शुक्रवार, 22 मई 2026

महेंद्र मिश्र के गीतों में प्रेम - बोध


महेंद्र मिश्र के गीतों में प्रेम - बोध

_लक्ष्मीकांत मुकुल

महेंद्र मिश्र भोजपुरी के एक महान कवि, धाकड़ संगीतकार और देश प्रेमी थे। भोजपुरी साहित्य की अनमोल धरोहर के रूप में जहां उनके रचना- संसार को रखा जाता है, वहीं लोग उनको लोक कर्मी, लोक कलाकार और पूर्वी सम्राट के रूप में भी जानते हैं। वे जिंदगी भर दरबारी समाज से जुड़े रहने के बावजूद सामंती विचारों और दरबारीपना से अपने को अलग रखे। वे मूलत: लोक संस्कृति और लोक राग से संप्रिक्त एक संस्कारी भक्ति कवि थे, जो राम भक्ति परंपरा और कृष्ण भक्ति परंपरा के साथ-साथ प्रकृति प्रेम, सामाजिक लगाव और श्रृंगारिक विषयों से जुड़े विषयों को अपने गीतों में संजोने - संवारने का काम किया। अगर भक्ति काव्य धारा और रीतिकाव्य धारा की कसौटी पर उनकी पूरी रचनाधर्मिता को परखा जाए, तो यह देखने को मिलता है कि भक्ति रस में डूबे और रीतिमुक्त कविता की धारा के एक सफल कवि के रूप में वे सामने आते हैं । प्रेम- बोध महेंद्र मिश्र की कविताओं का केंद्र बिंदु रहा है, जिसके चतुर्दिक उनकी पूरी रचनाधर्मिता की चौहद्दी  दिखाई देती है। महेंद्र मिश्र सात्विक प्रेम के अनुरागी थे। दैहिक प्रेम, आर्थिक प्रेम और लोभालाभ के प्रेम की झलक उनकी कविताओं में नहीं मिलती। वे हृदय से भक्ति के रस में डूबे एक रस प्रेमी कवि थे। उनका रचना-जगत सतरंगा है। वह प्रेम बोध की दिल की गहराई में उतरकर अपने गीतों में अनेक अर्थ छटा और भाव भूमियों के तरल छूवन से गुड़ की रसधार में डूबे लोकमन को रस विभोर करते रसराग से संचित अपनी पूरबीतान के गीतों के बगीचे को खड़ा किए हैं। उनका प्रेम स्वर का विस्तार मनुष्यता की पक्ष में रहा है। उन्होंने प्रकृति, जीवन जगत, समाज और राष्ट्र आदि सबके साथ प्रेम करने के अपने संदेशों को गीतों के माध्यम से व्यक्त किया है।

 छपरा, बिहार के मिश्रवालिया गांव में जन्में महेंद्र मिश्र की जीवन लीला पर आधारित भोजपुरी में दो उपन्यास प्रकाशित हैं_ पांडेय कपिल द्वारा लिखित "फुलसुंघी" और रामनाथ पांडेय द्वारा रचित "महेंदर मिसिर", जिसमें उनका छपरा की नर्तकी ढेला बाई के साथ प्रेम प्रसंग की चर्चा खूब हुई है। ढेलाबाई वैसे तो एक वैश्या थी,  जिसके कारण लोक समाज उसे अच्छी निगाहों से नहीं देखते थे। परंतु ढेलाबाई हों या कुंवर सिंह के जमाने में आरा की धर्मन बीवी हों, इन लोगों का पेशा नाच- गान और मनोरंजन ही था, लेकिन सही मायने में वे अदब और तमीज़ सिखाने वाली सामाजिक शिक्षिका थीं। हमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह महेंद्र मिश्र की प्रेमिका भी थी। लेकिन उन दोनों में शारीरिक लगाव न होकर आत्मिक लगाव - खिंचाव था_ प्लूटोनिक लव। इस प्रेम संबंध का उनकी रचनाओं और जीवन गतिविधियों पर भरपूर असर पड़ा, जिसका प्रभाव उनकी उनके गीतों में बखूबी झलकता है।

महेंद्र मिश्र का रचना संसार वैसे गीत और कवितायें विविध शैलियों से भरी पड़ा है, परंतु उनकी मुख्य पहचान बनी पूर्वी तान से। पूर्वी बिरह गीतों को कहा जाता है, जिसमें वियोग पक्ष की प्रधानता होती है। भोजपुरी क्षेत्र में पलायन की संस्कृति के गर्भ से उपजे दुख- संताप, राज विराग से लबरेज़ भोजपुरी माटी के लोकमन के सहज भावात्मक अभिव्यक्ति के रूप में पूर्वी राग को गाने वाले गवैया और सुनने वाले श्रोताओं की आत्मा को झकझोर देता है। कवि अपनी स्व पीड़ा को जन पीड़ा के साथ जोड़ता हुआ मिथकों का भी सहारा लेता है, जैसे पुराण कथा में कृष्ण नंदगांव से मथुरा चले गए हैं। अब तक वे नहीं लौटे। कोई लौटने की कोई उम्मीद भी नहीं है। उनके संदेश को लेकर उद्धव जी गोपियों के गांव आए हुए हैं। बुद्धि ज्ञान और तर्क के बल पर समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि जिंदगी चलायमान है। जो जाता है, वह लौटकर नहीं आता। उनकी बातों को सुनकर गोपियों उनसे झगड़ पड़ती है। ज्ञान पक्ष का पंखा प्रेम की आंधी के सामने कहां तक टिक सकता है। प्रेम- बोध की अविरल रसधार इस तरह उनकी गीत में फूटती है_

मधुबनवाँ से मोर कान्हा अइहे कि दू ना।
साँवली सुरतिया फेर देखइहे कि दू ना।
हँसी-अँसी कान्हा मोरा जिया के लोभवलें,
मोरा अंगना में बंसिया बजइहें कि दू ना।
ऊधो जी सनेश लाए बूढ़ा बाभना,
ई त जरिए के खेलारी हउएँ दाढ़ीजार ना।
कूबरी के जोग, भोग हमनी के बतावे,
इ त पोथी ले के आइल बारें उफर परना।
हमनी जो जनितीं मोहन कूबरी से राजी,
हमहूँ कूबर बनइतीं फँसइती मोहना।
कहत महेन्द्र सुनी ल ऊधो बाभना,
इहाँ रोम-रोम बसल बारें कृष्ण सजनाँ।



मां का प्रेम दुनिया का सबसे गंभीर प्रेम कहा जाता है। अपनी संतान की देह पर धूल न लगे, कोई कांट कुश न चुभे, इसकी सबसे ज्यादा चिंता मां को ही होती है। लड़का  कितना ही बड़ा हो जाए, लेकिन मां की नजर में अभी वह बच्चा ही बना रहता है। राम वन को जा रहे हैं पत्नी और भाई के साथ। कौशल्या मां की जिंदगी में वज्र का पहाड़ टूट गिरा है। जो कुछ नहीं सोची थी, वह सब कुछ हो रहा है। जंगल- झाड़- पहाड़ - खाई को पार करते हुए राम कैसे होंगे? कौशल्या मां की दुख भरी कहानी को महेंद्र मिश्र ने अपने  गीत के धागे में पिरोकर  मां के पुत्र वियोग वर्णन में प्रेम के आत्मिक रूप को उभरा है_

भोरहीं के भूखे होइहें चलत पग दूखे होइहें
प्यासे मुख सूखे होइहें जागे मगु रात के।
सूर्य के किरिन लागी लाल कुम्हिलाये होइहें
कंठै लपटाय झंगा फाटे होइहें रात के।
आली अब भई साँझ होइहें कवनो बन माँझ
 सोये होइहें छवना बेबिछवना बिनु पात के।
महेन्द्र पुकारे बार-बार कौशल्या जी कहे
ऐसे सुत त्यागी काहे ना फाटे करेजा मात के।

नायक- नायिका के प्रेम संबंध पर महेंद्र मिश्र के गीत  बहुत ही अद्भुत, मनभावन और प्रेम की गुडही जलेबी की तरह रसदार हैं। उनके गीतों की गठरी में संयोग सुख के हास - विलास, केलि - कलाप और सम्मोहन- उद्दीपन के भाव तो हैं ही, परंतु छिछोरापन की भनक तक नहीं है। उनके गीतों में वसंत ऋतु के आम की मोजर और महुआ के कोचियाए कली की महक है। वहीं उनके गीत की हरेक पंक्ति,हरेक शब्दों, हरेक भाव, हरेक बोध, हरेक क्रियापदों में रसकत्ता भीनी हुई है। कहा जा सकता है कि महेंद्र मिश्र की गीत- माला खिलखिलाते फूलों, मधु छत्ता की झोंझ, महकती गंध, सरसरती हवा और छरछराते मेघ बूंदों के सहमेल ध्वनिरागों के धागे से गूंथी हैं। वे प्रेमिका के रूप में मुग्धा, मध्या, परकीया, गणिका के रूप में नहीं स्वीकारते थे और न तो अपनी को प्रोषित नायक, वचन चतुर नायक या क्रिया चतुर नायक के रूप में  मानते थे। वह अपने साथी से हृदय के स्तर पर प्रेम के आकांक्षी थे। वैसा प्रेम जो मर्यादा की सीमा में रहे और हृदय की गहराई से किया जाए। उनके एक पूर्वी गीत में इसका अनूठा उदाहरण मिलता है_

चढली जवनिया के विरहिनिया ए हरी।
हरि हो केकरा से कहीं दिल के बतिया ए रही।
जाए के त गइलें पतियों ना भेजे ए रही।
हरि हो तोहरा बिनु लागे नाहीं जियरा ए रही।
साँवरी सुरतिया जियरा साले ए हरी।
हरि हो अदो-बदो बथेला कपारवा ए रही।
होत मिनुसाहारा बोले चुहचुहिया ए हरी।
हरि हो हनी-हनी मारेली कटरिया ए हरी।
द्विज महेन्द्र गावे ई कजरिया ए हरी।
हरि हो रोजे-रोजे जोहीं तोरी बटिया ए रही।


पलायन संस्कृति भोजपुरी समाज का एक पुराना क्रियाकलाप है, जो सदियों से चला रहा है। रोजी- रोजगार की तलाश में पहले लोग कोलकाता या रंगून कमाने जाते थे। फिरंगियों की जाल में फंसकर गिरमिटिया मजदूर बनकर मॉरीशस - फिजी सरीखे टापुओं में भी गए। यह सिलसिला आज भी चलता रहता है। पुरुष बाहर की दुनिया में कमाने के लिए जाता है और उसकी औरत घर ही में रह जाती है, जिसकी जिंदगी में बस पति के वापस लौट आने का इंतजार ही होता है। हर आहट पर इंतजार, हर झांकी में आने का इंतजार और मिलने का सपना_

पिया मोरा गइलें रामा पूरबी बनिजिया से दे के गइलें ना।
एगो सुगना खेलवना रामा से दे के गइलें ना।
उड़ल-उड़ल सुगना गइलें कलकतवा कि जाई के बइठे ना।
ओही सामी जी के पगिया रामा से जाई के बइठे ना।
पगड़ी उतारी सामी जांघे बइठवलें से कहऽ सुगना ना।
मोरा धनी के कुसलिया से कहऽ सुगना ना।
माई कइली कूटनी बहिनिया कइली पीसनी कि जइया कइली ना।
तोहरो दउरी-दोकनिया से जइया कइली ना।
कहत महेन्दर पिया भइलऽ कलकतिया से भूलिए गइलेऽ ना।
आपना जइया के सुरतिया रामा भूलिए गइले ना।



महेंद्र मिश्र की कविता और गीत में प्रेम बोध केवल मनुष्य भर के लिए नहीं है, बल्कि उनके प्रेम- विस्तार का माया मोह जल- जंगल- जमीन, पेड़- पौधे और पशु - पक्षी तक फैला हुआ है-- चर से लेकर अचर तक! प्रेम भाव का यही उनका लगाव उन्हें लोक से जोड़ता है। लोक से जुड़ने के चलते लोकगीतों की तरह आम जनता में उनका पूर्वी तान मशहूर हुआ। जिसमें भोजपुरी क्षेत्र की मिट्टी की महक के साथ-साथ मिट्टी की मूरतों के मिलन- बिछड़न की टीस लोककंठ में टांसी की तरह फूटते हैं। वृक्ष- प्रेम से जुड़ा उनका यह गीत प्रेम की छुअन अनुभूति को हृदय स्पर्शी रूप में व्यक्त किया है, जिसे अंतर्तम से महसूस किया जा सकता है_

हे कचनार कदंब अनार रसाल तमाल गुलाल सुपारी।
अमला अमरूध के चूत सभे ओलतान वितान झुके सभ डारी।
जामुन कईत करील तुहूँ कदलीफल श्रीफल ऊँच निहारी।
द्विज दास महेन्द्र से साँची कहऽ कहीं देखे हो तू मिथिलेश कुमारी।


महेंद्र मिश्र के जीवन का  सबल पक्ष उनका देश प्रेमी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी होना है। अंग्रेजी सत्ता के आर्थिक पक्ष को कमजोर करने के लिए उन्होंने नोट छापने का भी काम किया, जिसके माध्यम से वे देशभक्तों की मदद किया करते थे। काफी मात्रा में नोट छापने के कारण तत्कालीन सरकार ने सीआईडी इस्पेक्टर गोपीचंद को इसके जांच के काम में लगाया गया। गोपीचंद उनके यहां नौकर बनकर रहने लगा और अंत में बहुत बड़ी छापेमारी कराई। पुलिस ने महेंद्र मिश्र को गिरफ्तार कर लिया। जेल से उनको छुड़वाने के लिए कहा जाता है कि कोलकाता, बनारस की नर्तकियों ने बहुत ही आर्थिक मदद की थी और और छपरा की ढेला बाई ने तो अपने सारे गहने बेंच डाले थे। बक्सर सेंट्रल जेल का जेलर भी उनसे बहुत प्रभावित हुआ था। वह उसकी बेटी को संगीत सीखने लगे थे, जिसके कारण सरकार से अनुरोध करके, उनके कुशल आचरण को दिखाते हुए कुछ साल की सजा कम कराई थी।
   गोपीचंद उनके यहां नौकर बनकर जब रह रहा था, तो वह भी उनकी कविताओं से प्रभावित होकर तुकबंदियां करने लगा था।  पुलिस ने महेंद्र मिश्र को हथकड़ी पहनाई, तो तब कहते है कि उलाहना देते हुए महेंद्र मिश्र और गोपीचंद के बीच काव्यात्मक संवाद भी हुआ था_

पाकल पाकल पानवा खिअवले गोपीचनवा पिरितिया लगा के ना, हंसी हंसी पानवा खिअवले गोपीचानवा पिरितिया लगा के ना… मोहे भेजले जेहलखानवा रे पिरितिया लगा के ना…
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नोटवा जे छापि छपि गिनिया भजवलs ए महेन्दर मिसिर ब्रिटिस के कईलs हलकान ए महेन्दर मिसिर सगरे जहानवा मे कईले बाडs नाम ए महेन्दर मिसिर पड़ल बा पुलिसिया से काम ए महेन्दर मिसिर



पूर्वी गायन परंपरा की शुरुआत करने वाले महेंद्र मिश्र प्रेम की पीड़ा और प्रेम में मुक्ति पाने की ख्यालों के अनमोल गीतकार थे।  वे हारमोनियम, तबला, झाल, पखाऊज, मृदंग और बांसुरी बजाने की कला में माहिर थे। उनका ठुमरी, टप्पा, ग़ज़ल, कजरी खेमटा जैसी गायन शैली और शास्त्रीय संगीत की विभिन्न विधियों पर मुकम्मल अधिकार प्राप्त था। उनके गीतों में वियोग के भाव जहां सशक्तता के साथ उभरे हैं, वहीं रूमानियत का गहरा असर भी उनकी रचनाओं में सर्वत्र फैला दिखाई देता है। वे कई ग्रंथों के रचयिता भी थे।  अपूर्व रामायण के अलावे महेंद्र मंजरी, महेंद्र प्रभाकर, महेंद्र विनोद, महेंद्र मयंक, महेंद्र रत्नावली, महेंद्र कवितावली, कृष्ण गीतावली, भीष्म प्रतिज्ञा,  महेंद्र चंद्रिका नाम से लिखित और गीतों को  संयोजित किए गए उनके गौरव ग्रंथ भोजपुरी साहित्य की नींव की पत्थर की तरह मजबूत हैं।
ढेला बाई से उनका प्रेम सत्विक था। लोकमत के अनुसार ढेला बाई मुजफ्फरपुर की एक नृत्यांगना की कमसिन बेटी थी, जिसका महेंद्र मिश्र ने अपने दोस्त रॉबर्ट्सगंज के जमींदार हनुमंत सहाय के लिए अपहरण किया था। परंतु इस घटना की टीस और पश्चाताप उन्हें जीवन भर रहा और कठिन समय में भी वे  बाई को मदद करते रहे। लोग तो यह भी कहते हैं कि ढेला बाई की गोद में ही उन्होंने बयासी वर्ष की अवस्था में सन 1946  में अपनी अंतिम सांस ली।

अंत में, महेंद्र मिश्र के गीतों में प्रेम- बोध की ऊंचाई को उनके इस गीत के माध्यम से समझा जा सकता है_

पानी भरे जात रहीं पकवा इनारवा
बनवारी हो लागि गइलें ठग बटवार।
बहियाँ ममोरे मोरा अंगिया निहारे
बनवारी हो तूड़ देलें मोतियन के हार।
गोर लागी पइयाँ परी नटवर कन्हइया
बनवारी हो बिसरल सुधिया हमार
कहत महेन्दर हम रहब एही ठइयाँ
बनवारी हो अब ना जाएब पकवा इनार।

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