आदरणीय श्री विजय कुमार तिवारी जी,
(भुवनेश्वर, उड़ीसा)
सादर प्रणाम!
आपको यह पत्र लिखते हुए मेरे मन में कई भावनाएँ एक साथ उमड़ रही हैं। बहुत दिनों से मन में यह इच्छा थी कि आपको अपने जीवन, अपने अनुभवों और अपने रचनात्मक संघर्ष के बारे में विस्तार से बताऊँ। मैं जानता हूँ कि पत्र लेखन अब धीरे-धीरे लुप्त होती परंपरा है। आज लोग छोटे-छोटे संदेशों में अपनी बात कह देते हैं, परंतु मुझे लगता है कि जीवन और साहित्य जैसे गहरे विषयों को केवल लंबी चिट्ठियों में ही व्यक्त किया जा सकता है। यह पत्र उसी परंपरा का एक हिस्सा है। मैं इसे आत्मकथात्मक रूप में लिख रहा हूँ ताकि आप मेरे जीवन की परतों को, मेरे कवि मन की हलचलों को और मेरे संघर्षों की यात्रा को नज़दीक से देख सकें।
मेरे जीवन में कविता का प्रवेश किसी नियोजित कार्यक्रम की तरह नहीं हुआ। यह उतना ही स्वाभाविक था, जितना कि धान की पौध का खेतों में हरियाना। परंतु इस स्वाभाविकता को जाग्रत करने वाला क्षण अचानक आया। एक दिन रेडियो पर समाचार सुनाई दिया कि हिंदी के महान कवि अज्ञेय का निधन हो गया है। उस समय मैं हैरान हुआ कि यह अज्ञेय कौन थे। मैंने उनसे पहले यह नाम कभी नहीं सुना था। अज्ञेय जैसे कवि का नाम मेरे लिए उतना ही अपरिचित था, जितना किसी अजनबी शहर का।
मेरी जिज्ञासा बढ़ी तो मैंने अपने हाई स्कूल के हिंदी शिक्षक से पूछा। उनका उत्तर सुनकर मैं अवाक रह गया। वे बोले कि "कवि नामक जीव सूर, तुलसी और कबीर के समय में हुआ करते थे। छायावाद तक कुछ कवि हुए, लेकिन अब तो कवि प्रजाति विलुप्त हो चुकी है।" उनका यह कथन मेरे लिए बिजली की तरह गिरा। मुझे लगा कि जैसे किसी ने मेरे भीतर की जिज्ञासा को पत्थर से कुचल दिया हो। परंतु एक तरफ़ निराशा के साथ-साथ मेरे भीतर यह सवाल भी उठ रहा था कि क्या सचमुच कवि अब इस धरती पर नहीं रहे? क्या कविता अब केवल इतिहास की वस्तु बन गई है?
तभी मेरी मुलाक़ात बीबीसी हिंदी सेवा से हुई। वहाँ पंकज सिंह की कविताएँ सुनने का अवसर मिला। उनकी आवाज़, उनके शब्द और उनकी संवेदना ने मुझे भीतर तक हिला दिया। तभी मेरे भीतर यह विश्वास जागा कि कवि अब भी जीवित हैं। कविता अब भी हमारे समय की साँसों में मौजूद है। कविता अब भी इस दुनिया की ज़रूरत है। यही क्षण था जब मैंने भी कवि बनने की इच्छा की। मुझे लगा कि यदि कवि नामक जीव अब भी इस धरती पर है, तो मैं भी उसका हिस्सा क्यों न बनूँ?
इस छोटे से अंकुरित उत्साह को आकार देने में बक्सर के कवि-पत्रकार शिशिर संतोष, रत्नेश और कुमार नयन का बड़ा सहयोग रहा। उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया, मेरी कविताएँ पढ़ीं और उनमें सुधार के सुझाव दिए। उनकी संगति ने मुझे यह सिखाया कि कविता केवल भावुकता का खेल नहीं होती। कविता लिखने के लिए गहरे जीवनानुभव, संवेदनशीलता और सतत श्रम की आवश्यकता होती है।
तिवारी जी, मैं आपको अपने जीवन के बारे में विस्तार से बताना चाहता हूँ। मेरा जन्म 8 जनवरी 1973 को बिहार में रोहतास जिले के कोचानो (कंचन) के तटवर्ती मैरा गाँव में हुआ। गाँव का वातावरण मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। खेत-खलिहान, पशु-पक्षी, नदियाँ, वृक्ष और मिट्टी की सोंधी गंध मेरे बचपन से ही मेरे भीतर समाई रही। आज भी जब मैं लिखता हूँ, तो वही गंध मेरी कविताओं में उतर आती है।
गाँव के जीवन की गति अलग होती है। वहाँ जीवन शांति और गंभीरता से भरा होता है। महानगरों की तरह भागमभाग नहीं होती। परंतु इसका मतलब यह नहीं कि गाँव दुनिया के बदलावों से अछूते हैं। बाजारीकरण और उदारीकरण के प्रभाव से गाँव भी बदल रहे हैं। किसान समाज धीरे-धीरे टूटता जा रहा है। शासन की उदासीनता ने उनकी रीढ़ कमज़ोर कर दी है। यही टूटन मेरी कविताओं में बार-बार मुखर होती है।
आप भलीभाँति जानते हैं कि शाहाबाद का इलाका अन्न उत्पादन में प्रसिद्ध रहा है। यह क्षेत्र भरकी के नाम से जाना जाता है और इसकी कृषि परंपरा जीवंत रही है। परंतु आज वही क्षेत्र संकटग्रस्त है। किसान बेहाल हैं। यह पीड़ा मैं प्रतिदिन अपने आसपास देखता हूँ। इसी पीड़ा को मैंने अपनी कविताओं में दर्ज किया है।
मेरी पहली कविताएँ जमालपुर, मुंगेर से निकलने वाली ‘शब्द कारख़ाना’ पत्रिका में प्रकाशित हुईं। वह क्षण मेरे लिए उतना ही महत्वपूर्ण था जितना कि किसी किसान के लिए पहली बार खेत में अंकुर फूटना। इसके बाद मेरी कविताएँ ‘संभवा’, ‘दस्तावेज़’, ‘कथ्यरूप’, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, ‘परिचय’ और ‘युद्धरत आम आदमी’ जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं।
प्रगतिशील लेखक संघ की गतिविधियों में भागीदारी ने मेरी सोच को और धार दी। वहाँ मैंने जाना कि कविता केवल निजी भावुकता का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज और समय के सवालों से गहरे जुड़ी प्रक्रिया है। वहाँ मैंने सीखा कि कवि का कर्तव्य केवल सौंदर्य का गान करना नहीं है, बल्कि जनता के संघर्षों को आवाज़ देना भी है।
मेरे दो कविता संग्रह—‘लाल चोंच वाले पंछी’ और ‘घिस रहा है धान का कटोरा’—अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। इन संग्रहों में मैंने अपने अनुभवों, संघर्षों और आसपास के जीवन को दर्ज करने का प्रयास किया है। मेरी कविताओं में खेत-खलिहान की गंध है, किसानों की पीड़ा है और श्रम का सौंदर्य है। मैं अपनी कविताओं में कठिन प्रतीकों का सहारा नहीं लेता। मेरी भाषा वही है, जो गाँव-घर में बोली जाती है।
तिवारी जी, मुझे लगता है कि कविता की असली ताक़त उसकी सादगी और उसकी ईमानदारी में है। मेरे लिए कविता वह है, जो जीवन के सबसे सच्चे अनुभवों को अभिव्यक्त करे। जब मैं धान के खेत में खड़ा होता हूँ और देखता हूँ कि पौधे हवा के साथ झूम रहे हैं, तो मुझे लगता है कि यही कविता है। जब मैं देखता हूँ कि एक किसान अपने श्रम के बावजूद कर्ज़ के बोझ तले दबा है, तो मुझे लगता है कि यही कविता का विषय है।
हाल में मेरी पुस्तक ‘यात्रियों के नजरिये में शाहाबाद’ प्रकाशित हुई है। यह पुस्तक मेरे लिए केवल इतिहास का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि ग्रामीण चेतना की अभिव्यक्ति है। इसमें मैंने यह समझने की कोशिश की है कि जब बाहरी यात्री हमारे इलाके में आए, तो उन्होंने क्या देखा और कैसे लिखा। इस किताब में आपको इतिहास का प्रमाणिक आधार मिलेगा और साथ ही साहित्यिक आनंद भी।
वर्ष 2023 में मुझे अरुणाचल प्रदेश के नामसाई जाने का अवसर मिला। यह मेरी पहली हवाई यात्रा थी। पटना से दिल्ली और फिर डिब्रूगढ़ तक की यात्रा मेरे लिए रोमांचक अनुभव थी। असम के चाय बागान, गोल्डन पैगोडा की चमक, टंग टाओ रिसॉर्ट में भोज और सांगपो-खामती जनजातियों से हुई मुलाक़ात मेरे जीवन की स्मृतियों में दर्ज हैं। वहाँ नदी किनारे संगीत की गूँज और जनजातीय लोकगीतों का स्वर मुझे आज भी भीतर तक छूता है।
तिवारी जी, आपसे यह सब साझा करते हुए मुझे लगता है कि कविता का जीवन से कितना गहरा रिश्ता है। कविता केवल पन्नों पर लिखे शब्द नहीं है, वह हमारे जीवन का हिस्सा है। वह हमारे संघर्षों, हमारे सपनों और हमारी आशाओं का प्रतिबिंब है।
कहते हैं कि कवि को केवल एक चीज़ चाहिए—सब कुछ चाहिए। उसकी प्यास केवल उपलब्ध तक सीमित नहीं होती, बल्कि अनुपलब्ध और असंभव तक भी जाती है। इसलिए कवि स्वप्नशील होता है, क्योंकि स्वप्न ही वे पुल हैं जो वास्तविकता से उस अधूरे को जोड़ते हैं, जिसकी अनुपस्थिति मनुष्य की पूर्णता में कमी बनकर रह जाती है।
मैं मानता हूँ कि यह बात मेरे जीवन और मेरी कविता दोनों पर समान रूप से लागू होती है। मैं हर उस तत्व की तलाश में हूँ, जो मनुष्य को और अधिक मनुष्य बना सके—चाहे वह प्रेम की ऊष्मा हो, श्रम का सौंदर्य हो या प्रतिरोध की ज्वाला। मेरे लिए कविता इन्हीं की सतत खोज है—एक ऐसी यात्रा, जिसमें जो नहीं है उसे संभव करना ही काव्य की सच्ची सार्थकता है।
मैं मानता हूँ कि मेरे भीतर गहरे अंतर्विरोध हैं। एक तरफ मैं किसान हूँ, जो रोज़ खेतों में श्रम करता है। दूसरी तरफ कवि हूँ, जो शब्दों के जरिए उसी श्रम की व्याख्या करता है। कभी-कभी यह द्वंद्व मुझे उलझाता है, लेकिन यही द्वंद्व मेरी रचनात्मकता का स्रोत भी है।
तिवारी जी, यह पत्र मैं केवल अपने जीवन का परिचय देने के लिए नहीं लिख रहा हूँ। यह पत्र मेरे लिए आत्मीय संवाद का अवसर है। मैं चाहता हूँ कि आप मेरी कविताओं को केवल शब्दों में न देखें, बल्कि उन्हें उस मिट्टी की गंध के साथ महसूस करें, जहाँ से वे निकली हैं। वहाँ आपको धान की पौध की हरियाली मिलेगी, खेतिहर समाज की पीड़ा मिलेगी, श्रम का पसीना मिलेगा और जीवन का असली रंग मिलेगा।
मैं यह भी चाहता हूँ कि आप मुझे अपने सुझावों और मार्गदर्शन से समृद्ध करें। आपकी प्रेरणा मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं होगी।
आशा है कि आप सुखद और खुशहाल होंगे।
आपका ही_
लक्ष्मीकांत मुकुल
मैरा गाँव, रोहतास, बिहार
(किसान कवि / मौन प्रतिरोध का कवि)
दिनांक_ आश्विन मास,कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि ,विक्रम संवत 2082/तदनुसार_ 15 सितंबर,2025 ईस्वी.
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