भोजपुरी क्षेत्र के पशुचारणों का अनूठा उत्सव: पिड़िया पर्व
_ लक्ष्मीकांत मुकुल
भोजपुरी लोक भूमि-कस्बा- गांव के उन लोकपर्वों में से एक पर्व, शरद ऋतु के दौरान मनाया जाने वाला एक गंभीर और महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त महत्व नहीं मिला है, लेकिन ग्रामीण जीवन की जड़ों-अनुरूप, सामाजिक प्रतिबद्धताओं और प्रतीकात्मकतावाद से समृद्ध है, वह है “पिड़िया पर्व” (जिसे कभी-कभी रुद्रव्रत के नाम से भी जाना जाता है) – विशेषकर भोजपुरी-भाषी क्षेत्र में। इस आलेख में हम इस पर्व को पूरे गहराई से देखना चाहिए — इसके इतिहास, प्रतीक-चिह्न, सामाजिक-आर्थिक पक्ष, ग्रामीण जीवनकालीन अर्थ और समकालीन चुनौतियों सहित — क्योंकि यह सिर्फ एक लोक-व्रत नहीं, बल्कि ग्रामीण संस्कृति, भाई-बहन के सम्बन्ध, पशुचारण-परंपराओं और स्थानीयता की प्रतिबद्धता का संगम है। जैसा कि मैंने पूर्व में लिखा है, मेरी रूचि ग्रामीण एवं कृषि-संबंधी जीवन की पड़ताल में है, और पिड़िया पर्व इसी दिशा में एक विशेष खिड़की खोलता है।
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१. पिड़िया पर्व: मूल स्वरूप एवं भौगोलिक प्रसार
भोजपुरी क्षेत्र अर्थात् बिहार-झारखंड-उत्तर प्रदेश के कुछ खण्डों में, पशुपालक-पशुचारक और धान-धान्य-मूल गाँव-कस्बाओं में इस पर्व का प्रचलन मिलता है। एक लोकप्रिय व्याख्या यह है कि यह पर्व मूलतः उन बहनों द्वारा आरंभ होता है जिनके भाई पशुचारण या कृषि-परिहार से जुड़े हों — उनकी सलामती व दीर्घायु के लिये बहन द्वारा विशेष व्रत-पूजा कर “पिड़िया” लगाई जाती है।
दीपावली के बाद एकम या दूज की सुबह को "गोधन कुटाई" का पर्व, जिसे भाई दूज या गोधन के नाम से भी जाना जाता है, बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में मनाया जाने वाला एक अनोखा और पारंपरिक त्योहार है। यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम और त्याग का प्रतीक है। इस दौरान बहनें अपने भाइयों के दीर्घायु और मंगल की कामना के लिए उन्हें तरह-तरह की "बद्दुआ" देती हैं, जिसमें अपनी जीभ में कांटे चुभोना, गोबर से बने गोधन को कूटने से पहले भाइयों को कोसना आदि शामिल है। इसी के साथ इस व्रत की शुरुआत होती है गोवर्धन पूजा के दिन से, उस दिन पशुपालक-गाय, भैंस इत्यादि के परिहार-पूजा के बाद घर की दीवार पर गोबर से छोटे-छोटे गोल पिंड चिपकाये जाते हैं और गीत, जागरण चलती है। इस प्रकार यह पर्व पारंपरिक कृषि-पशु-मिलन, पशुचारण-सम्बन्धी जीवनशैली, बहन-भाई के सामाजिक सम्बन्ध और लोक-कलात्मक अभिव्यक्ति का संयोजन बन जाता है।
इसमें व्रत रखने वाली लड़की के जितने भाई होते हैं उसी संख्या के अनुसार प्रति भाई 16 धान से चावल निकलाकर वो सोरहिया निगलती है। व्रत के बाद पिड़िया को सुबह तालाब या नदी में पारम्परिक गीतों के साथ विसर्जित करती हैं।”
इस प्रकार, पर्व का भौगोलिक प्रसार मुख्यतः भोजपुरी-भाषी ग्रामीण इलाकों तक सीमित दिखता है, और इसमें पशुचारण-जीवनशैली का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समावेश है — अर्थात् पशुओं की देखभाल, चारा-धान, पशुधन-संधारण, आदि। इसलिए इसे “पशुचारणों का अनूठा पर्व” कहना उचित है।
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२. उद्देश्य, प्रतीक एवं सामाजिक अर्थ
पिड़िया पर्व का प्रमुख उद्देश्य है बहन द्वारा अपने भाइयों के प्रति प्रेम, सुरक्षा-कामना और सामाजिक कर्तव्य का निर्वहन। बहनें पारंपरिक रूप से अपने भाइयों के स्वास्थ्य, दीर्घायु और भलाई के लिए इस व्रत को ग्रहण करती हैं। इस प्रकार, यह पर्व भाई-बहन के रिश्ते को एक सामुदायिक-लोक-आधारित अर्थ देता है।
प्रतीकात्मकता की दृष्टि से देखे तो, यह पर्व निम्नलिखित रूपों में समृद्ध है:
गोबर-पिंड (पिड़िया): दीवार पर गोबर से छोटे-छोटे पिंड बनाना, यह न केवल एक लोक-कलात्मक अभ्यास है बल्कि यह प्रतीक है ग्रामीण जीवन-पृष्ठभूमि, गौ-पालन-पशु-चारा-प्रक्रिया का। गोबर यहाँ एक प्राकृतिक स्रोत है, पशु-चारा-उत्पादन-दृष्टि से महत्वपूर्ण तत्व।
रात जग्गा (रात्रि जागरण-गीत): बहनें रात भर जागकर लोकगीत गाती हैं—यह सांस्कृतिक प्राणीकरण है, जहाँ सामाजिक संयोजन, जुड़ाव और सांगीतिक-स्थानीय स्मृति-स्थापन होता है।
भाई की संख्या के अनुसार धान-संख्या: व्रत रखने वाली बहन अपने भाइयों की संख्या के अनुसार प्रति भाई 16 धान से चावल निकालती है और “सोरहिया” में निगलती है। यह क्रिया न केवल संख्या-मापक प्रतीक है बल्कि धान-धान्य-धान-मूल्य के ग्रामीण अर्थों को भी उद्घाटित करती है।
विसर्जन (नदी/तालाब में पिड़िया) : पर्व के समापन पर पिड़िया को जल में विसर्जित करना, यह ज्ञान-संबंधी प्रतीक है—जल बहाव, प्रकृति-प्रवाह, लोक-अनुष्ठान और जीवन-चक्र का स्मरण।
दीवार-चित्रकला (पिड़िया चित्रकला): गोबर-पिंडों पर चित्रण, प्राकृतिक रंगों से स्थानीय आकृतियों (सूर्य, चंद्र, पक्षी, मछली) को अंकित करना—यह लोक-कलात्मक परंपरा है जो ग्रामीण जीवन, प्रकृति-संवेदना और सांस्कृतिक-विरासत को समाहित करती है।
इस तरह, यह पर्व ग्रामीण-सामुदायिक जीवन की लोक-संस्कृति, सामाजिक-बंधुत्व, कृषि-पशुपालन-व्यवस्था, लोक-कलाओं और स्थानीय पर्यावरण-प्रकृति के बीच एक जाल बनाता है।
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३. प्रक्रिया-वृत्तांत: आरंभ से समापन
पिड़िया पर्व की प्रक्रिया ग्रामीण लोकजीवन के चक्र को प्रतिबिंबित करती है। इसे मैं क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत कर रहा हूँ — ध्यान दें कि विविध जगहों में स्थानीय भिन्नताएँ होती हैं।
1. आरंभ – गोवर्धन पूजा के दिन
पर्व की शुरुआत होती है गोवर्धन पूजा के दिन — इस दिन गाय-भैंस-पशु आदि का परिहार-पूजा होती है। उसके बाद बहनें घर की दीवार को साफ करती हैं, गोबर का लेप लगाती हैं और गोबर से छोटे-छोटे गोल-पिंड (पिड़िया) तैयार करती हैं। घर की दीवार पर गोबर से छोटे-छोटे पिंडों का आकार बनाया जाता है।
2. रात जग्गा और लोकगीत
पिड़िया-पिंड बन जाने के बाद बहनें रातभर जागती हैं, लोकगीत गाती हैं, पूजा करती हैं। इस दौरान, लड़कियां रात भर जागकर पीड़िया के लोकगीत गाती हैं और पूजा करती हैं और गीत गाती हैं _
पुरब जइह भइया पछिम जइह, पछिम जइह,
ले अइह ए भइया घिवही लडूइया।
ले अइह ए भइया बाँस क चेंगोलिया,
घिवही लहुई मँहग भइले बहिनी,
छोड़ि द ना ए बहिनी पिंड़िया बरतिया। छोड़ि द....
बाँस क चैंगोलिया मंहग भइले बहिनी,
छोड़ि द ना ए बहिनी पिंड़िया बरतिया।
कइसे मों छोड़ि भइया पिंड़िया बरतिया,
तोहरे बधइया भइया पिंड़िया बरतिया।
ये रात जग्गा गीत न सिर्फ धार्मिक आचरण है बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक मिलन-स्थल भी है — बहनें, उसी गाँव-परिवार की बुजुर्ग महिलाएँ, गीतकार तथा अन्य महिलाएँ मिलकर इस क्रिया को पूर्ण करती हैं। एक ऐसा ही गीत इस तरह है _
लावे के लवलीं पिंड़ियवा राम, छोड़ावे का बेरिया
ससुर पापी भेजे ले नियरवा हो राम, छोड़ावे का बेरिया
बाबा मोरा धरेलनि नियरवा हो राम, छोड़ावे का बेरिया
मोई मोरी साजेली झंपोलिया हो राम, छोड़ावे का बेरिया भउजी मोरी लावेली खोंइछवा हो राम, छोड़ावे का बेरिया सँइया लेके अइले डोली बँसवा हो राम, छोड़ावे का बेरिया भइया मोरा लवेलें ओहरवा हो राम, छोड़ावे का बेरिया
3. सुबह स्नान-कथा-भोजन
अगली सुबह व्रत-धारी बहन स्नान करती है, उसके बाद घर की बुजुर्ग महिला से पिड़िया की कथा सुनती है। व्रत के दौरान, सुबह उठकर स्नान के बाद घर की बुजुर्ग महिला से पीड़िया की कथा सुनी जाती है, और कथा सुने बिना भोजन नहीं किया जाता है। जिसको। छोटकी और बड़की कहनी कहा जाता है। इस कथा-पठन का अर्थ है लोक-स्मृति-संचालन — वह कथा जिसमें पिड़िया-व्रत की उत्पत्ति, लोककथाएँ, और सामाजिक-पात्रों (बहन-भाई-पशुचारक) का अनुभव समाहित रहता होगा।
4. रस्म — सोरहिया व रसियाव
अगले चरण में व्रत की अवधि रहती है — बहनें नए चावल और गुड़ से बनी खीर (जिसे ‘रसियाव’ कहा जाता है) बनाती हैं। इस दिन नए चावल और गुड़ से बनी खीर (जिसे रसियाव कहते हैं) खाई जाती है।
साथ ही, खास बात ये है कि धान की संख्या भाईयों की संख्या के अनुसार होती है... प्रति भाई 16 धान से चावल निकलाकर वो सोरहिया निगलती है। यह राशि-प्रदान-प्रतीक है जो भाई-बहन के पारस्परिक संबंध को दृढ़ करता है।
5. समापन – अगहन शुक्ल प्रतिपदा व विसर्जन
व्रत का समापन होता है अगहन शुक्ल प्रतिपदा को, और उस दिन बहनें पिड़िया को नदी/तालाब/पोखरे में पारम्परिक गीतों के साथ विसर्जित करती हैं। व्रत समाप्त होने के बाद, दीवारों पर बनी पिड़िया को नदी में बहा दिया जाता है।
इस तरह, एक लोक-अनुष्ठान चक्र पूरा होता है — आरंभ में गोवर्धन पूजा, मध्य में जागरण-कथा-भोजन, अंत में विसर्जन-उत्सव।
४. पिड़िया चित्रकला: लोक-कला, प्रतीक और संकट
पिड़िया चित्रकला इस पर्व का एक अत्यंत रोचक आयाम है, क्योंकि यह ग्रामीण लोकशिल्प-परंपरा, स्थानीय रंग-प्रक्रिया, सामाजिक प्रतीक और संवेदनशील पर्यावरण-संकेत का एक संयुक्त रूप है।
प्रक्रिया एवं सामग्री
दीवार को पहले गोबर के लेप से साफ किया जाता है। गोबर से छोटे-छोटे गोल पिण्ड (पिड़िया) बनाकर दीवार पर चिपकाये जाते हैं।
एक माह चलते हुए इस उत्सव पर्व के समापन की पूर्व संध्या पर पिड़िया गीत गाते हुए "पिड़िया लेखन" चित्रकला में पृष्ठभूमि के लिये हरे रंग का उपयोग होता है—यह हरे रंग सेम की पत्ती से बना प्रतीत होता है। चित्रण के लिये सफेद रंग (चावल के पेस्ट से) या सिंदूर का रंग लिया जाता है।आकृतियों को बनाने में बांस की कूंची (ब्रश) का प्रयोग होता है।
आकृति-विषय के रूप में पाए जाते हैं: सूर्य, चंद्रमा, तारे, बिच्छू, साँप, झाड़ू, फूल, डोली, जांता, ढेका, मछली आदि। हरे रंग की पृष्ठभूमि पर सफेद या सिंदूर के रंग से चित्रण किया जाता है। चित्रण के चारों ओर बॉर्डर-रेखा खींची जाती है।
प्रतीकात्मक पठन
यह लोक-कलात्मक प्रक्रिया दर्शाती है कि कैसे ग्रामीण जीवन की बुनियाद—धान, पशु-चारा, प्राकृतिक रंग-संसाधन, लोक-सुरक्षा-प्रतीक—चित्रित होती है।
हरा पृष्ठभूमि = जीवंत कृषि-भूमि, चारा-घास, वन-पथ।
गोबर-पिंड = पशु-उत्पादन-चक्र, गौ-गौ-पालन, चारा-उपलब्धि।
सूर्य-चंद्र, तारे = समय-चक्र, प्रकृति-चक्र, कृषि-रहना।
साँप, बिच्छू आदि = ग्रामीण पर्यावरण-जरा, खेत-पड़ौस-वन-प्राणी।
बिच्छू-झाड़ू-मछली = लोक-जीवन के अनुभव, आर्थिक-उपजीविका-प्रतीक।
संरक्षण-चुनौतियाँ
आजकल इस चित्रकला की निरंतरता चुनौतियों के सामने है। पुरानी सामग्री (गोबर, प्राकृतिक रंग) की जगह प्लास्टिक-कलर या अशुद्ध सामग्री आ रही है। युवाओं में लोक-कलाओं के प्रति रुचि कम होती जा रही है, शहरीकरण-प्रवासन का प्रभाव। कथाएँ, रात्रि जागरण गीत, व्रत-प्रक्रिया का मौखिक-परंपरागत हिस्सा लुप्त हो रहा है। कृषि-पशु-चारण-जीवनशैली में बदलाव का असर, जिससे इस तरह के पर्व-उत्सव का अर्थ बदल रहा है।
इसलिए, लोक-कला के इस रूप को सिर्फ एक साज-सज्जा नहीं बल्कि सामाजिक-स्मृति-भंडार के रूप में देखा जाना चाहिए — और इस पर शोध, संरक्षण-प्रयास जरूरी हैं।
५. सामाजिक-आर्थिक व पशुचारण-स्बन्धी आयाम
पिड़िया पर्व में पशुचारण-और-धान्य-संबंधी सामाजिक-आर्थिक संरचना भी झलकती है। ग्रामीण इलाकों में जहाँ कृषि-पशुचारा एक सहायक उपजीविका है, वहाँ इस पर्व की श्रृंखला निम्नलिखित तरह से अर्थवर्धक हो जाती है_
पशु-चारा-धारण एवं पशु-उत्पादन: गोबर-चारा, गोधन-पशु, गौ-पालन आदि भी इस पर्व द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से स्मरण किये जाते हैं। गोबर जहाँ पशु-उत्पादन का उपउत्पाद है, वहीं उससे दीवार-लेप और पिड़िया-निर्माण में प्रयोग होना सामाजिक-सहायता का संकेत है।
धान्य-प्रतीक एवं आर्थिक संबन्ध: धान की संख्या (प्रति भाई 16 धान) जैसी प्रथा यह दिखाती है कि धान-उत्पादन-मूल ग्रामीण अर्थ में यह पर्व समाहित है। भूख-अन्न-धान्य-बहन-भाई-संबंध का एक छंद-रूप ले लेता है।
बहन-भाई सामाजिक-भूमिका: बहन-व्रती की भूमिका घर-परिवार-समुदाय को सक्रिय करती है। भाई-बहन में सामाजिक कर्तव्य-भावना-प्रतिबद्धता का आदान-प्रदान होता है, जो ग्रामीण जीवन में सहयोग-सहभागिता का आधार है।
लोक-मिलन-सामूहिकता: रात-जागर, गीत-वाचन, कथाएँ, विसर्जन-समूह ये सब सामाजिक-मिलन के अवसर बनते हैं। ऐसा अवसर देता है कि बहन-बहन, भाई-भाई, बुजुर्ग-नवयुवक, गाँव-समुदाय मिलें, साझा-संवेदना उत्पन्न हो।
स्थानीय पर्यावरण-संकल्प: गोबर-पिंड बनाना, प्राकृतिक रंगों का प्रयोग, जल-विसर्जन आदि तत्व प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग-सावधानी की ओर संकेत देते हैं। इस प्रकार, यह पर्व स्थानीय पर्यावरण-स्मृति को जागृत करता है।
इस तरह, पिड़िया पर्व सिर्फ धार्मिक-सोशल उत्सव नहीं, बल्कि ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक जीवन-प्रवाह में अंतर्निहित प्रतीकात्मक “संकेत-तंत्र” है, जिसे समझना साहित्य, समाजविज्ञान और लोकवादी -आधारित आलोचना की दृष्टि से बेहद समृद्ध अनुभव देता है।
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६. लोककायत दृष्टिकोण से विश्लेषण: प्रतिबद्धता, स्थानीयता एवं परिवर्तन
आपकी रुचि अनुरूप, मैं यहाँ इस पर्व को लोकवादी साहित्य-सामाजिक विश्लेषण की दृष्टि से देखना चाहूंगा — विशेषकर “स्थानीयता” की प्रतिबद्धता, ग्रामीण जीवन की शोषण-संरचनाएँ, उत्पादन-संबंध और सांस्कृतिक प्रतिरोध-संकेत के सन्दर्भ में।
उत्पादन-संबंध एवं सामाजिक प्रतिबद्धता
जन-गण-मन की दृष्टि में, सामाजिक धर्म, व्रत-अनुष्ठान और लोक-उत्सव–ये विनष्ट नहीं होते, बल्कि उत्पादन-संबंध, परिहार-पशु-चारा-धान्य-प्लस सामाजिक साझेदारी का हिस्सा होते हैं। पिड़िया पर्व में देखा जा सकता है कि बहन-भाई, पशु-चारा-उत्पादन-धान्य-उपजीविका सभी एक स्थानीय उत्पादन-चक्र को दर्शाते हैं।
– भैंस-गौ-पालन, गोबर-उपज, चारा-प्रबंधन जैसी युवा-पशु-उत्पादन प्रक्रिया इस पर्व में प्रतीकात्मक रूप से शामिल है।
– बहन-व्रती अपनी भूमिका-कर्तव्य निभाती है जो पारंपरिक सामाजिक समेकन की प्रक्रिया है।
– धान-संख्याएँ (प्रति भाई 16 धान) इस बात का संकेत करती हैं कि किस प्रकार स्थानीय धान्य-उत्पादन-मॉडल के अंदर सामाजिक-रिश्ते भी स्थापित होते हैं।
ऐसे में, यह पर्व ग्रामीण “उपजीविका” और सामाजिक-संरचना के बीच एक प्रत्यक्ष संवाद प्रस्तुत करता है। आधुनिक दृष्टिकोण से इस पर्व की की महत्ता को समझने का अवसर मिलता है कि इस प्रक्रिया में कौन-कौन संबंध अनुकरणीय हैं? उत्पादन-उपज और सामाजिक प्रतिपादन में किस प्रकार का विभाजन है? बहन-व्रती-प्रथा कितनी सार्थक है और इसमें कितनी “परम्परागत सामाजिक प्रबंधन” की अभिव्यक्ति होती है?
स्थानीयता की समझ और सांस्कृतिक प्रतिरोध
स्थानीयता इस अर्थ में कि यह पर्व अपने-अपने गाँव-परिसर, लोक-कलाओं, गाय-भैंस-चारा-जीवन, लोकगीतों और लोकश्रुतियों से गाँठ-बत्ध है। यह ग्लोबलाईजेशन-उद्योग-मानकीकरण की चुनौतियों के सामने एक सांस्कृतिक प्रतिरोध-स्थान का काम कर सकता है।
– पिड़िया चित्रकला, ग्रामीण दीवार-सजावट, गोबर-पिंड बनाना — ये तत्व आधुनिक प्लास्टिक-कलर-प्रिंट-साज-सज्जा की जगह एक लोक-सेंसिबिलिटी स्थापित करते हैं।
– जागरण-लोकगीत-कथा-व्रत-विसर्जन का क्रम सामूहिक-स्मृति-निर्माण है — यह सिर्फ उपभोक्तावादी-तैयारी नहीं, बल्कि सहयोग-साझेदारी-प्रकाशन प्रक्रिया है।
– इस तरह यह पर्व स्थानीय प्रतिरोध-रूप में—जहाँ बाहरी-मानकीकरण, उपभोक्तावाद और शहरीकरण का दबाव है—अपनी सांस्कृतिक-सततता और सामाजिक- जातीबद्धता का मापदंड हो सकता है।
परिवर्तन-दबाव एवं शोषण-संकेत
हालाँकि, किसी भी लोक-उत्सव में शोषण-रूपक संकेत भी छिपे होते हैं — उदाहरणस्वरूप:
बहन-व्रती की unpaid श्रम-भूमिका, जो सामाजिक-बंधुत्व को निभाती है लेकिन आर्थिक रूप से मापित नहीं होती।
पशु-चारा-उपजीविका बदलती जा रही है — बड़ी मोटरयुक्त फार्मिंग, पशु उत्पादन के औद्योगीकरण, चारा-उत्पादन-विभाजन में बदलाव। इस बदलती संरचना में पिड़िया-जैसे लोक-उत्सव अपनी जगह खो सकते हैं।
लोक-कलाओं का व्यावसायीकरण या अधूरा संरक्षण — चित्रकला-पिंड बनाना-गायन-गीत औद्योगिक लोक-उत्पादन में बदल सकते हैं, असली सामाजिक-सहभागिता कमजोर हो सकती है।
आधुनिक विश्लेषण की दृष्टि से यह पर्व हमें याद दिलाता है कि स्थानीय सामाजिक-संरचनाओं में केवल उत्सव या संस्कृति नहीं बल्कि प्रतिद्वंद्वित उत्पादन-संबंध, सामाजिक-बंधुत्व और सांस्कृतिक प्रतिरोध का मिश्रण मौजूद है। और यदि इस पर्व को सिर्फ “रुचि-विषय” के रूप में छोड़ दिया जाए, तो इस समाज-कलात्मक प्रकरण की गहराई खो सकती है।
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७. विशेष अध्ययन: पशुचारण-परंपरा, बहन-भाई और स्थानीय समय-चक्र
इस खंड में मैं विशेष रूप से उस पक्ष पर गौर करूँगा जहाँ पिड़िया पर्व पशुचारण-परंपरा तथा स्थानीय समय-चक्र के साथ जुड़ता है — इसे “पशुचारणों का अनूठा पर्व” कहने का कारण यही है।
ग्रामीण भोजपुरी क्षेत्र में पशुपालन-पशुचारण (गाय, भैंस, भेड़-बकरी, और अन्य चारागाह-पशु) एक बहुत पुरानी उपजीविका रही है। इसके विभिन्न आयाम हैं:
पशुओं को चराने, चारा जुटाने, गोबर-उपज सुनिश्चित करने, पशु-स्वास्थ्य बनाए रखने जैसे काम।
गोबर का उपयोग — खेत में उर्वरक के रूप में, मटियार में, घर की दीवार-लेप में, आदि।
पशुओं के आर्थिक मूल्य (दूध-दही, गोबर-उर्वरक, पशु-प्रजनन) तथा सामाजिक-संस्कृति में उनकी भूमिका (गौ-पूजा, गोशाला-परंपरा, आदि)।
पिड़िया पर्व इस क्षितिज पर निम्नलिखित रूप से खड़ा होता है:
– यह पर्व गोवर्धन पूजा से शुरू होता है — अर्थात् पशु-पालन-व्यवस्था के प्रति श्रद्धा, संरक्षण की भावना के साथ।
– दीवार-पर गोबर-पिंड चिपकाना सीधे उस पर्यावरण-चक्र की ओर संकेत करता है जिसमें पशु-उत्पादन-उपज-चारा-प्रबंधन शामिल है।
– बहन-भाई की संख्या-अनुसार धान-सोरहिया-प्रथा एक कृषि-धान्य-सम्बन्धित मूल्यांकन-प्रक्रिया है — पशु-चारा-उपजीविका के सहायक-भूत कृषि-व्यवस्था का संकेत।
– विसर्जन-क्रिया (जल में पिड़िया बहाना) पशु-चारण-भूमि-पास के जल-प्रवाह, तालाब-नदी-चराई-क्षेत्र जैसे स्थानीय पारिस्थितिकी-चक्र को स्मरित करती है।
– तथा लोकगीत-जागर, व्रत-अनुष्ठान, चित्रकला — ये सामाजिक रूप से मिलन-कार्य हैं, जो कि पशु-चारण-समुदाय की सामूहिक-स्मृति को पुष्ट करते हैं।
इन सबकी वजह से, इस पर्व को “पशुचारणों का अनूठा पर्व” कहना व्यर्थ नहीं है: यह ग्रामीण पशु-चारा-उपजीविका, बहन-भाई सामाजिक अनुबंध, लोक-कलात्मक प्रतीक और स्थानीय-समय-चक्र का समन्वय है।
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८. समकालीन चुनौतियाँ, संरक्षण-संभावनाएँ और निरंतरता
जब हम आज-कल के समय में पिड़िया पर्व की बात करते हैं, तब हमें यह समझना होगा कि बदलती ग्रामीण-परिस्थितियों, कृषि-पशु-उत्पादन-मॉडल, शहरीकरण, प्रवासन-प्रभाव, और लोक-संस्कृति-उपभोग की प्रवृत्तियों ने इस लोक-पर्व की निरंतरता पर असर डाला है।
चुनौतियाँ
ग्रामीण-युवाओं का शहरीकरण, कृषि-पशु-उपजीविका से हटना। जब पशु-चारा-प्रक्रिया कमजोर होगी, गोबर-उपज कम होगी, तो पिड़िया-प्रथा की सामर्थ्य घटेगी।
लोक-कला-चित्रकला-गीत-जागर का उपभोग-उन्मुख हो जाना। जब लोक-गीत सिर्फ वीडियो-उत्पादन या मनोरंजन-उद्देश्य बन जाएँ, सामुदायिक-सहभागिता टूटती है।
पर्यावरण-परिस्थितियों में बदलाव — चराई-भूमि-संकीर्णता, जल-स्रोत-सूखापन, आदि। ये पिड़िया-विसर्जन-क्रिया और पशु-चारा-परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं।
पारंपरिक सामग्री (गोबर, प्राकृतिक रंग) की जगह आधुनिक-समग्री का आगमन — जिससे लोक-शिल्प-तत्व अपनी अर्थ-सूचना खो सकते हैं।
आर्थिक-प्रेरणा की कमी — यदि यह पर्व सामाजिक-अनुष्ठान-भूमिका से सामाजिक-उत्सव-परिवर्तन में चला जाए, तो मूल-उद्देश्य कम हो सकता है।
संरक्षण-संभावनाएँ
इस पर्व को स्थानीय-संगठन, सांस्कृतिक संस्थानों द्वारा दस्तावेजित करना; लोक-गीत-कथा-चित्रकला की रिकॉर्डिंग।
ग्रामीण महिलाओं-बहनों को प्रशिक्षण-कार्यशाला देना कि वे पिड़िया-चित्रकला, व्रत-प्रथा को आगे बढ़ाएँ।
इस पर्व को स्कूल-गाँव-समुदाय के पाठ-चर्या में सम्मिलित करना; स्थानीय-इतिहास-स्मृति-परिप्रेक्ष्य से पाठ्य-सामग्री बनाना।
पर्यटन-सहायता-उद्यम के रूप में इस लोक-उत्सव को ग्रामीण-पर्यटन-मॉडल में शामिल करना — लेकिन इस तरह कि इसके धार्मिक-सामाजिक अर्थ विकृत न हों।
हस्तशिल्प-उत्पादन (पिड़िया-चित्रकला वाली दीवार-सजावट) को स्थानीय आर्थिक-उत्पादन-मॉडल में बदलना — जैसे वृत्तिशुल्क-उद्योग-मॉडल के रूप में।
मीडिया-सहायता से स्थानीय-उत्सव को डिजिटल-आधार पर प्रसारित करना, लोक-गीत-व्रत-कथा का संग्रह तैयार करना।
निरंतरता का चिन्ह
यदि इस लोक-उत्सव को सिर्फ “पुरानी प्रथा” मानकर छोड़ दिया जाए, तो यह लुप्त हो सकती है। इसीलिए जरूरत है इसको समय-अनुकूल बनाकर, लेकिन मूल प्रवाह को न खोते हुए। बहन-भाई की सामाजिक-भावना, लोक-संगीत, चित्रकला, पशु-चारा-उपजीविका से जुड़ाव — इन सभी का निरंतर होना आवश्यक है।
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९. निष्कर्ष
जब हम इस पूरे विषय पर पुनर्विचार करते हैं, तो यह स्पष्ट है कि पिड़िया पर्व केवल एक व्रत-उत्सव नहीं बल्कि भोजपुरी-ग्रामीण जीवन की स्थानीयता, प्रतिबद्धता और सामाजिक-स्मृति का एक अद्भुत पैकेज है। इसमें शामिल हैं — खेती-धान्य-पशु-चारा-संरचना, बहन-भाई का पारस्परिक सामाजिक अनुबंध, लोक-गीत-जागर-कथा-चित्रकला जैसे सांस्कृतिक-उपक्रम, और अंततः प्रकृति-साहित्य-लोक-जीवन का समन्वय।
समकाल की दृष्टि से देखें तो यह पर्व ग्रामीण उत्पादन-संबंधों, सामाजिक साझेदारी-संरचनाओं और सांस्कृतिक प्रतिरोध-संकेत का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है। वहीं स्थानीयता के संदर्भ में यह पर्व उन हिस्सों को उजागर करता है जहाँ जल-चराई-पशु-चारा-धान्य-लोक-शिल्प एक दूसरे से जड़े हैं।
हाल में आज की चुनौतियाँ — शहरीकरण, उपभोग-प्रवृत्ति, कृषि-पशु-व्यवसाय-मॉडल में बदलाव — इस पर्व की निरंतरता के लिए खतरा हैं। लेकिन यदि हमारी प्राथमिकता यही हो कि हम “स्थानीयता का इतिहास लेखन में प्रतिबद्धता” की बात करें, तो पिड़िया पर्व एक अमूल्य स्रोत है। इसे सिर्फ यादगार-उत्सव के रूप में नहीं समझना चाहिए, बल्कि सामाजिक-सहभागिता, लोक-जीवन-अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक-विरासत के दृष्टिकोण से गंभीरता से अध्ययन-संरक्षित करना चाहिए।
संदर्भ सूची_
1. भोजपुरी लोक संस्कृति और परंपराएं, भुनेश्वर भास्कर
2. जोहार भोजपुरिया माटी, व्रत कथा विशेषांक, कनक किशोर
3. भोजपुरी लोक संस्कृति, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय
4. भोजपुरी बाल गीत: एक सांस्कृतिक मूल्यांकन, डॉ. स्वर्ण लता
5. विनीता भास्कर के रेखांकित पिड़िया चित्रकला का नमूना।
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