है। परन्तु यह परिवर्तन कुछ हद तक स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान भी देता है।

१०। सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययन और नीतिगत सिफारिशें

छठ उत्सव की पहचान न केवल धार्मिक है, बल्कि यह सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय आयामों से जुड़ा हुआ लोक-क्षेत्र भी है। शाहाबाद जैसे क्षेत्रों में नीतिगत हस्तक्षेप प्रभावी हो सकते हैं:

(क) घाट संरक्षण परियोजनाएँ: स्थानीय स्वयंसेवी समूहों और पंचायतों के सहयोग से घाटों का संरक्षण, जैविक-वेस्ट प्रबंधन और स्वच्छता अभियान चलाये जा सकते हैं।

(ख) पारंपरिक गीतों और कथाओं का दस्तावेजीकरण: छठ गीतों, लोककथाओं और प्रथाओं का ऑडियो-विडियो आर्काइव बनाना चाहिए ताकि भविष्य की पीढ़ियों को यह लोक-धरोहर उपलब्ध रहे।

(ग) पर्यावरण-अनुकूल प्रसाद और प्लास्टिक-नियमन: प्रसाद पैकेजिंग में विकल्प जैसे पत्तल/पलेट/बाँस के भांडों का प्रयोग प्रोत्साहित करना चाहिए।

(घ) युवा सशक्तिकरण और जागरूकता: युवाओं को घाट प्रबन्धन, प्राथमिक चिकित्सा और पारंपरिक ज्ञान के प्रशिक्षण से जोड़ना चाहिए—ताकि उत्सव सुरक्षित और जिम्मेदार तरीके से मनाया जा सके।

निष्कर्ष

छठ पूजा शाहाबाद के लिए केवल एक पर्व नहीं; यह स्थानीय आत्म-चिन्तन, सामाजिक समरसता, लोक-संगीत और प्राकृतिक संसाधनों के साथ गहरे सम्बद्धता का संकेत है। इस पर्व के माध्यम से स्थानीय समुदाय न केवल अपनी आस्था व्यक्त करते हैं बल्कि ज़मीनी स्तर पर सामाजिक समर्थन, संसाधन-प्रबंधन और सांस्कृतिक तारांकन करते हैं। छठ की समग्रता—उसके गीत, कथाएँ, रीति-नियम और सामाजिक कार्य—यह दर्शाती है कि धर्म और संस्कृति कितने तरह से जीवन के अनेक पहलुओं को जोड़ते हैं।

संदर्भ सूची_
1. An account of district of Shahabad in 1812-13, Fransis Buchanan 
2. छठ परमेशरी, सिपाही सिंह श्रीमंत
3. भोजपुरी लोक संस्कृति और परंपराएं, भुनेश्वर भास्कर
4. जोहार भोजपुरिया माटी, व्रत कथा विशेषांक, कनक किशोर
5. हर्षचरित्:एक सांस्कृतिक अध्ययन, डा. वासुदेवशरण अग्रवाल
6. भारत : अल-बरूनी, नेशनल बुक ट्रस्ट 

शाहाबाद गजेटियर का महत्व


शाहाबाद गजेटियर का महत्व
_ लक्ष्मीकांत मुकुल



जिला गजेटियर को प्रकाशित करने की परंपरा अंग्रेजी
शासन-काल में प्रशासकीय दृष्टि को ध्यान में रखकर अधिकारियों को जानकारी प्राप्त कराने के लिए प्रारंभ हुई थी। इसमें जिले का भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सरकारी गतिविधियों की जानकारी रहती थी। स्थान विशेष और जिले की भाषाओं का भी
विवरण इसमें होता था। शाहाबाद गजेटियर का आरंभ तो डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर द्वारा प्रकाशित बंगाल का सांख्यकीय सर्वेक्षण, भाग-7 सन् 1877 से होता है। परन्तु स्वतंत्र रूप से इसका प्रकाशन 1906 ई० में मारले द्वारा तथा पुर्नप्रकाशन 1924 में जेम्स द्वारा किया गया था। उस समय यह पुस्तक 200 पन्नों की थी। आजादी के बाद 1966 ई० में शाहाबाद गजेटियर परिवद्धित से 957 पन्नों में प्रकाशित हुआ।

शाहाबाद गजेटियर सोलह अध्यायों में विभक्त है। सामान्य, इतिहास, निवासी, कृषि और सिंचाई, उद्योग, बैंकिंग- व्यापार और वाणिज्य, यातायात, आर्थिक संबंध और विविध क्रिया कलाप, सामान्य प्रशासन, कानून व्यवस्था और न्याय, भू-राजस्व प्रशासन,स्थानीयस्वशासी निकाय, शिक्षा और संस्कृति, चिकित्सा और स्वास्थ्य सुविधाएँ, सामाजिक सेवायें और प्रसिद्ध स्थल जैसे विषय शामिल हैं।

सामान्य खंड में जिला का नामकरण, भौगोलिक स्थिति, सीमायें, प्राचीन शासकीय इकाई, भौतिक स्वरूप, नदी प्रणाली, झील, पोखरा, झरना, वन्य जीव, प्राकृतिक संपदा और सनिज, खानों की सूची, वनस्पति, जंगल, पंछी, जलवायु, जीव जन्तु, वर्षा, तापमान,आर्द्रता, मेघाच्छादन, वायु गति आदि की विस्तृत जानकारी मिलती है। शाहाबाद का नामकरण बाबर की छावनी नाम पर हुआ। यह भाग पहले करुष देश के नाम से जाना जाता था। शाहाबाद जिला
1765 में बना। ऐसी अनेक बातें इसमें आती हैं। 

इतिहास खंड के क्षेत्र की प्राचीनता, मिथक, असुरों का अत्याचार, दानव-इतिहास, मौर्य युग से गुप्त काल का वर्णन, शशांक का प्रभाव, ह्वेनसांग की यात्रा,
उत्तरगुप्त कालीन राजा जीवित गुप्त का क्षेत्र से, यशोवर्मन, लालित्यादित्य, पाल सम्राज्य, गहड़वालों का प्रभाव - उत्थान, मान सिंह का रोहतास आगमन, अकबर - दलपत - विवाद, अंग्रेजों के बक्सर युद्ध
के बाद का प्रभाव, 1857 का विद्रोह, स्वतंत्रता आंदोलन और 1942 की क्रांति का विस्तृत विवेचन इसमें हुआ है। निवासी खंड में दशकीय जनगणना, पलायन, ग्रामीण एवं शहरी जनसंख्या वर्णन, पुराने
और नये शहरी इलाके जिला मुख्यालय आरा का भौगोलिक - सामाजिक वर्णन, निवासियों की भाषा, भोजपुरी बोली, साहित्य, शाहाबाद में उर्दू का प्रभाव, जैन संस्कृति, जाति, धर्म और समूह,पहाड़ी जन जातियाँ, हिन्दू व मुस्लिम धार्मिक विधान, अंतर्जातीय
संबंध, नये धार्मिक आंदोलन ( आर्य समाज ब्रह्म समाज, ईसाई मिशिनरी), सामाजिक जीवन, मद्य पान और निषेध, पहनावा, घरेलू वस्तुएँ; जैसे- लोढ़ा, सिल, तावा, कोठी, चरपाई, चकरी, जाँत आदि) बर्त्तन, कपड़े, गहने, भोजन- व्यंजन, वाद्ययंत्र और त्योहार आदि है। सामाजिक विवाद (दंगा, बलवा), तीर्थ स्थल, सामाजिक संगठन (रोटरी क्लब, खेल), आर्थिक-पेशेवर-वर्गीय संबंधों का सामाजिक जीवन आदि भी इसमें शामिल हैं। 1961 की तत्कालीन जनगणना
साथ सभी पुराने आँकड़े भी जनसंख्या के प्रचुरता में दिये गये हैं। 1917 ई० के बाद के हिन्दू मुस्लिम दंगों का विस्तृत विवरण भी इसमें मिलता है। कृषि और सिंचाई अध्याय में कृषि योग्य भूमि का विवरण, विविध सिंचाई प्रबंधन (आहर, कुआँ, पइन), सोन नहर
प्रणाली और उसकी शाखाएँ - वितरणियाँ, सिंचाई प्रशासन, पटवन शुल्क, बाँध और लघु सिंचाई व्यवस्था, लिफ्ट सिंचाई योजना, मिट्टी का विविध स्तर, मुख्य फसलें, फल और सब्जियाँ, सरकारी कृषि
फार्म, कृषि से जुड़े उद्योग, फसल विपणन, पशु पालन, मुर्गी पालन, मछली पालन, जंगली उत्पाद, सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में किये गये कार्य इत्यादि हैं। इसी भाग जिला में आयी बाढ़, महामारी, आँधी,
तूफान, आकाल, विक्षुब्धता का इतिहास भी वर्णित है। 
उद्योग खंड में जिला की पुरानी उद्योग परंपरा, बड़े उद्योग धंधे ( डालमिया ग्रुप का सीमेंट, पेपर, चीनी फैक्टरियाँ), सल्फर एसिड प्लांट, राइस मिल, तेल मिल, भवन उद्योग और गिट्टी उद्योग की भी चर्चाएँ की गई हैं। बैंकिग और वाणिज्य भाग में सहकारी बैंकों की गतिविधियों और शाहाबाद में व्यापार के आयात-निर्यात संबंधी विशेषताओं का बखान किया गया है। जिले के बाजारों, गत्तों, मेलें और फुटकर विक्रेताओं
की कार्यशैलियों के बारे में इसमें विविध जानकारी प्राप्त होती है। यातायात में इस क्षेत्र के स्थल मार्ग और जल मार्ग के अनेक तथ्य सामने आते हैं। केन्द्रीय रेलवे के उत्तर और दक्षिण दोनों रेल मार्गों की चर्चा के अलावे निजी कंपनी द्वारा संचालित मार्टिन रेलवे, जो
इतिहास का विषय बन चुकी है। उसके बारे में कई बातें सामने आती हैं। डिहरी - रोहतास लाइट रेलवे, आरा-सासाराम लाइट रेलवे, नदियों के नौका-घाट, स्थानीय हवाई अड्डे और बौलिया- जपला रोपवे जैसे ऐतिहासिक महत्व की चीजों का बड़ा रोचक वर्णन इसमें मिलता है। डाक–तार संचार माध्यमों की जिले में भूमिका भी इससे स्पष्ट होती है। शाहाबाद जिले के आर्थिक संबंधों और उससे जुड़े विविध क्रिया-कलापों के अलावे इसमें सामान्य प्रशासन के पदों,।कार्यों और अधिकारों में विषय में अनेक जानकारियाँ दी गई हैं।

इस पुस्तक का सबसे रोचक खंड भू-राजस्व प्रशासन माना जाता है। इसमें मालगुजारी का मुगल काल के अंतिम समय से अंग्रेजी शासन और उसके बात तक का इतिहास उल्लखित हुआ है। मुगल काल के अंतिम वर्षों में शाहाबाद सरकार और रोहतास सरकार के भू-राजस्व वसूली का गहनता से वर्णन किया गया है।
रिवन्यू प्रशासन 1766-81 के साथ ही वर्षवार बंदोबस्ती के विवरण का खुलासा भी यहाँ पढ़ने को मिलता है। रोहतास सरकार का 1784 में विभाजन, वार्षिक बंदोबस्ती - 1785–87, 1787 में मालगुजारी
वसूली की परेशानी, स्थायी बंदोबस्ती कानून 1793 का प्रभाव, चौसा परगना, 1857 में भूराजस्व वसूली में संकट, बंसकटी महाल, मि० माइलन इस्टेट, परगनों का वसूली विवरण, सर्वे कार्य, जमींदारी उन्मूलन, भू–स्वामियों और रैयतों के बीच के संबंध, मालबुजारी
निर्धारण, वसूली, बकास्त विवाद, भू राजस्व विभाग का संगठन, राजस्व थानों का विवरण, बकास्त भूमि, गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, कृषि भूमि का प्रबंधन, ठीकेदार और गुजास्तादार, भूदान, जमींदारी उन्मूलन का प्रभाव, कैमूर पठार का सर्वेक्षण,
चौकीदारी चकरान जमीन का पठारी व्यवस्था सर्वेक्षण में लगे अधिकारी और कार्य, यू.पी. बिहार सीमा विवाद आदि विषयों का गहनता पूर्वक विवेचन किया गया है। इस पाठ में रोहतास सरकार में रोहतास, चैनपुर और सासाराम परगनों का नाम आता है, तो
शाहाबाद सरकार में भोजपुर, बिहिया, पीरो, नोनौर, आरा, दनवार, दिनारा, पवार और बड़गाँव का नाम आता है। परगनों द्वारा भू राजस्व की यह व्यवस्था 1916 तक थी, इसके बाद राजस्व थाना अस्तित्व में आया। शाहाबाद जिला में ये राजस्व थाना आरा, पीरो,
शाहपुर, बक्सर, डुमरॉव, सासाराम, डिहरी, बिक्रमगंज, करगहर, भभुआ और मोहनिया थे। आजादी के कुछ वर्षों बाद राजस्व अंचलों और राजस्व हल्कों का गठन हुआ। कानून व्यवस्था और न्याय पाठ
में जिले का पुलिस प्रशासन, आपराधिक इतिहास, पुलिस तंत्र के सक्रिय कार्य, जेल व्यवस्था, बक्सर सेंटरल जेल और न्यायपालिका के विविध कार्यों का उल्लेख किया गया है। स्थानीय स्वशासी निकाय में जिला बोर्ड, ग्राम पंचायतों का गठन, नगरपालिका, यूनियन कमिटि, निरीक्षण बंगला आदि का विवेचन इसमें किया गया है।

शिक्षा और संस्कृति अध्याय में जिला में शिक्षा का इतिहास, प्राथमिक–माध्यमिक उच्च प्रौढ़ - बालिका शिक्षा, लाइब्रेरी, म्यूजिम आदि की चर्चा है। चिकित्सा के क्षेत्र में शाहाबाद का पुरातन इतिहास तो मिलता ही है, इसमें आजादी के पूर्व और बाद के जनस्वास्थ्य सुविधाओं, अस्पतालों और स्वास्थ्य जागरूकता का भी विवरण है। सामजिक सेवायें और जनजीवन पाठ में श्रम कल्याण, कृषि मजदूर, औद्योगिक मजदूर, दुकान और व्यापारिक गतिविधियाँ, हास्टल, पेय जल सुविधा, स्वास्थ्य सुविधा कानूनी मदद का वर्णन
तो मिलता ही है, इसमें समाज सेवी संगठन, भारत सेवक समाज, भारत स्कॉट एण्ड गाइड, भूदान आंदोलन, हरिजन सेवक संघ, आर्य समाज, समाज पत्र, आम चुनाव व विधान सभा चुनाव, विधान परिषद
चुनाव ( 1952 से 62 तक), विकास ट्रस्ट, सोसाइटी, बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड व बिहार वक्फ बोर्ड से संबंधित जिले के धार्मिक संस्थाओं का विवरण भी यहाँ मिलता है। इसमें शाहाबाद के सभी प्रसिद्ध और गुमनाम स्थलों की विस्तार से चर्चा की गई है। अघौरा, पाटन, सड़की, वैद्यनाथ, देव व्यणार्क, जारन - तारन, बक्सर व बक्सर किला, डुमरॉव व डुमरॉव राज परिवार, दिनारा, मुंडेश्वरी, कोआथ, शेरगढ़,
मेर, तिलौथू, आरा, मसाढ़ आदि स्थलों की बारीकी से पड़ताल करके बहुत रोचक जानकारियाँ दी गई हैं। कुछ महत्वपूर्ण दर्शनय स्थलों की तस्वीरें भी इसमें शामिल है।

इस महत्वपूर्ण पुस्तक से गुजरते हुए हम शाहाबाद के अनेक गौरवों से परिचित होते हैं। मध्यकालीन भक्त कवि तुलसीदास रघुनाथपुर के निवासी थे, डिहरी में सोन पार करने के लिए नावों पर बांसों की चचरी बनती थी, जिसमें 14,000 बांस लगते थे, जिले की
पुरानी व देशी माप-तौल प्रणाली अअब से कुछ भिन्न थी, जिले में मिलने वाला सबसे बड़ा पंछी 'जिमाच', जो बाजों से लड़ता हैं आदि। 

शाहाबाद गजेटियर का प्रकाशन भले ही उस समय अफसरों को जिले की जानकारी से लबरेज करने के लिए हुआ था । परन्तु,इसका महत्व अब और ज्यादा बढ़ गया है, क्योंकि यह पुस्तक अनेक संदर्भित ग्रंथों, हैण्ड बुकों, यात्रा विवरणों, शोध आलेखों और संबंधित आँकड़ों से भरी है, इसे पढ़ना एक बड़ा और महत्वपूर्ण कार्य लगता है। यह पुस्तक अध्ययनशील व्यक्त्यिों, इतिहास प्रेमियों और शोधार्थियों को दुर्लभ सामग्रियाँ प्रदान करता है, जिस वजह से इसकी उपयोगिता और सार्थकता बनी हुई है।

कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ_ लक्ष्मीकांत मुकुल

कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ _ लक्ष्मीकांत मुकुल सोन नदी बिहार की कृषि-अर्थव्यवस...