झींगा मछली की पीठ पर
तैरती नदी में
नहा रहे थे कुछ लोग
कुछ लोग जा रहे थे
काटने गेहूं की बालियां
पेड़ों की ओट में
अपना सिर खुजलाते
देख रहे थे तमाशा
कुछ लोग
सूरज के उगने
दिन चढ़ने
और झुरमुटों में दुबकने की घड़ी
कंघों पर लादे उम्मीदों का आसमान
पूरा गांव ही तन आया था
उनके भीतर
जो खोज रहे होते थे
कोचानो का रोज बदलता हेलान
क्षितिज की तरफ वह
आवाज भर रहा है अंध
आंखों से दीख नहीं रहा उसे कुछ भीद्ध
कुछ लोग चले जा रहे थे तेज कदम
जिध्र लिपटते धुंध् से
उबिया रहा था उसके
नदी पार का गांव।
लक्ष्मीकांत मुकुल जन्म 8 जनवरी 1973 हिन्दी कवि, इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता। 2009 में पुष्पांजलि प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हिंदी में एक कविता संग्रह "लाल चोंच वाले पंछी"।, घिस रहा है धान का कटोरा (कविता संग्रह) और "यात्रियों के नजरिए में शाहाबाद" (लेख) 2022 में सृजन लोक प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित। राजभाषा विभाग, बिहार, पटना से पुरस्कृत।
गुरुवार, 13 सितंबर 2018
लक्ष्मीकांत मुकुल की नदी पर कविता
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ_ लक्ष्मीकांत मुकुल
कदवन जलाशय परियोजना : सोन के पानी को सँभालने की बिहार की पुरानी आकांक्षा और नई संभावनाएँ _ लक्ष्मीकांत मुकुल सोन नदी बिहार की कृषि-अर्थव्यवस...
-
मेरी अरुणाचल यात्रा (03 नवम्बर - 05 नवम्बर, 2022) • लक्ष्मीकांत मुकुल किसी भी मनुष्य के ज्ञान और अनुभव के विस्तार में यात्राओं का महत्व होता...
-
Lakshmi kant Mukul is an active poet of our time . published a few years"Lal chonch wale panchhi" is an important collection of hi...
-
बक्सर के छुरेबाज _ लक्ष्मीकांत मुकुल बचपन की स्मृतियाँ किसी धुंधली तस्वीर की तरह नहीं, बल्कि एक जीवित लोकगाथा की तरह हमारे भीतर बसी रहती है...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें