शुक्रवार, 22 मई 2026

शाहाबाद में घिस रहा है धान का कटोरा_ लक्ष्मीकांत मुकुल


शाहाबाद में घिस रहा है धान का कटोरा
_ लक्ष्मीकांत मुकुल 

बिहार का पश्चिमी अंचल, जिसे ऐतिहासिक रूप से ‘शाहाबाद’ कहा जाता रहा है—आरा, बक्सर, सासाराम और भभुआ (अब कैमूर)—यह गंगा-सोन की दोआब में फैला हुआ एक समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से सजग भूभाग है। सदियों से यहाँ की माटी, यहाँ का पानी, और यहाँ का मानस, तीनों ने मिलकर इस क्षेत्र को धान की खेती का पर्याय बना दिया है। ‘धान का कटोरा’ जैसा विशेषण केवल उपज की मात्रा से नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतना और जीवंत कृषक सभ्यता की पहचान से जुड़ी होती है। परंतु आज जब हम शाहाबाद की ओर देखते हैं, तो यह कटोरा धीरे-धीरे घिसता दिखाई देता है—इसके किनारे चिटकने लगे हैं, पैंदा दरक रहा है, और इसमें कभी छलकती थी जो हरियाली, वह अब स्याह सन्नाटे में तब्दील हो रही है।

कहने का उद्देश्य यह है कि हम शाहाबाद के ‘धान के कटोरे’ की ऐतिहासिकता को समझें, उसकी सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक जमीन की पड़ताल करें, और उस संकट को चिन्हित करें जो आज इस पहचान को मद्धिम कर रहा है। यह केवल कृषि का संकट नहीं, एक संपूर्ण जीवन-व्यवस्था का संकट है, जो गांवों को शहरों में विस्थापित कर रहा है, और खेतों को परती में।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: जब शाहाबाद सचमुच धान का कटोरा था

शाहाबाद की भौगोलिक स्थिति उसे एक अद्वितीय कृषि क्षेत्र बनाती रही है। पूर्वी गंगा मैदान की उपजाऊ काली-बलुई दोमट माटी, साल भर की मध्यम वर्षा, और प्राचीन नहर व्यवस्था—ये सब मिलकर धान की अद्भुत पैदावार का आधार बने। यहां के किसान केवल उत्पादक नहीं, एक सांस्कृतिक इकाई भी थे। हर धान की किस्म का एक गीत था, हर बुवाई और कटाई का एक त्यौहार। 'कटाई के दिन' हो या ' नयका के माड़ - भात', चूड़ा दही’ उत्सव हो या ‘अन्नकूट’, धान केवल अन्न नहीं, एक सांस्कृतिक प्रतीक था।

ब्रिटिश काल में जब स्थायी बंदोबस्त लागू हुआ, तब भी शाहाबाद अपने किसानों की उत्पादन क्षमता के कारण अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में था। आरा, डुमरांव और सासाराम के जमींदारों ने हालांकि भूमि के स्वामित्व पर अधिकार जमाया, परंतु गांवों में कृषकों की आत्मनिर्भरता बनी रही। 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हरित क्रांति के असर से यह क्षेत्र थोड़ा वंचित रह गया, परंपरागत सिंचाई प्रणाली और स्थानीय बीजों के कारण यहां की खेती अपेक्षाकृत जैविक और टिकाऊ बनी रही।

वर्तमान संकट: धान की खेती क्यों संकट में है?

आज जब शाहाबाद के गांवों में धान की बात होती है, तो चेहरे पर गर्व नहीं, चिंता की रेखाएं दिखती हैं। किसानों की संख्या में गिरावट आई है, युवा पीढ़ी खेती छोड़ चुकी है, और जो बचे हैं वे लागत, जल संकट, श्रमिक अभाव और मंडी-व्यवस्था की दुरवस्था से जूझ रहे हैं। इन संकटों को विस्तार से समझना जरूरी है।

1. जल संकट और सिंचाई की गिरती व्यवस्था
शाहाबाद की नहरें, जो कभी बंगाल इंजीनियरिंग के गर्व की बात थीं, आज गाद और भ्रष्टाचार की शिकार हैं। सोन नहर परियोजना, जो कैमूर और सासाराम की जीवनरेखा थी, अब समय पर पानी नहीं देती। बोरिंग पर निर्भरता ने भूजल को खतरनाक स्तर तक गिरा दिया है। धान की जल-आधारित प्रकृति, अब खुद उसके अस्तित्व की शत्रु बन गई है।

2. श्रमिक संकट और प्रवास
धान की खेती श्रमसाध्य है। रोपनी, कटनी, दौनी—हर चरण में श्रमिक चाहिए। लेकिन शाहाबाद से लगातार मजदूरों का पलायन हो रहा है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और महाराष्ट्र की ओर गया यह प्रवासी श्रमिक वर्ग अब स्थानीय खेती के लिए अनुपलब्ध है। जिन गांवों में कभी चौपाल पर गंभीर से रोपनी की योजना बनती थी, अब वहां श्रमिक की खोज में किसान दर-दर भटकता है।

3. लागत और लाभ का असंतुलन
बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, मशीन—इन सबकी लागत लगातार बढ़ी है। परंतु समर्थन मूल्य या खुले बाजार में धान का मूल्य किसानों को लाभ नहीं दे रहा। परिणामस्वरूप, एक किसान साल भर की मेहनत के बाद कर्ज और हताशा का शिकार हो रहा है। सरकारी योजनाएं केवल कागजों में फलती-फूलती हैं, जमीनी स्तर पर उनके क्रियान्वयन में लापरवाही और भ्रष्टाचार आम बात है।

4. किस्मों और परंपरा का नाश
कभी शाहाबाद की माटी से गूंजती थी—सोनाचुर, सितवा धान, बासमती, पंकज, मंसूरिया, कनकजिर  , और कई स्थानीय किस्मों के नाम। आज ये किस्में विलुप्तप्राय हो गई हैं। संकर बीज और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाइब्रिड बीजों ने परंपरागत किस्मों की जगह ले ली है, जिनसे स्वाद, पोषण और सांस्कृतिक स्मृति—तीनों का ह्रास हुआ है।

सांस्कृतिक संकट: धान से कटती स्मृति

धान केवल भोजन नहीं, यह भाषा, गीत, राग, उत्सव और स्त्री चेतना का प्रतीक भी था। शाहाबाद की लोककथाओं में धान की बालियां विवाह के प्रतीक के रूप में आती हैं। बक्सर से कैमूर तक की स्त्रियाँ आज भी 'धान रोपनी' के समय ‘कजरी’ और ‘झूमर’ गाती थीं—जो एक ओर कृषि चेतना थी, दूसरी ओर सामूहिकता और स्त्री-शक्ति की कविता। परंतु अब ये गीत केवल सांस्कृतिक आयोजनों में, मंच पर गाए जा रहे हैं, खेतों से उनका रिश्ता टूट गया है।

ग्रामीण जीवन की जो छवि कभी धान की हरियाली से जुड़ी थी—बूढ़ी दादी की धूप में धान सुखाने की क्रिया, किशोरों का दौनी में बैल दौड़ाना, माई का तवे पर चिउड़ा सेंकना—वे सब अब स्मृति और उदासीनता के कोने में धकेल दिए गए हैं।

नीतिगत विफलताएँ और राजनीतिक उदासीनता

शाहाबाद जैसे क्षेत्र के कृषि संकट के पीछे एक बड़ी वजह नीतिगत असंगति और राजनीतिक उदासीनता है। कृषि को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाएं अक्सर एक 'सामान्यीकृत' दृष्टिकोण से बनाई जाती हैं, जिसमें क्षेत्रीय विशिष्टताएं, पारंपरिक कृषि विधियाँ और स्थानीय समाज की जरूरतें नजरअंदाज की जाती हैं।

शाहाबाद के लिए न सिंचाई की विशेष योजना बनी, न स्थानीय बीजों के संरक्षण की। मंडी व्यवस्था पूरी तरह नष्टप्राय है। किसान अपने धान को या तो औने-पौने बेचते हैं, या घर में रखकर खुद खाते हैं। इससे उत्पादकता और उत्साह दोनों पर असर पड़ा है।

संभावनाएँ और पुनरुत्थान की राह

यह सच है कि धान का कटोरा घिस रहा है, परंतु यह पूरी तरह टूटा नहीं है। अभी भी इस क्षेत्र में ऐसा समाजशास्त्रीय आधार है, जो कृषि की पुनर्संभावना को जन्म दे सकता है। इसके लिए कुछ ठोस कदमों की आवश्यकता है—

1. स्थानीय बीजों और जैविक खेती का पुनरुत्थान की नवयुगीन अपेक्षाओं की पहलकदमी करते हुए 
सरकार और गैर-सरकारी संगठनों को मिलकर शाहाबाद की परंपरागत किस्मों को पुनर्जीवित करना होगा। स्थानीय बीज बैंक बनाए जा सकते हैं। जैविक कृषि को बढ़ावा देना इस प्रक्रिया को सहारा देगा।


2. नहरों का पुनरुद्धार और जल-संरक्षण की महत्ता को स्वीकारते हुए सोन नहर जैसी ऐतिहासिक योजनाओं का कायाकल्प जरूरी है। जल-संरक्षण और सिंचाई की विकेंद्रीकृत योजनाएं जैसे जल- संग्रहण  या खेत-तालाब जैसे नए तरीके अपनाने होंगे।


3. कृषक सहकारिता और विपणन सशक्तिकरण की दिशा में कारगर पहल करते हुए किसानों को संगठित कर सहकारी मंडी व्यवस्था फिर से शुरू की जा सकती है। मूल्य निर्धारण और बिक्री में पारदर्शिता से लाभ मिलेगा।


4. लोक-संस्कृति से कृषि का पुनर्संवाद स्थापित करते हुए खेतों को फिर से लोकगीतों, स्त्री-उत्सवों और सामूहिकता से जोड़ा जाए। इसके लिए सांस्कृतिक संस्थानों को ग्रामीण स्तर पर सक्रिय करना होगा।


5. शिक्षा और कृषि के बीच संबंध बनाते हुए गांवों के स्कूलों में कृषि को पढ़ाया जाए, जिससे युवा पीढ़ी खेती को ‘बैकवर्ड’ नहीं, एक आधुनिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक कर्म के रूप में देख सके।



निष्कर्षत:, शाहाबाद का धान का कटोरा यदि घिस रहा है, तो इसके पीछे एक बहुस्तरीय संकट है—प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक। यह केवल खेती का संकट नहीं, एक पहचान का संकट है। अगर हम इसे केवल तकनीकी समस्या समझकर सुलझाना चाहेंगे, तो समाधान अधूरा रहेगा। हमें शाहाबाद को एक ‘कृषि-संस्कृति क्षेत्र’ के रूप में देखना होगा—जिसकी माटी में गीत हैं, जहां के खेतों में इतिहास है, और वहीं मानस में भविष्य की संभावनाएं भी हैं।

यह आलेख एक चेतावनी भी है और एक प्रस्ताव भी। यदि हम आज नहीं चेते, तो कल धान का यह कटोरा केवल एक मुहावरा बनकर रह जाएगा—एक ऐसा मुहावरा, जिसमें स्वाद नहीं, केवल विडंबना होगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ_ लक्ष्मीकांत मुकुल

कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ _ लक्ष्मीकांत मुकुल सोन नदी बिहार की कृषि-अर्थव्यवस...