गुरुवार, 11 सितंबर 2025

रेडियो तरंगों पर जापान: NHK हिंदी प्रसारण और एक श्रोता का आत्मानुभव

रेडियो तरंगों पर जापान: NHK हिंदी प्रसारण और एक श्रोता का आत्मानुभव

_ लक्ष्मीकांत मुकुल 
(हिन्दी कवि और शौकिया शॉर्टवेब रेडियो श्रोता)




रेडियो का इतिहास केवल तकनीक और सूचना संचार का इतिहास नहीं है, बल्कि यह मनुष्य की जिज्ञासा, सांस्कृतिक संवाद और आत्मीयता का इतिहास भी है। बीसवीं शताब्दी के मध्य तक जब टेलीविज़न और इंटरनेट जैसी सुविधाएं सामान्य जीवन में प्रवेश नहीं कर पाई थीं, तब तक रेडियो ही वह माध्यम था जो करोड़ों लोगों के लिए दुनिया की खिड़की खोलता था। शॉर्ट वेव रेडियो विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रहा क्योंकि इसके माध्यम से सीमाओं, भाषाओं और भौगोलिक दूरियों को लांघकर एक देश दूसरे देश के नागरिकों से संवाद कर पाता था। इसी परंपरा में जापान का सार्वजनिक प्रसारण संस्थान एनएचके (NHK – Nippon Hōsō Kyōkai) अपने हिंदी सेवा के माध्यम से भारत और दक्षिण एशिया से एक गहरे सांस्कृतिक रिश्ते में जुड़ा।

मैं स्वयं पिछले अड़तीस वर्षों से लगातार एनएचके रेडियो जापान का श्रोता रहा हूँ। यह अनुभव केवल सुनने का अनुभव नहीं, बल्कि ज्ञान, साहित्य, संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय समझ के विकास का जीवन्त अध्याय है। मेरे लिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि रेडियो जापान की हिंदी सेवा मेरे जीवन का एक निरंतर बौद्धिक और भावनात्मक सहचर रही है।

शॉर्ट वेव रेडियो और हिंदी सेवा का जादू

शॉर्ट वेव रेडियो का युग आज भले ही डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और इंटरनेट प्रसारण के कारण पीछे छूटता लगे, किंतु उसके स्वर्णिम दिनों में यह माध्यम विश्व राजनीति और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रमुख सेतु था। एनएचके ने हिंदी सेवा आरंभ कर भारत और दक्षिण एशिया के लाखों-करोड़ों श्रोताओं तक जापान की आवाज़ पहुँचाई।

"समाचार", "चेरी के देश से", "दृष्टिकोण", "आइए सीखें जापानी", "विचारावली/अक्षरा", "बहुरूपी एशिया", "जापान दर्पण", "व्यापार विज्ञान जगत", और "रंग अनेक रूप अनेक"—ये कार्यक्रम केवल प्रसारण नहीं थे, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक संवाद थे।

ज्ञान और दृष्टि का विस्तार

रेडियो जापान के समाचारों ने न केवल विश्व राजनीति और एशियाई परिस्थितियों को समझने में मदद की, बल्कि उनकी प्रस्तुति में जो संतुलन, तथ्यपरकता और गहराई थी, वह भारतीय मीडिया से कहीं अधिक विश्वसनीय प्रतीत होती थी।

चेरी के देश से जैसे कार्यक्रम जापान के सामाजिक जीवन, लोक संस्कृति और आधुनिक उपलब्धियों से परिचय कराते थे। आइए सीखें जापानी भाषा शिक्षण का अद्भुत प्रयास था, जिसने भाषा को संस्कृति के द्वार की तरह खोला। विचारावली और अक्षरा ने साहित्यिक विमर्श को नया आयाम दिया, जबकि बहुरूपी एशिया और जापान दर्पण ने एशियाई विविधता और जापानी समाज की सूक्ष्मताओं को प्रस्तुत किया।

पत्राचार और आत्मीय उपहार

रेडियो प्रसारण की एक अद्वितीय विशेषता यह रही कि श्रोता और प्रसारक के बीच पत्राचार से आत्मीय संबंध बनते थे। मैंने भी शुरुआती वर्षों में रेडियो जापान को पत्र लिखे। उन पत्रों के जवाब में जो सामग्री आती थी, वह केवल "उत्तर" नहीं होती थी, बल्कि एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ की तरह होती थी।

मेरे पास आज भी सुरक्षित हैं—

रंगीन पोस्टकार्ड, जिन पर जापान की प्राकृतिक छटाएँ, चेरी ब्लॉसम के दृश्य, माउंट फूजी की झलक और टोक्यो शहर की तस्वीरें छपी हैं। इन पोस्टकार्डों को देखकर लगता है कि मानो रेडियो तरंगों के साथ-साथ दृश्य भी भारत तक पहुँच गए।

कार्यक्रम सूची-पत्रक, जिनमें सप्ताह का विवरण दिया रहता था कि किस दिन कौन-सा कार्यक्रम आएगा। इन्हें देखकर प्रतीक्षा का आनंद और बढ़ जाता था।

रिसेप्शन रिपोर्ट पर उत्तर—मैंने रेडियो की सिग्नल गुणवत्ता लिखकर भेजी और बदले में धन्यवाद पत्र तथा प्रमाण-पत्र जैसे उत्तर मिले। यह संवाद तकनीक और मनुष्यता दोनों का मिश्रण था।

न्यूज़ लेटर्स, जिनमें जापान और रेडियो सेवा से जुड़ी नई-नई जानकारी दी जाती थी।

जापानी भाषा शिक्षण सामग्री—पुस्तिकाएँ, शब्द कार्ड, अभ्यास सामग्री। ये वस्तुएँ मेरे लिए जापान की शैक्षिक सोच की खिड़की खोलने जैसी थीं।

और कभी-कभी आने वाले छोटे-छोटे गिफ्ट्स—जैसे रंग - बिरंगे स्टिकर्स, कैलेंडर या जापानी कला की झलक वाले स्मृति-चिह्न।

इन उपहारों को पाना मेरे लिए केवल "खुशी" नहीं था, बल्कि यह महसूस करना था कि जापान नाम का एक देश और वहाँ के लोग मुझे एक श्रोता मात्र नहीं, बल्कि संवाद का हिस्सा मानते हैं।

साहित्य और समाज का दर्पण

रेडियो जापान ने मुझे जापानी साहित्य—प्राचीन से आधुनिक तक—के बारे में गंभीर जानकारी दी। जापानी हाइकु परंपरा, बाशो और ताकुबोकू जैसे कवियों की कविताएँ, आधुनिक उपन्यासकारों की व्याख्या और जापानी नाट्यकला की झलक मुझे प्रसारणों से ही मिली।

साथ ही, जापानी समाज की सूक्ष्मताओं को भी समझने का अवसर मिला। चाहे वह चेरी ब्लॉसम का उत्सव हो या ओबोन पर्व, चाहे जापान की तकनीकी प्रगति हो या पारिवारिक जीवन की संरचना—इन सबका परिचय रेडियो ने कराया। इसने मेरी दृष्टि को सीमित भारत तक से निकालकर विश्व नागरिकता की ओर विस्तारित किया।

बदलते समय में रेडियो जापान

आज तकनीक बदल चुकी है। शॉर्ट वेव की जगह इंटरनेट, मोबाइल एप्स और पॉडकास्ट ने ले ली है। परंतु मेरे लिए रेडियो जापान की हिंदी सेवा अब भी उतनी ही जीवंत है। मैं इसे आज भी सुनता हूँ और अनुभव करता हूँ कि यह प्रसारण एक परंपरा और धरोहर है।

रेडियो हमें यह याद दिलाता है कि संवाद केवल त्वरित संदेश नहीं, बल्कि दीर्घकालीन संबंध और समझ का परिणाम है। आज जब मीडिया में शोर-शराबा अधिक और आत्मीयता कम है, तब रेडियो जापान की शैली हमें सिखाती है कि कैसे संतुलन और गंभीरता के साथ संवाद स्थापित किया जाए।

निष्कर्षत:, रेडियो जापान की हिंदी सेवा मेरे जीवन का केवल श्रोता-प्रसारण का रिश्ता नहीं रही। यह ज्ञान, साहित्य, भाषा, संस्कृति और सामाजिक चेतना का अखंड स्रोत रही है। इसके माध्यम से मैंने जापान को केवल एक दूर देश नहीं, बल्कि आत्मीय पड़ोसी और मित्र के रूप में जाना।

अड़तीस वर्षों के इस अनुभव ने यह प्रमाणित कर दिया है कि रेडियो जैसे माध्यम का महत्व कभी कम नहीं हो सकता। तकनीक बदल सकती है, लेकिन संस्कृतियों और मनुष्यों के बीच बनने वाला संवाद कालातीत होता है। एनएचके रेडियो जापान इस कालातीत संवाद का विश्वसनीय और सशक्त स्रोत है।
रेडियो जापान के 70 वीं वर्षगांठ पर आप सभी को बहुत बहुत बधाई हो!



LAKSHMI KANT MUKUL
Village _ Maira,
PO _ Saisar,
Bhaya _ Dhansoi,
Buxar, Bihar,
Pin code _ 802117, (INDIA) 





 

बुधवार, 2 अप्रैल 2025

"शहर समता" के लक्ष्मीकांत मुकुल विशेषांक का लोकार्पण

 दिनांक_ 02.01.2025 को बिहार प्रगतिशील लेखक संघ की आयोजित बैठक में माध्यमिक शिक्षक संघ भवन, जमाल रोड, पटना स्थित सभागार में "शहर समता" द्वारा प्रकाशित "लक्ष्मीकांत मुकुल विशेषांक" का लोकार्पण हिंदी के वरिष्ठ कवि श्री अरुण कमल,  रमेश ऋतम्भर, सुनीता गुप्ता, कथाकार संतोष दीक्षित, अरुण सीतांश आदि के द्वारा की गई। इस इस अवसर पर महत्वपूर्ण कवि- लेखकों में शहंशाह आलम, राजकिशोर राजन, अरविंद श्रीवास्तव, कुमार बिंदु,अनीश अंकुर, गजेंद्र शर्मा, प्रत्यूष चंद्र मिश्र, नरेंद्र कुमार, जय प्रकाश, चंद्रबिंदु सिंह,नरेश प्रसाद, कृष्ण कुमार,सुरेन्द्र नाथ त्रिपाठी  आदि भी उपस्थित थे।


 दिनांक 23.12.2024 को
प्रयागराज {इलाहाबाद} में शहर समता विचार मंच के तत्वावधान में आज प्रयागराज के वरिष्ठ कवि रामलखन शुक्ल की अध्यक्षता में शहर समता विचार मंच के सचिव उमेश श्रीवास्तव के संयोजन में शहर समता कार्यालय कर्नलगंज में लक्ष्मीकांत मुकुल पर केंद्रित विशेषांक का लोकार्पण किया गया, साथ ही एक सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन भी किया गया। इस काव्यगोष्ठी की मुख्य अतिथि डाँ कल्पना वर्मा रही एवं विशिष्ट अतिथि डाँ रवि मिश्रा रहे। 




कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ_ लक्ष्मीकांत मुकुल

कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ _ लक्ष्मीकांत मुकुल सोन नदी बिहार की कृषि-अर्थव्यवस...